जब सरकार चुनाव की तैयारी कर रही होती है, तो लोकलुभावन घोषणाओं की झड़ी लग जाती है। इसकी एक मिसाल आपको किसानों की कर्ज माफी योजना के रूप में मिल सकती है। इसकी घोषणा फरवरी में अपने बजट भाषण के दौरान वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने की थी।
अब ज्यादा लोगों को लुभाने के लिए इसके तहत और किसानों को ले आया गया है। इस वजह से सरकारी खजाने पर अब 60 हजार करोड़ रुपये की जगह 71,600 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा। अब तो कर्ज माफी योजना में मवेशी पालन के धंधे में लगे लोगों को भी शामिल कर लिया गया है।
साथ ही, इस लोकलुभावन घोषणा में ऐसे लोगों को भी शामिल किया गया है, जिन्होंने कुंए खुदवाने और ट्रैक्टर खरीदने के लिए कर्ज लिया था। सबसे अहम बात यह है कि इसके जरिये बड़े किसानों (जिनके पास दो एकड़ से ज्यादा जमीन है) को भी खुश करने की कोशिश की गई है। इसके लिए कर्ज माफी योजना की न्यूनतम फायदा रकम को कम से कम 20 हजार रुपये तक से बढ़ा दिया था, जो अब तक कुल ऋण के केवल 25 फीसदी हिस्से तक सीमित था। इससे बेशक कई किसानों को फायदा पहुंचेगा।
लेकिन सच तो यही है कि इससे कर्ज के मारे असल किसानों को शायद ही कोई फायदा होगा। वजह यह है कि इस योजना में केवल उन किसानों को शामिल किया गया है, जिन्होंने बैंकों से कर्ज लिया था। यानी लाखों ऐसे किसान रह गए, जिन्होंने महाजनों से कर्ज लिया था और जिन्हें कर्ज माफी की सचमुच जरूरत है। हाल के सालों में खुदकशी करने वाले किसानों में महाजनों से कर्ज लेने वालों की तादाद काफी ज्यादा रही है।
अगर रंगराजन कमेटी की रिपोर्ट और दूसरे सर्वेक्षणों को गौर से देखें तो पता चलता है कि केवल 27 फीसदी किसान ही वित्तीय संस्थाओं से कर्ज लेते हैं। इसलिए इस कर्ज माफी से ज्यादातर किसानों को कोई फायदा नहीं होगा। इसके अलावा, यह अतिरिक्त छूट केवल बड़े किसानों के लिए दी गई है। न कि छोटे और सीमांत किसानों को, जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है।
हालांकि, ऐसा करते वक्त सरकार ने माना कि सूखी भूमि वाले इलाकों में ज्यादातर किसानों के पास दो एकड़ से ज्यादा जमीन है। इसके बावजूद उसने ऐसे इलाकों के लिए छोटे और सीमांत किसानों को फिर से परिभाषित नहीं किया। इसलिए आधिकारिक दावों से उलट का काफी कम किसानों को ही इस कर्ज माफी योजना का फायदा मिलेगा। वैसे, इस योजना से बैकों के बैड लोन यानी फंसे कर्ज काफी आसानी से क्लियर हो जाएंगे।
अगर यह योजना पूरी तरह से लागू हो गई तो बैंकों को कम से कम 92 हजार करोड़ रुपये का फायदा होगा। लेकिन इसका सबसे ज्यादा बुरा असर कृषि ऋण क्षेत्र पर पड़ेगा। डिफॉल्टरों की तादाद बढ़ने लगी है। इस नए प्लान की वजह से नए-नए लोग भी बैंकों से कर्ज लेकर उन्हें नहीं लौटाने के लिए प्रेरित होंगे, जिससे ईमानदार बैंक ग्राहक की नीयत में खोट आ सकता है। साथ ही, आगे चलकर बैंक किसानों को भी ऋण देने में हिचकिचा सकते हैं। इससे कृषि पर काफी बुरा असर पड़ेगा।