हवाईअड्डों पर सरकार की तदर्थवादी नीति अब सिर्फ मजाक का विषय नहीं रह गई है।
यह नीति लंबी दूरी की यात्रा करने वाले हवाई मुसाफिरों और अनुंबधों के तहत नए हवाईअड्डों में निवेश करने वालों के लिए सिरदर्द बन चुकी है। अंतरराष्ट्रीय रूटों पर एयरलाइनों की मंजूरी संबंधी फैसले में भी कुछ यही रवैया प्रतिबिंबित होता है। एयर इंडिया के लिए किराए पर विमान लेने का मामला तो इससे भी बुरा है।
दरअसल एयर इंडिया की हालत यह हो चुकी है कि वह अपने कर्मचारियों का भुगतान करने में भी सक्षम नहीं है और वर्किंग कैपिटल जुटाने के लिए उसे लोन लेना पड़ रहा है। शायद यह बताने की जरूरत नहीं है कि एयरपोर्ट शुल्कों और यूजर फीस के मामले में आंतरिक तदर्थवाद का नमूना देखने को मिला। इससे जुड़ा हुआ फैसला नागरिक उड्डयन के लिए बगैर नियामक बनाए हुए लिया गया।
वर्षों पहले यह फैसला किया गया था कि हैदराबाद और बेंगलुरु स्थित पुराने हवाईअड्डों को यहां नए हवाईअड्डों के खुलने के तुरंत बाद बंद कर दिया जाएगा। यह उस नीति का हिस्सा था, जिसके तहत वर्तमान हवाईअड्डे के इलाके की 150 किलोमीटर की परिधि में नए हवाईअड्डों को मंजूरी नहीं दी जाएगी। लेकिन अब सरकार ने अपना इरादा बदल दिया है और बेंगलुरु इंटरनैशनल एयरपोर्ट लिमिटेड (बीआईएएल) के सामने नया प्रस्ताव रखा है।
बीआईएएल ने शहर के बाहर हवाईअड्डा बनाया है। प्रस्ताव के तहत, लो कॉस्ट उड़ानों को शहर के दूसरे छोर पर मौजूद पुराने हवाईअड्डे का इस्तेमाल करने की मंजूरी जारी रखनी चाहिए। इसके अलावा मुंबई के दक्षिण इलाके में प्रस्तावित हवाईअड्डे के लिए 150 किलोमीटर के नियम में ढील दी जा सकती है। अगर हवाईअड्डे बनाने वाली कंपनियां पुराने हवाईअड्डों को बंद करने संबंधी करार का जिक्र भी करती हैं, तो इससे समस्या कम होती नजर नहीं आती।
लिहाजा इस नियम की समीक्षा करने की जरूरत कई वजहों का नतीजा है। पहला यह कि बेंगलुरु और हैदराबाद स्थित नए हवाईअड्डे शहर से काफी दूर हैं और ट्रांसपोर्ट लिंक संतोषप्रद नहीं होने के कारण मुसाफिरों के लिए यहां तक पहुंचना काफी दुरूह है। दूसरा मसला हाई यूजर चार्ज का है।
शुरू में इन शुल्कों को देखकर ऐसा लग रहा था मानो ये लो कॉस्ट उड़ानों की छोटी दूरी की यात्रा के किराए से भी ज्यादा हैं। इन शुल्कों पर जब शोर-शराबा होने लगा तो एक अन्य तात्कालिक कदम के तहत इसे कम करने की कार्रवाई की गई। तीसरी वजह मुंबई और दिल्ली में दूसरा हवाईअड्डा बनाए जाने के लिए सरकार पर पड़ रहा राजनीतिक और व्यावसायिक दबाव है।
इसके अलावा एयर ट्रैफिक में तेजी से हो रही बढ़ोतरी के मद्देनजर भविष्य में 150 किलोमीटर की सीमा जरूरत से ज्यादा मानी जा सकती है। ऐेसे में 150 किलोमीटर के मसले पर फिर से विचार किए जाने की जरूरत है। अगर इस बाबत कोई कदम उठाने से पहले इससे जुड़े तमाम पहलुओं पर गहन विचार-विमर्श और प्रभावित पक्षों के हितों को ध्यान में रखने की अपेक्षा की जाए तो यह उम्मीद से बहुत ज्यादा नहीं होगा।