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दिल्ली मेट्रो लाजवाब

Last Updated- December 07, 2022 | 4:43 PM IST

दिल्ली मेट्रो की नियमित सेवाएं लेने वाले लोगों का इस पर पूरा भरोसा है। इस नेटवर्क का पहला चरण निर्धारित समय से पहले ही पूरा हो गया।


उसमें 65 किलोमीटर का मार्ग शामिल था, जिसमें अब करीब 800,000 यात्री प्रतिदिन यात्रा करते हैं। पांच साल पहले जब यह सेवा शुरू की गई थी तब यह सेवा बहुत ही प्रभावी थी। अब भी यह उतनी ही प्रभावी है और इसका जलवा बरकरार है।

इस सेवा की सफलता का राज इसमें है कि रेल के कोच और स्टेशनों की नियमित साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखा जाता है। इससे यात्रा करने वाले लोग दिल्ली मेट्रो की सुरक्षा व्यवस्था और नियमों के कायल हैं। सेवा की निरंतरता और समयबध्दता तथा यात्रियों की सुविधा के लिए तकनीकों का बेहतर प्रयोग किया गया है।

इतना ही नहीं, इस सेवा में परिचालन कार्यकुशलता भी बहुत बेहतर है, जो किसी भी प्रबंधक को प्रभावित करती है। इसके परिचालन अनुपात (मेट्रो रेल के संचालन से होने वाली आमदनी और खर्च) में भी साल-दर-साल सुधार आ रहा है। वर्ष 2007-08 में यह इसके पहले साल के 0.60-0.64 से घटकर 0.52 रह गया है। दूसरे शब्दों में कहें तो दिल्ली मेट्रो का परिचालन खर्च अब कुल आय का करीब आधा रह गया है।

जानकारों, विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों की नजर में हालांकि दिल्ली मेट्रो में ढेरों समस्याएं हैं। कुछ लोग दिल्ली जैसे शहर में मेट्रो सेवा चलाने को लेकर सवाल उठाते हैं जिसमें भारी पूंजी लगती है। उनका तर्क है कि मेट्रो सेवा उन शहरों के लिए बेहतर है तो एक सीध में फैल रहे हैं, न कि दिल्ली जैसे शहर के लिए जहां वृत्ताकार क्षेत्र में विकास हो रहा है।

दूसरा सवाल उस तरीके को लेकर उठता है जिसके आधार पर दिल्ली मेट्रो के लिए वित्तीय व्यवस्था की गई। दिल्ली मेट्रो की वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए जापानी और अन्य एजेंसियों से लंबी अवधि के लिए कर्ज के माध्यम से बेहद रियायती दर पर धन एकत्र किया गया है।

वास्तव में देखें तो यह पैसा मुफ्त में मिला है। इस तरह से इसकी वास्तविक लागत छिपी हुई है और अगर बाजार भाव पर इस नेटवर्क को तैयार करने में लगी लागत के मुताबिक आकलन किया जाए तो दिल्ली मेट्रो से दिखाई जा रही आमदनी का पता भी नहीं चलेगा।

तीसरी खास बात यह है कि दिल्ली मेट्रो का निर्माण जिस जमीन पर किया गया है वह उसे सरकार से मिली है। उसने इस जमीन को रियल एस्टेट के रूप में विकसित करने का काम किया है, जिससे आमदनी हो रही है। वास्तव में दिल्ली मेट्रो की कुल आमदनी का 40 प्रतिशत ही यात्री किराए से आ रहा है और इस तरह से दिल्ली मेट्रो का राजस्व फिर कम हो जाता है।

दूसरे शब्दों में कहें तो दिल्ली मेट्रो की आमदनी यात्री किराए से नहीं हो रही है, बल्कि यह आमदनी उसके रियल एस्टेट के कारोबार से हो रही है। प्रसंगवश- यह आमदनी अब कुल यात्री किराए से ज्यादा है। और अंत में एक यह भी तर्क दिया जाता है कि दिल्ली मेट्रो द्वारा तय किए गए मालिकाना हक की संरचना बहुत लंबे समय तक चल सकने वाली नहीं है।

