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जिरह

Last Updated- December 07, 2022 | 3:43 AM IST

कुछ कदम तो उठाने ही थे
धर्मकीर्ति जोशी – निदेशक और प्रमुख अर्थशास्त्री, क्रिसिल लिमिटेड


दुनिया भर में तेल की बढ़ती कीमतों ने ऊर्जा कीमतों के मुद्दे को गरमा दिया है और इस पर लगाए जाने वाले कर को लेकर भी बहस छिड़ी हुई है।

कई उभरती हुई अर्थव्यवस्था वाले देशों में महंगाई दर को काबू में करने के लिए घरेलू स्तर तेल की कीमतें नहीं बढ़ाई जा रही हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के सर्वेक्षण के अनुसार 42 विकासशील देशों में से केवल आधे देशों ने 2007 में घरेलू स्तर पर तेल की कीमतें बढ़ाई हैं।

ऐसे में जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें 135 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गई हैं, इन देशों की सरकारें कब तक तेल का बोझ राजकोषीय खजाने पर डालती रहेंगी। भारत में भी तेल कंपनियों का घाटा बढ़ता जा रहा है लेकिन इसके बावजूद पेट्रोल, डीजल, केरोसिन और एलपीजी की कीमतों को नहीं बढ़ाया गया है। इससे सरकारी खजाने पर बोझ पड़ रहा है।

इसकी वजह से तेल कंपनियों की माली हालत पतली होती जा रही है जिससे इन कंपनियों की विस्तार और आधुनिकीकरण की योजनाएं बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं। और सबसे बड़ी बात कि उपभोक्ता तेल का उपभोग कर करने के लिए प्रोत्साहित नहीं हो रहे हैं। उद्योग जगत को तो अब तेल की आग की तपिश झेलनी पड़ रही है लेकिन आम आदमी अभी भी तेल की बढ़ती कीमतों से पड़ने वाले प्रभाव से बचा हुआ है।

वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों के कम होने के कोई आसान नजर नहीं आ रहे हैं। कई देशों ने अपने यहां घरेलू स्तर पर पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में इजाफा किया है। इंडोनेशिया में ही पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में 30 फीसदी का इजाफा किया गया है लेकिन यह देश गरीब लोगों को तेल में सब्सिडी भी दे रहा है। श्रीलंका और ताइवान ने भी पेट्रोलियम पदार्थों में ठीक इसी तरह की मूल्य वृद्धि की है। इनके अलावा बांग्लादेश और मलयेशिया भी ऐसा ही कदम उठाने जा रहे हैं।

विकल्प और भी थे
दीपांकर मुखर्जी – सचिव, सीटू

दिल्ली में पेट्रोल की बेस प्राइस 21.93 रुपये प्रति लीटर है, जबकि डीजल की बेस प्राइस 22.45 रुपये प्रति लीटर है। उपभोक्ताओं को पेट्रोल 45.52 रुपये और डीजल 31.76 रुपये प्रति लीटर के हिसाब से मिल रहा था।

यहां यह बात गौर करने वाली है कि पेट्रोल की खुदरा कीमत को बढ़ाने में करों की भूमिका 49 फीसदी तो डीजल के मामले में यह 26 फीसदी बैठती है। यहां यह कहना गलत होगा कि पेट्रोलियम कंपनियां ग्राहकों को पेट्रोल पर 16.3 रुपये प्रति लीटर के हिसाब से छूट दे रही हैं (वास्तव में तो उनको घाटा ही हो रहा है) जबकि उपभोक्ताओं को प्रति एक लीटर पेट्रोल के लिए 22.37 रुपये कर के तौर पर चुकाने पड़ रहे हैं। कीमत बढ़ने के बाद तो यह भार और बढ़ जाएगा।

वैसे तो पिछले कुछ वर्षों में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद केंद्र और राज्य सरकारों को तेल से मिलने वाले राजस्व में इजाफा हुआ है। वर्ष 2001-02 में केंद्र और राज्य सरकारों ने तेल क्षेत्र से 73,800 करोड़ रुपये अर्जित किए, जो 2002-03 में बढ़कर 96,751 करोड़ रुपये हो गया।

2003-04 में यह और बढ़कर 1,64,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया और पिछले साल यानी 2007-08 में यह 1,64,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इसके अलावा ओआईडी अधिनियम, 1974 के तहत ओएनजीसी और ऑयल इंडिया लिमिटेड जैसी कंपनियों ने भी प्रति टन 2500 रुपये के हिसाब से पिछले वर्ष सरकार को उपकर के तौर पर 7,500 करोड़ रुपये दिए।

निजी क्षेत्र की तेल कंपनियां और रिफायनरी को उत्पादन और रिफाइनिंग के बिजनेस में मुनाफा हो रहा है। इसकी वजह यह है कि ये कंपनियां अंतरराष्ट्रीय कीमतों के मुताबिक ही अपनी कीमतें वसूल रही है। हालांकि उत्पादन और रिफायनिंग की कीमतों का इससे कोई लेना-देना नहीं है। रिफायनिंग कंपनियों को आयात कर और बिक्री कर में छूट मिल रही है। तेल निकालने वाली निजी क्षेत्र की कंपनियों और रिफायनरी के पिछले तीन साल के कारोबार और मुनाफे का अंदाजा बड़ी आसानी से लगाया जा सकता है।

First Published - June 5, 2008 | 1:38 AM IST

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