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कॉरपोरेट का नया अवतार है चैरिटी का कारोबार

Last Updated- December 06, 2022 | 9:40 PM IST

बिजनेस की दुनिया में इन दिनों अचानक दयालुता की भावना उमड़ पड़ी है। हर कंपनी यह गिनाने में जुटी है कि वह झुग्गियों में रहने वाले बच्चों, ग्रामीण लड़कियों, बुनकरों और किसानों के भले के लिए कौन-कौन से कदम उठा रही है।


कोक, पेप्सी, आईटीसी, टाटा, रिलायंस हर किसी के पास इन समुदायों की बेहतरी के लिए उठाए गए या उठाए जा रहे कदमों की लंबी-चौड़ी लिस्ट है। कुछ लोग इसे उम्मीद की नई किरण के रूप में देख रहे हैं। इंडस्ट्री इसे कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) का नाम दे रही है, जबकि इससे इतर राय रखने वाले सामाजिक कार्य समूह इसे सामाजिक विरोध के विकल्प के तौर पर उठाया जाने वाला कदम मानते हैं यानी वे इसे विरोधियों के तुष्टिकरण के लिए उठाया जाने वाला कदम करार देते हैं।


भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) सीएसआर पर इस हफ्ते एक शिखर बैठक का आयोजन करने जा रहा है। फिक्की और एसोचैम समेत दूसरे उद्योग संगठनों की सीएसआर इकाइयां भी अचानक सक्रिय हो गई हैं और उनके द्वारा हेल्थकेयर, शिक्षा, पर्यावरण परिवर्तन जैसे विषयों पर बैठकें आयोजित किए जाने की योजनाएं बनाई जा रही हैं।


अब तक लोगों की भड़ास के शिकार रहे रिटेल चेन्स भी सीएसआर को अपने शत्रुओं को रिझाने के बेहतर हथियार के तौर पर देख रहे हैं। अब रिटेल चेन्स फेरीवालों, शारीरिक रूप से विकलांग लोगों, वरिष्ठ नागरिकों और स्कूल-कॉलेज में पढ़ाई पूरी नहीं कर सके बच्चों को अपने यहां नौकरी पर रखने को तैयार हैं।


सीएसआर का फंडा वैसा ही है जैसे शरीर में थोड़ी तकलीफ होने पर भी हेल्थ वैन बुला ली जाए। इन चीजों में मगजपच्ची करने से बेहतर किसान या जमीन के मालिक यही समझते हैं कि अपनी जमीन का एक टुकड़ा रिटेल कंपनियों को बेचकर मुक्ति पा ली जाए।


सिंगुर, उड़ीसा और एसईजेड से संबंधित कई और इलाकों में पैदा हुए जख्म को भरने की कवायद के मद्देनजर घबराई हुईं कंपनियां यह बात कबूल करती हैं कि सीएसआर अब महज चैरिटी नहीं रही। सीआईआई के सीएसआर विंग से जुड़ीं शेफाली चतुर्वेदी कहती हैं कि अब सीएसआर कंपनियों की कारोबारी रणनीति का एक हिस्सा हो गई है।


आईटीसी के चेयरमैन वाई. सी. देवेश्वर के हवाले से शेफाली कहती हैं कि सीएसआर कारोबार करने का एक तरीका है। आईटीसी ने सीएसआर की दिशा में काफी कुछ किया है। इसने अपने बिजनेस को तो फाइन आट्र्स के इर्दगिर्द मोड़ा ही है, साथ ही फाइन आट्र्स के क्षेत्र में अपनी कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी भी दिखाई है। इसी तरह आईटीसी की ‘ई-चौपाल’ योजना भी किसानों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है।


ई-चौपाल के तहत कंपनी किसानों से अनाज और दूसरी कमोडिटीज खरीदती है।इसी तरह रिलायंस ने किसानों को सलाह देने के लिए एक सेल बनाया है। कंपनी इस तरह के सेल की स्थापना गांवों में करेगी और इनके जरिये जेट्रोफा (रतनजोत) की खेती और डेयरी आदि चलाने की जानकारी दी जाएगी।


सीआईआई के मुताबिक, कंपनियां अपनी सीएसआर मुहिम को इसलिए तेजी से आगे बढ़ा रही हैं, क्योंकि सीएसआर जल्द ही गैर-शुल्कीय बाधा के रूप में सामने आने वाली है और निवेशक व खरीदार पाने के लिए सीएसआर की अवधारणा को अपनाना कंपनियों की मजबूरी होगी।


आईटी कंपनियां इन्टेल, डेल और माइक्रोसॉफ्ट देश में डिजिटल डिवाइड (तकनीकी और गैर-तकनीकी लोगों के बीच का अंतर) को पाटने के लिए काफी आक्रामकता के साथ लोगों के बीच कंप्यूटर बांट रही है। इन्टेल के वर्ल्ड अहेड प्रोग्राम के जनरल मैनेजर जॉन डेवाइस कहते हैं – ‘हम अपनी सीएसआर मुहिम के तहत अपने लिए भविष्य के ग्राहक तैयार कर रहे हैं।’ भारतीय आईटी कंपनियों में सत्यम, इन्फोसिस और विप्रो भी अब समुदायों के बीच काम करने के लिए आगे आ रही हैं।


पर क्या इन चीजों से यह समझा जाए कि इससे एक दयालु और उदार इंडस्ट्री का जन्म हो रहा है? हाल ही में जेएसडब्ल्यू स्टील की संगीता जिंदल ने अपने फाउंडेशन द्वारा शुरू किए गए अर्थ केयर अवॉर्ड के वितरण के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में बातचीत के क्रम में यह स्वीकार किया कि उनकी सहयोगी कंपनी जिंदल पावर के छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में स्थित प्लांट को लेकर ग्रामीणों मे गुस्सा है।


गौरतलब है कि अर्थ केयर अवॉर्ड की ज्यूरी में जानेमाने कृषि वैज्ञानिक एम. एस. स्वामीनाथन जैसे बड़े नाम शामिल थे।इसी तरह, कोक फाउंडेशन के प्रति भी लोगों का गुस्सा सामने आया है। इसके खिलाफ विरोध का झंडा बुलंद करने वालों में एक प्रधानाध्यापिका, एक कवि, एक एक्टर, एक सामाजिक कार्यकर्ता, एक सेवानिवृत मुख्य न्यायाधीश और एक कार्डियोलॉजिस्ट शामिल हैं।


ऐसे में यदि ‘झोलावाले’ यानी सीएसआर के विरोधी लोग, कंपनियों की सीएसआर मुहिम के बारे में यह कह रहे हैं कि कंपनियां विरोधियों के तुष्टीकरण के लिए ऐसा कर रही हैं, तो कॉरपोरेट जगत के चेहरे से नकाब हटाने के लिए उन्हें एक तरह का रोजगार ही मिल गया है।

First Published - May 5, 2008 | 10:22 PM IST

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