हम लोग इस समय खनिज पदार्थों से संपन्न राज्य छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के नजदीक के गांव सरोवा में हैं।
हम अपने चारों ओर जमीन पर फैले कुछ काले अपशिष्ट पदार्थ देख सकते हैं। हमें बताया गया कि यह पास की ही एक फैक्टरी का ‘तोहफा’ है, जो स्पंज आयरन बनाने से निकला है।
गांव वालों ने हमें बताया कि फैक्टरी का मालिक यह उपहार दे रहा है और उनकी जमीनों तक भी पहुंचाता है। उन्होंने यह बताने से इनकार किया कि क्या इस कचरे को फेंकने के लिए उन्हें पैसे मिलते हैं। लेकिन उन्होंने धीमे से मुझे बताया कि हम काले अवशिष्ट पदार्थ से ढकी जिस जमीन पर खड़े हैं, वह गांव के सरपंच के भाई की है। उन्होंने बताया कि सरपंच हाल ही में फैक्टरी के प्रदूषण के खिलाफ था। लेकिन अब अपने चुनाव के बाद उसने चुप्पी साध ली है।
यह कोई दया का भाव दिखाकर दिए जाने वाला तोहफा नहीं है। बल्कि फैक्टरी अपने उस कचरे से छुटकारा पाना चाहती है, जो स्पंज आयरन के उत्पादन के दौरान निकलता है। स्पंज आयरन का प्रयोग इस्पात बनाने में होता है, जिससे इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास होता है। यह कचरा जहरीला है, क्योंकि इसमें भारी धातुओं का मिश्रण होता है। गांव वाले गरीब हैं।
फैक्टरी शक्तिशाली है। ऐसे में क्या बेहतर व्यवस्था हो सकती है? इस बात की परवाह कौन करता है कि इससे जल का स्रोत प्रदूषित होता है? आखिर देश के विकास के लिए विषाक्त प्रदूषण के रुप में एक छोटी सी कीमत चुकानी होती है। इस मसले को लेकर मेरे मन में बौखलाहट स्वाभाविक थी। इस गांव में पानी का एक मात्र स्रोत तालाब है जिसमें फैक्टरी के उत्सर्जन से काली परत जम गई है। गांववालों ने हमले कहा कि उनके चारों ओर काला ही काला है, उनके घर, उनके कपड़े और यहां तक कि उनके खेत।
वे जिस धान का उत्पादन करते हैं उसमें भी काली धूल निकलती है। उन्होंने कहा कि इसके खिलाफ गांव वालों ने आवाज भी उठाई। लेकिन किसी ने उनकी आवाज नहीं सुनी। उनके इलाके में पहले से ही तीन फैक्टरियां हैं तथा अब एक और का निर्माण किया जा रहा है। हम जहां पर खड़े थे, वहां से स्पंज आयरन की फैक्टरी साफ नजर आ रही थी।
मुझे जहां तक दिखाई दे रहा था चारों ओर काली धूल के बादल नजर आ रहे थे- जहां कोयला उतारा जा रहा था, जहां इसकी क्रशिंग की जा रही थी, जहां इसे भट्ठे में लौह अयस्क और डोलोमाइट के साथ जलाने के लिए भरा जा रहा था, भट्ठे की चिमनी और इसके सभी संयंत्रों में कालिमा ही नजर आ रही थी। फैक्टरी के बाहर की जमीन पर भी इसी पदार्थ का ढेर लगा था। ऐसे में जाहिर था कि इसका मालिक क्यों इस कचरे को चैरिटी के रूप में देना चाहता था।
हम वहां से रायपुर लौटे जहां तमाम मॉल्स बने हुए हैं। शहर का एक पहलू यह भी है कि वहां पर स्पंज आयरन फैक्टरी की कई लाइनें हैं। सभी एक दूसरे से काली धूल पैदा करने में प्रतिस्पर्धा करती हैं। दूसरे दिन जब मैं दिल्ली लौटी तो मैंने अखबार में एक पूरे पृष्ठ का विज्ञापन देखा, जिसमें प्रधानमंत्री तथा रसायन, उर्वरक और इस्पात मंत्रालय के प्रभारी की फोटो छपी थी। इसमें संप्रग सरकार के चार गौरवशाली साल की उपलब्धियों का बखान किया गया था।
