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सरकार की वादाखिलाफी पर अदालती शिकंजा

Last Updated- December 07, 2022 | 9:02 AM IST

कारोबार की दुनिया में सरकारी आश्वासनों पर भरोसा एक महत्त्वपूर्ण पहलू होता है। लेकिन सरकार ने विभिन्न उद्योगों को दिए जा रहे प्रोत्साहनों को पिछले प्रभाव से वापस लेने की समय समय पर जो घोषणाएं की हैं उनमें से कई सारी विवादों के घेरे में रही हैं।


इनमें सरकारी नीतियों में परिवर्तन, उद्योगों को दिए जा रहे फायदे भी शामिल हैं। हाल के हफ्तों में उच्चतम न्यायालय ने जो दो फैसले सुनाए हैं उनसे सरकारी एजेंसियों और उद्योग जगत के बीच मतभेद की झलक साफ देखी जा सकती है।

इनमें से पहला मामला हरियाणा राज्य औद्योगिक विकास निगम और विभिन्न इकाइयों के बीच चल रहे मतभेद को लेकर था, जिन्हें रियायती दरों पर इकाइयां लगाने के लिए जमीन दी गई थी। इनमें से एक मामले में फैक्टरी का निर्माण दोनों पक्षों के बीच की गलतफहमियों की वजह से कुछ समय के लिए लंबित पड़ा रहा। इकाई को पैसे को लेकर थोड़ी परेशानी हो रही थी और इस वजह से निगम ने जमीन सौंपने में विलंब किया, साथ ही परियोजना को समय पर मंजूरी भी नहीं दी जा सकी।

निगम ने जमीन सौंपने में देर तो की ही, साथ ही यह कहते हुए कि करार के नियमों और शर्तों का उल्लंघन किया गया है, उसने दी गई जमीन को वापस भी ले लिया। कंपनी ने इस मामले में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और अदालत ने जमीन को वापस से कंपनी के हाथों में सौंप दिया। इस फैसले के विरोध में निगम ने उच्चतम न्यायालय में अपील की। इस बारे में अदालत का कहना था कि दी गई जमीन को जब्त करना आखिरी कदम होना चाहिए जब कोई दूसरा चारा नहीं बचता हो।

यह इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि निगम एक सरकारी एजेंसी है। अगर कंपनी के खिलाफ कोई फैसला लिया ही जाना था तो इसके लिए उसे काफी पहले से ही सूचित किया जाना चाहिए था। खासकर इस मामले में तो कंपनी की क्षमता और दूसरी जरूरी बातों को ध्यान में रखकर ही जमीन के आवंटन को स्वीकृति दी गई थी। ऐसे में अगर इसे वापस ही लेना था तो निगम को कुछ ठोस कारण गिनाने चाहिए थे। फैसले में कहा गया कि कोई भी पक्ष अपने मन मुताबिक कोई फैसला नहीं ले सकती है।

अदालत ने कहा कि जब निगम ने कंपनी से जमीन वापस लेने का फैसला किया तो उसने अपने ही कुछ तय किए गए मानदंडों पर खरा नहीं उतरने की समीक्षा की। अदालत का कहना था कि अगर निगम के पास यह अधिकार है कि वह करार की शर्तों के पूरा न होने की स्थिति में जुर्माना लगा सकती है तो कम से कम कंपनी को दूसरा मौका तो दिया ही जाना चाहिए था। अदालत ने यह भी कहा कि भले ही गलती कंपनी की ओर से ही क्यों न हुई हो, उसपर इतना कठोर कदम नहीं उठाया जाना चाहिए।

जमीन को वापस उस ही स्थिति में लिया जाना चाहिए अगर किसी कंपनी को पहले से ही एक मौका दिया जा चुका हो और उसके बाद भी कंपनी लगातार डिफॉल्ट करती आ रही हो। यह भी जरूरी है कि उस कंपनी को पहली गलती के बाद लेटर ऑफ इंटेंट दिया गया हो। संविधान के अनुच्छेद 14 में भी इस बात का साफ उल्लेख किया गया है कि किसी झुकाव या फिर मनमुटाव के बिना निगम को सोच समझकर फैसला लेना चाहिए। सरकारी निगमों को संविधान में उल्लेखित प्रावधानों का खास खयाल रखना चाहिए। अदालत ने हर कंपनी के मसले को अलग अलग रखकर उनके बारे में फैसला दिया।

दूसरा मामला बिजली की दरों में छूट को लेकर था, जिसमें केरल सरकार ने पर्यटन उद्योग को कुछ रियायतें दी थीं। बाद में राज्य सरकार बिजली बोर्ड ने इन रियायतों को वापस लेने की घोषणा कर दी। ऐसा भी नहीं था कि रियायतों को केवल तात्कालिक प्रभाव से खत्म किया गया था, बल्कि जो रियायतें पहले दी जा चुकी थीं, उन्हें भी वापस किए जाने का निर्देश दिया गया था। यह मामला कुसुमाम होटल्स लिमिटेड बनाम केरल विद्युत बोर्ड का था। दरअसल जब पर्यटन को एक उद्योग का दर्जा दिया गया था तब से ही होटलों को कुछ रियायतें दी जाने लगी थीं।

तब राज्य सरकार ने विद्युत बोर्ड को कहा था कि वे वर्गीकरण के आधार पर विभिन्न होटलों को रियायतें दें। बाद में राज्य सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर बताया कि किस तारीख से रियायतें दी जानी हैं। ऐसे में होटलों को दी जाने वाली रियायतों की अवधि कम हो गई। होटलों ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया पर कोई फायदा नहीं हुआ। तब उन्होंने उच्चतम न्यायालय में अपील की और इस बार फैसला उनके पक्ष में रहा। न्यायालय ने फैसला सुनाया कि सरकार के पास बस यही अधिकार है कि वह तत्काल प्रभाव से रियायतों को खत्म कर दे, वह चाहे भी तो पिछले प्रभाव से रियायतों को खत्म नहीं कर सकती।

इस बारे में अदालत ने दो महत्त्वपूर्ण आदेश जारी किए। एक तो यह कि सरकार जो आदेश, आश्वासन या भरोसा दे चुकी है उसमें वह कुछ हद तक बदलाव तो कर सकती है पर अगर दूसरे पक्ष ने उस आधार पर कोई कदम उठा लिया है तो उससे पूरी तरह से हाथ वापस नहीं खींचा जा सकता। वहीं दूसरी बात यह है कि अगर सरकार को अपने किसी नीतिगत फैसले में पिछले प्रभाव से परिवर्तन करना है तो इसके लिए साफ तौर पर चीजों को स्पष्ट किया जाना चाहिए।

जो अथॉरिटी इस विषय पर निर्देश दे रहा है उसके पास भी यह अधिकार होना चाहिए। ऐसे में यह ध्यान में रखना जरूरी है कि सरकार जो भी आदेश जारी करे वह यह सोच कर करे कि आगे इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। इस तरह इस फैसले से उद्योग जगत को इतनी राहत तो जरूर मिली है कि सरकार बिना किसी सफाई के और आवश्यक कदम के अपने पुराने वादों से मुकर नहीं सकती।

First Published - July 3, 2008 | 9:55 PM IST

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