पिछले हफ्ते के अंत में ओपेक की बैठक में वित्तमंत्री पी. चिंदबरम के दिए गए बयान पर काफी संजीदगी से सोचने की जरूरत है।
उन्होंने भारत जैसे देशों पर तेल की बढ़ती कीमतों के बोझ के बारे में जोरदार तरीके से बताया। उन्होंने बेबाक तरीके से उन वित्तीय साधनों को भी निशाना बनाया, जिनकी वजह से कच्चे तेल की कीमतों में आग लगी हुई है।
उनके मुताबिक जैसे-जैसे ऊर्जा उत्पादों से जुड़े हुए वायदा कारोबार में पैसे की मात्रा बढ़ रही है, कीमतों में भी तेज उछाल आया है। आखिरकार, उन्होंने इस मुसीबत से निपटने के लिए प्राइस बैंड को लागू करने का सुझाव दिया। इसके तहत तेल की कीमतें अगर प्राइस बैंड के ऊपरी स्तर से भी आगे निकल जाएं तो सभी तेल उत्पादक मुल्क मिलकर उत्पादन बढ़ाने का सुझाव दिया था। अगर तेल की कीमतें निचले स्तर से भी नीचे चली जाएंगी तो वे देश अपने उत्पादन को कम भी कर सकेंगे।
तेल की कीमतों में आया उफान कोई एक-दो दिनों की बात भर बनकर नहीं रह गई है। अब तो यह विकास दर और आर्थिक स्थिरता पर भी असर डालने लगा है। इस बात से शायद ही किसी को ऐतराज होगा। दूसरी तरफ, वायदा बाजार के बारे में जो बात कही गई है, वह कोई नई चीज नहीं है। फिर भी इसके बारे में काफी संजीदगी से सोचने की जरूरत है। कुछ लोगों के मुताबिक बाजार के नतीजे उस चल रही बाजार की हालत के कारण नहीं, बल्कि दूसरे कारणों के नतीजे होते हैं।
ये ऐसे लोग हैं, जो यह मानते हैं कि वायदा कारोबार मांग और पूर्ति के आसान से नियम पर काम करता है। इस बारे में हमें थोड़ा और विश्लेषण करना चाहिए और सबूतों का इंतजार करना चाहिए। जहां तक प्राइस बैंड वाले सुझाव की बात है, तो पहली नजर में यह काफी आकर्षक लगता है। अगर यह मान लें कि तेल उत्पादक और तेल उपभोक्ता मुल्क एक खास कीमत पर तैयार हो जाएंगे, तो यह दोनों पक्षों को स्थिरता और तेल की निरंतर सप्लाई का आश्वासन भी देने वाला लगता है।
सबसे खास बात यह है कि इस फार्मूले के मुताबिक तेल संकट से पार पाने का तरीका मिलजुल कर ही खोजा जाना चाहिए। हालांकि, चीन और अमेरिका जैसे बड़े मुल्क तेल उत्पादकों के हितों को ध्यान में रखने के लिए कतई तैयार नहीं होंगे। वैसे तो मिलजुलकर राह तलाशने की कोशिश को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, लेकिन प्राइस बैंड सिस्टम को लागू करवाने की राह में बड़ी दिक्कतें आएंगी।
पहली बात तो यह है कि उत्पादक मुल्क प्राइस बैंड कैसे तय करेंगे? उससे भी अहम बात यह है कि वे मिलकर कैसे उत्पादन को कम ज्यादा करेंगे? ओपेक को इसके लिए राजी करना काफी मुश्किल होगा। ऊपर से तेल बाजार में तेजी से उभरे रूस जैसे मुल्कों को भी इसके लिए राजी करना आसान न होगा।
इसका फायदा तभी होगा, जब पूरी दुनिया में तेल पर सब्सिडी पूरी तरह से खत्म कर दी जाए। वैसे, चिदंबरम साहब ने इस मुद्दे को उठाकर एक सही कदम उठाया है। अच्छा होगा, अगर ऐसी सही सोच का नजारा वह घरेलू कीमत को तय करते हुए भी दिखें।