इसमें यह भी घोषणा की गई थी कि भारत ने दुनिया के सबसे बड़े स्पंज आयरन के उत्पादक का दर्जा हासिल कर लिया है। यह है भारत की प्रगति का किस्सा। इस्पात की कीमतें नियंत्रण के बाहर जा रही हैं, ऐसे में स्पंज आयरन का कारोबार फलता फूलता व्यवसाय बन गया है। स्पंज आयरन का संयंत्र लगाने के लिए प्राथमिक तकनीक और कुछ मशीनरी पर आने वाला खर्च महज एक साल में निकल आता है।
हम जानते हैं कि इस्पात की उत्पादन लागत में बढ़ोतरी इसलिए हुई है कि इसमें इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल यानी कोकिंग कोल की कीमतें बढ़ी हैं, भारत जिसका बहुतायत में आयात करता है। स्पंज आयरन, कोयले का इस्तेमाल करते हुए इस्पात उत्पादन का एक विकल्प है, जो अब भी बहुत सस्ता पड़ता है। इस तरह से अगर इस्पात की कीमतें बढ़ती हैं तो स्पंज आयरन उद्योग को खासा लाभ होता है, जबकि लागत उतनी ही आती है। इसके परिणामस्वरूप सभी आकार के संयंत्र फल फूल रहे हैं।
स्थिति यह है कि देश भर में तमाम फैक्टरियां खुल रही हैं, जिनका उत्पादन 100 टन प्रतिसाल से भी कम है। इसमें किसी भी तरह की सावधानी नहीं बरती जाती और यह लोगों के घरों के पिछवाड़े खुल जाती हैं। इसे लेकर बहुत आक्रोश है। लेकिन इस मसले पर सरकार कुछ भी नहीं कर रही है। यहां पैसा बनाने का मामला है। इसमें सबकी हिस्सेदारी होती है।
स्पंज आयरन के उत्पादन से होने वाले प्रदूषण को लेकर दो साल पहले तीव्र विरोध हुए थे। उस समय केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इस उद्योग के लिए मानकों का एक मसौदा तैयार किया था। इन मानकों के मुताबिक इस उद्योग को किसी भी परिस्थिति में खेती वाली जमीन पर कचरा नहीं फेंकने दिया जाएगा। बगैर प्रदूषण नियंत्रण संयंत्र की स्थापना के कोई भी नई स्पंज आयरन फैक्टरी नहीं खुलनी चाहिए।
इन फैक्टरियों को ग्रामीण आवासीय इलाकों से एक निश्चित दूरी पर ही स्थापित किया जाएगा। इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं होता कि 2006 में मसौदे में तय किए गए मानकों पर कभी गौर नहीं किया गया। सूचना के अधिकार के तहत पूछे गए सवालों के जवाब में केंद्रीय बोर्ड ने कहा कि इन मानकों को पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के पास पर्यावरण संरक्षण कानून के तहत अधिसूचना जारी करने के लिए भेज दिया गया है। इस पर कार्रवाई की प्रतीक्षा की जा रही है।
दो साल से अधिक बीत जाने के बाद, प्रतिदिन स्पंज आयरन संयंत्र स्थापित हो रहे हैं, एक के बाद दूसरे गांव विषाक्त कचरे को झेलने के लिए मजबूर हो रहे हैं, लेकिन मंत्रालय ने अभी तक कोई मानक नहीं तय किए हैं। कोई नहीं जानता कि ऐसा क्यों किया जा रहा है। यह है औद्योगीकरण का गंदा और स्याह चेहरा, है जिस पर हम गर्व करते हैं। बहरहाल हम कह सकते हैं कि भारत की फौलादी बुनियाद दरक रही है।