पिछले शुक्रवार को महंगाई दर के आंकड़े आए थे और मुद्रास्फीति की दर 7.61 फीसदी हो गई थी, जो पिछले 4 वर्षों में सबसे ज्यादा है।
सोमवार को मार्च 2008 के लिए औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) के आंकड़े आए, जो काफी हताश करने वाले हैं। ये दोनों आंकड़े अर्थव्यवस्था पर तेजी से छा रहे संकट के बादलों की कहानी बयां करते हैं।
मार्च महीने में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में महज 3 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वित्त वर्ष 2007-08 में औद्योगिक उत्पादन की विकास दर महज 8.1 फीसदी रही है, जो पिछले वित्त वर्ष में 11 फीसदी रही थी। इस साल मार्च महीने में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर (आईआईपी के आकलन में जिसकी सबसे अहम भूमिका होती है) की चाल तो और भी सुस्त रही है और इसमें महज 2.9 फीसदी का इजाफा दर्ज किया गया है।
पिछले साल मार्च में इस सेक्टर की विकास दर 16 फीसदी दर्ज की गई थी। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की विकास दर में गिरावट की एक बड़ी वजह मेटल प्रॉडक्ट्स और पाट्र्स के निर्माण में आई 25 फीसदी की गिरावट है। चूंकि औद्योगिक उत्पादन के ये आंकड़े उद्योग जगत पर लागू की गई हालिया कीमत और व्यापार संबंधी बंदिशों से पहले के हैं, लिहाजा इस बात में कोई दो राय नहीं है कि ऊंची कीमतों की वजह से डिमांड में जबर्दस्त कमी दर्ज की गई है।
ट्रांसपोर्ट सेक्टर से जुड़े उपकरण (जो धातुओं से बनते हैं) की विकास दर में भी गिरावट आई है, पर यह गिरावट उतनी ज्यादा नहीं है। दूसरी ओर, विरोधाभास यह है कि मशीनरी और इक्विपमेंट सेक्टर (यह सेक्टर भी धातुओं से जुड़ा है) की विकास दर में 6 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है और पूरे साल के लिए इस सेक्टर की विकास दर 9.3 फीसदी हो गई है।
यह भी सच है कि औद्योगिक उत्पादन में गिरावट सिर्फ धातु क्षेत्र तक ही सीमित नहीं है। कपड़ा और वस्त्र उद्योग का पारा भी नीचे गिरा है और इससे साबित होता है कि ग्लोबल लेवल पर जारी मंदी अपना असर दिखा रही है। विदेशों से मांग में कमी की वजह से इन क्षेत्रों की हालत पतली हुई है।
केमिकल सेक्टर की विकास दर भी खस्ता रही है और इसमें महज 1 फीसदी का इजाफा हुआ है। कुल मिलाकर इन आंकड़ों से इस बात की तस्दीक होती है कि दुनिया के साथ देश भी मंदी की गिरफ्त में है और इन्हें महंगाई दर के बढ़ते आंकड़ों के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए।
दुखद स्थिति यह है कि महंगाई दर और औद्योगिक उत्पादन, इन दोनों में से किसी एक का मुकाबला करने की कोशिश दूसरे के हित में साबित नहीं हो पाएगी। हालांकि ये आंकड़े इस बात का भरोसा जरूर दिलाते हैं कि छोटे वक्त के लिए प्रतिकूल हालात होने के बावजूद निवेश की प्रक्रिया जारी है और आर्थिक विकास की दूरगामी बेहतरी की उम्मीद की जा सकती है।