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स्टार्टअप जैसा व्यवहार नहीं कर सकतीं कंपनियां

Last Updated- December 11, 2022 | 5:46 PM IST

कुछ दिन पहले ऑनलाइन फूड डिलिवरी प्लेटफॉर्म जोमैटो ने कम समय में किराना आपूर्ति करने वाले प्लेटफॉर्म ​ब्लिंकइट (पूर्व नाम ग्रोफर्स) का 4,447 करोड़ रुपये में पूरी तरह अ​धिग्रहण कर लिया। इस सौदे पर कई नजरें टेढ़ी हुईं। इसकी कुछ वजह हैं, पहली तो यह कि जोमैटो की बैलेंस शीट में केवल 1,250 करोड़ रुपये की रा​शि है और अकेले 2021-22 में कंपनी ने परिचालन में 750 करोड़ रुपये की नकदी गंवाई। दूसरा यह अ​​धिग्रहण ऐसे समय हुआ है जब जोमैटो का खुद का भविष्य अधर में है। गत वर्ष कंपनी को करीब 1,100 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था और वर्तमान कारोबारी मॉडल के तहत उसके जल्दी लाभ कमाने की कोई संभावना नजर नहीं आती। यानी अगर कंपनी अपने लिए नकदी नहीं जुटा पाती तो उसका खुद का भविष्य अधर में है। तीसरी बात, ​​ब्लिंकइट सौदे में हितों के ​तमाम टकराव भी ​थे। ​ब्लिंकइट के मुख्य कार्या​धिकारी अलबिंदर ढींढसा जोमैटो के अंतरराष्ट्रीय कारोबार के मु​खिया थे और वह जोमैटो की सह-संस्थापक (तथा पूर्व मुख्य वित्तीय अ​धिकारी) आकृति चोपड़ा के पति हैं। ​ब्लिंकइट में जोमैटो की नौ फीसदी हिस्सेदारी थी। जोमैटो के सीईओ दीपेंदर गोयल खुद पिछले वर्ष तक ​ब्लिंकइट में 10 प्रतिशत के हिस्सेदार थे। उन्होंने पिछले ही वर्ष उसे टाइगर ग्लोबल को बेचा। अंत में कंपनी का मूल्यांकन महज दो महीने के परिणामों पर आधारित है जिनका अंकेक्षण भी नहीं हुआ जबकि अब तो छोटे मोटे मूल्यांकनकर्ता भी मूल्यांकन शुरू करने के पहले अंके​क्षित नतीजों पर जोर देते हैं।
अगर जोमैटो भी गैर सूचीबद्ध होती तो ये बातें मायने नहीं रखतीं। गैर सूचीबद्ध कंपनियां अपने बोर्ड की मर्जी से कोई भी कदम उठा सकती हैं। वे चाहें तो प्रतिस्पर्धी लाभ नजर आने पर घाटे में चल रही कंपनियों में भी निवेश कर सकती हैं या फिर ऐसा कारोबारी मॉडल जारी रख सकती हैं जहां वे ढेर सारी रा​शि घाटे में गंवाती रहें। उनका आकलन उन मानकों पर होता है जो उनके निजी इ​क्विटी निवेशक तय करते हैं। इनमें प्रमुख है किसी भी कीमत पर ग्राहकों को अपने साथ जोड़ना और राजस्व में इजाफा करना। वृद्धि को लेकर जुनून इतना अ​धिक है कि कुछ अतिमहत्त्वाकांक्षी संस्थापक और उनके समर्थक तो अपने बही-खातों में भी छेड़छाड़ करते रहे हैं। अंतिम लक्ष्य यही है कि किसी तरह कारोबार को एक खास आकार तक बढ़ा लिया जाए ताकि कंपनी सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध हो सके। इस प्रक्रिया में करिश्माई संस्थापक पानी की तरह पैसा बहाकर कंपनी का आकार 10 गुना तक बढ़ा लेते हैं।
गैरसूचीबद्ध ओला की कहानी पर विचार कीजिए। मनीकंट्रोल की एक रिपोर्ट के मुताबिक दिसंबर 2018 और जनवरी 2019 के बीच ओला के संस्थापक और सीईओ भवीश अग्रवाल ने ओला इलेक्टि्क में 92.5 प्रतिशत हिस्सेदारी 92,500 रुपये में खरीदी। शेष हिस्सा ओला के पास इस शर्त के साथ रहने दिया गया कि वह अपने ब्रांड नाम का इस्तेमाल करने देगी। एक माह बाद ओला इलेक्ट्रिक ने मैट्रिक्स पार्टनर्स, रतन टाटा और टाइगर ग्लोबल से एक अघो​षित मूल्यांकन पर 300 करोड़ रुपये जुटाये। पांच महीने बाद जुलाई 2019 में ओला इले​क्टि्क ने कहा कि उसने सॉफ्टबैंक से एक अरब डॉलर के मूल्यांकन पर 25 करोड़ डॉलर की रा​शि जुटाई है। इस प्रकार कंपनी भारत की सबसे तेज यूनिकॉर्न बनने वाली कंपनी बनी। 
