केद्र सरकार ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (पीएमजीकेएवाई) को तीन महीने के लिए बढ़ाने का निर्णय लिया है। इस फैसले को उचित ठहराना मुश्किल लगता है। इस योजना के तहत पात्र लाभार्थियों को पांच किलोग्राम चावल या गेहूं नि:शुल्क दिया जाता है। इस कार्यक्रम की शुरुआत अप्रैल 2020 में महामारी के शुरुआती दौर में की गई थी।
उस समय नि:शुल्क अनाज योजना की उचित ही सराहना की गई थी क्योंकि इससे समाज के वंचित वर्ग को ऐसे समय पर जरूरी मदद मिल सकी थी जब महामारी के कारण देश भर में लॉकडाउन से आर्थिक गतिविधियां लगभग ठप थीं। बाद में भी जब इस कार्यक्रम की अवधि बढ़ाई गई तो उसे इस आधार पर उचित ठहराया गया कि महामारी की एक के बाद एक लहर आ रही थी।
इनके कारण देश के विभिन्न इलाकों में आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हो रही थीं। बहरहाल, अब जबकि आर्थिक गतिविधियां पूरी तरह बहाल हो चुकी हैं तो सरकार को भी आपातकालीन उपाय के रूप में शुरू किए गए इस कार्यक्रम को बंद कर देना चाहिए था।
यह दलील दी जा रही है कि इस योजना को राजनीतिक कारणों से बढ़ाया गया है क्योंकि हिमाचल प्रदेश और गुजरात में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि इस योजना ने सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को पिछले विधानसभा चुनावों में जीत हासिल करने में मदद की थी।
बहरहाल, सरकार के निर्णय हमेशा राजनीति से संचालित नहीं होने चाहिए। इस योजना को इस महीने समाप्त करने की तमाम वजह मौजूद थीं। वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने भी ऐसी ही सलाह दी थी। योजना की अवधि बढ़ाने से यह संकेत गया है कि यह योजना सामान्य दिनों में भी जारी रहेगी और यह अनिवार्य तौर पर आपातकालीन हस्तक्षेप नहीं था। ऐसे में योजना को बंद करना और कठिन हो जाएगा। राजकोषीय प्रभाव की बात करें तो इस अवधि विस्तार के कारण 44,762 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।
माना जा रहा है कि इसके कारण खाद्य सब्सिडी का बिल लगभग 3.38 लाख करोड़ रुपये हो जाएगा जबकि बजट अनुमान 2.07 लाख करोड़ रुपये का था। अप्रैल में इसके विस्तार से भी बचा जा सकता था और अनुमान है कि उसके कारण भी करीब 85,838 करोड़ रुपये का व्यय बढ़ा।
पेट्रोलियम और उर्वरक कीमतों में इजाफे से सब्सिडी में होने वाली बढ़ोतरी के कारण भी सरकार को यह प्रोत्साहन मिलना चाहिए था कि वह पीएमजीकेएवाई का विस्तार न करे। उर्वरक सब्सिडी की राशि के बढ़कर 2.5 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है। जबकि चालू वित्त वर्ष में इसका बजट अनुमान करीब 1.05 लाख करोड़ रुपये का था। निश्चित तौर पर कर राजस्व प्राप्तियां बेहतर हैं और इससे समग्र राजकोषीय विचलन सीमित रहेगा। बहरहाल, इस स्तर पर उच्च राजस्व का इस्तेमाल या तो पूंजीगत व्यय बढ़ाने में किया जाना चाहिए था, जिससे वृद्धि को गति मिलेगी या फिर राजकोषीय घाटे को कम करने में। चालू वर्ष में राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के 6.4 फीसदी के दायरे में रखने का लक्ष्य है।
इस संदर्भ में कोई भी सुधार बाजार के भरोसे को मजबूत करता और बॉन्ड बाजार पर से दबाव कम करता। चूंकि हाल के दिनों में नकदी की स्थिति तेजी से बदली है, खासकर भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने की कोशिश के चलते ऐसा हुआ है।
ऐसे में अनुमान से अधिक सरकारी उधारी मुद्रा की लागत बढ़ाएगी। बेहतर राजस्व प्राप्ति की स्थिति में मध्यम अवधि में सहज राजकोषीय सुदृढ़ीकरण भी वांछित है। वैश्विक आर्थिक पूर्वानुमानों की स्थिति तेजी से बिगड़ी है और यह बात भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि को भी प्रभावित करेगी।
ऐसे में मध्यम अवधि में राजकोषीय सुदृढ़ीकरण और कठिन हो जाएगा। सरकार को इस दिशा में बढ़ने के हर अवसर का लाभ लेना चाहिए। इससे किसी अन्य संभावित विपरीत परिस्थिति से निपटने की नीतिगत गुंजाइश बनेगी।