दिल्ली मेट्रो में केंद्र और राज्य की हिस्सेदारी 50-50 प्रतिशत है। इस तरह से कोई भी इस पर अपना अधिकार नहीं चला सकता और न ही इसे कंपनी के रूप में चलाया जा सकता है। यह तर्क दिया जाता है कि इसकी संरचना स्वस्थ नहीं है। हो सकता है कि इनमें से हर तर्क के कुछ मायने हों। मेट्रो रेल, राजधानी के जन यातायात के लिए आदर्श नहीं हो सकती।

छूट पर मिले फंडों से हो सकता है कि दिल्ली मेट्रो की वित्तीय कार्यकुशता बढ़ी हुई नजर आ रही हो और इसका कोई खास योगदान न हो (हालांकि वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो हर जगह जन यातायात के लिए छूट पर धन उपलब्ध कराया जाता है)। दिल्ली मेट्रो को रियल एस्टेट के विकास से फायदा हुआ, हालांकि देश में अन्य किसी भी यातायात संचालन व्यवस्था को इस तरह की आमदनी नहीं हुई है। 

और आखिर में दिल्ली मेट्रो के मालिकाना हक के मामले में भी फायदा हुआ, जिसका संचालन वर्तमान प्रबंध निदेशक ई श्रीधरन जैसे प्रभावशाली व्यक्ति कर रहे हैं। लेकिन अगर वे अपना पद छोड़ देते हैं तो पूरा तंत्र ध्वस्त हो सकता है। इसलिए यह ऐसा मॉडल नहीं हो सकता जिसे अन्य शहरों में भी लागू किया जाए।

दिल्ली मेट्रो पर चल रही पूरी बहस इसके वित्तीय मॉडल, इसके मालिकाना हक और इसके द्वारा प्रयोग किए जा रहे रियल स्टेट से हो रही आमदनी तक ही सीमित रहती है। हकीकत यह है कि जन यातायात के इस संजाल में दी जा रही सुविधाओं और इसके कम किराए के मसले पर इस बहस में कोई जगह नहीं है।

देश में जन यातायात की सुविधाओं में बहुत ही कम सेवाएं ऐसी हैं, जिन पर चर्चा की जा सके और जब उनमें से एक सेवा आदर्श के रूप में उभरकर सामने आई है, तो शायद बेहतर यही होता कि इस बात पर बहस की जाए कि यह नेटवर्क किस तरह से काम करता है, बजाय इसके कि उसकी खामियां गिनाई जाएं।

वास्तव में 50:50 की साझेदारी वाले नमूने को, जिसे दिल्ली मेट्रो के वित्तीय मॉडल में अपनाया गया है, अन्य जन यातायात सेवाओं में भी अपनाया जा सकता है। यह प्रबंधतंत्र को काम करने की वैसी ही सुविधा मुहैया कराएगा, जिस तरह की स्वायत्तता का उपयोग दिल्ली मेट्रो के प्रमुख ई श्रीधरन कर रहे हैं।

हालांकि इस बात की कोई जरूरत नहीं है कि अन्य शहरों में दिल्ली मेट्रो की सहायक के रूप में सेवा का संचालन किया जाए। लेकिन उच्च प्रबंधन में स्वायत्तता का जो प्रारूप दिल्ली मेट्रो में अपनाया गया है, जिससे वह अपने लक्ष्यों को सफलतापूर्वक प्राप्त कर रही है, वह मॉडल अन्य शहरों के लिए अपनाया जा सकता है।

हैदराबाद मेट्रो मॉडल ने उम्मीद की एक नई किरण पैदा की है, जिसमें एक निजी क्षेत्र की इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनी एक जन यातायात परियोजना को लागू करने जा रही है। इसमें राज्य सरकार को कुछ भी खर्च नहीं करना होगा। इस परियोजना में भी पेंच यह है कि हैदराबाद मेट्रो रियल एस्टेट के विकास पर निर्भर करेगी, जो राजस्व का महत्वपूर्ण स्रोत है।

लेकिन जब निजी क्षेत्र के कारोबारी अपनी परियोजना के लिए भू-अधिग्रहण शुरू करते हैं तो तमाम बुनियादी समस्याएं आती हैं (जैसा कि विशेष आर्थिक क्षेत्रों और पोस्को के मामले में हाल ही में हुआ), ऐसे में इस बात की उम्मीद बेहद कम है कि हैदराबाद परियोजना से सरकार को बहुत बड़ा फायदा होने जा रहा है।

First Published - August 12, 2008 | 11:52 PM IST

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