आज ओला तथा ओला इले​क्टि्क दोनों का मूल्यांकन करीब 5 अरब डॉलर है। कंपनी के इले​क्टि्क स्कूटर लॉन्च हो चुके हैं। अग्रवाल के पास ओला की 5 फीसदी हिस्सेदारी है जबकि ओला इले​क्टि्क में उनकी 32 प्रतिशत हिस्सेदारी है। आपको आश्चर्य हो सकता है कि ओला ​के निवेशकों ने अग्रवाल को ओला इले​क्टि्क में इतनी अ​धिक हिस्सेदारी क्यों रखने दी? लेकिन यह उनका अंदरूनी मामला है। बात यह है कि अगर ओला सूचीबद्ध होती तो इसे अग्रवाल द्वारा खुद से खुद के साथ सौदा करना माना जाता। दुर्भाग्य की बात है कि स्टार्टअप के संस्थापक इस तथ्य की अनदेखी करते हैं कि एक बार सूचीबद्ध हो जाने के बाद हर कॉर्पोरेट कदम को खुदरा या अल्पांश हिस्सेदारों के प्रति ईमानदारी के नजरिये से देखा जाता है।
ओला और जोमैटो के मामले में अंदरूनी सौदा स्वामित्व के ढांचे से शुरू होता है। पेटीएम का उदाहरण लीजिए जो गत वर्ष सूचीबद्ध हुई। इस कंपनी में प्रवर्तक विजय शेखर शर्मा की हिस्सेदारी करीब 15 प्रतिशत है। गैर सूचीबद्ध पेटीएम भुगतान बैंक में वे 51 प्रतिशत हिस्सेदार हैं। पेटीएम, गैरसूचीबद्ध पेटीएम भुगतान बैंक को सालाना 900  करोड़ रुपये की रा​शि चुकाता है जिसकी बहुलांश हिस्सेदारी संस्थापक के पास है। यह हितों में टकराव और संबद्ध लेनदेन का स्पष्ट उदाहरण है। इस मामले में भी जब दोनों कंपनियां गैरसूचीबद्ध थीं तो यह निवेशकों को देखना था। पेटीएम के सूचीबद्ध होने के बाद यह मामला हल होना चाहिए था।
स्टार्टअप में अंदरूनी सौदों का दूसरा जरिया है उनकी प्रारं​भिक पेशकश। जब तक वे गैर सूचीबद्ध रहती हैं उनका मूल्यांकन पूरी तरह किसी भी कीमत पर वृद्धि के आधार पर तय होता है। हकीकत से परे काल्पनिक दुनिया में निवेशकों के समर्थन के आधार पर संस्थापकों के लिए ​ब्लिंकइट जैसी कंपनी में 177 करोड़ रुपये कमाने के लिए 637 करोड़ रुपये गंवाना उचित है क्योंकि आ​खिरकार तो वे उसे सार्वजनिक बाजार के माथे मढ़ देंगे। जब उनके आईपीओ आते हैं तो स्टार्टअप इसे पैसे जुटाने का एक और अवसर मानकर मूल्यांकन पहले जैसा ही रखते हैं।
यही कारण है कि भारतीय बाजार के सबसे बड़े आईपीओ पेटीएम का मूल्यांकन प्रति शेयर 2,150 रुपये था लेकिन 18 नवंबर को वह 9 प्रतिशत गिरावट के साथ खुला। इसके बाद यह 27.6 प्रतिशत गिरा।  कुछ दिन बाद कंपनी के मुख्य वित्तीय अधिकारी ने कहा कि कंपनी आईपीओ का दाम और अ​धिक रख सकती थी लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। उन्होंने कहा कि कंपनी निवेशकों के लिए मूल्य छोड़ना चाहती थी। गत शुक्रवार को कंपनी का शेयर 657 रुपये पर बंद हुआ यानी इश्यू मूल्य से 70 प्रतिशत कम। जैसा कि मैंने कहा कंपनी इसे पैसे बनाने का एक और मौका मान रही थी और उसे लग रहा था कि कीमतें बढ़ेंगी।
स्टार्टअप इस बात की परवाह नहीं करतीं कि आईपीओ आने के बाद यूं बेतहाशा पैसे आने बंद हो जाते हैं। सूचीबद्ध कंपनियों के शेयरधारक मूल्यांकन के अलग तरीके पर यकीन करते हैं। उनके लिए यह मुनाफे और नकदी प्रवाह पर आधारित होता है और सबकी निगाहें कारोबारी संचालन पर रहती हैं। एक सूचीबद्ध कंपनी के रूप में कारोबारी कदम उठाते हुए सभी अंशधारकों के हितों का ध्यान रखा जाना चाहिए। खासतौर पर अल्पांश हिस्सेदारों के हितों का। अब तक तो ऐसे संकेत नहीं मिल रहे।
(लेखक डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू डॉट मनीलाइफ डॉट इन के संपादक हैं )

First Published - July 7, 2022 | 12:48 AM IST

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