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बारिश में धुलती महाशक्ति बनने की हसरतें

Last Updated- December 07, 2022 | 5:01 AM IST

हाल ही में मुंबई में स्थित अमेरिकी महावाणिज्य दूतावास ने अपने नागरिकों को मानसून के दौरान मायानगरी में नहीं आने की सलाह जारी की थी।


इस सलाह पर जो प्रतिक्रियाएं आईं, उनमें आश्चर्य के साथ-साथ विरोध के स्वर भी सुनाई दे रहे हैं। कुछ लोगों को यह सलाह अमेरिका की अति सावधानी की एक और मिसाल लग रही है।

एक ऐसी मिसाल जिसकी वजह से पहली दुनिया के लोगों को भीगी बिल्ली माना जाता। इस बारे में बृहत मुंबई नगर निगम के आयुक्त जयराज पाठक ने केवल इतना कहा कि, ‘इस वक्त मुंबई में करीब 1.5 करोड़ लोग रह रहे हैं और वे सभी सुरक्षित हैं।’ हालांकि, एक दूसरे अखबार को उन्होंने कहा कि वह खुद भी अपने रिश्तेदारों को बारिश के इस मौसम में मुंबई नहीं आने की ही सलाह देंगे।

लेकिन पाठक एक बड़ी बात को नजरअंदाज कर रहें हैं। न सिर्फ मुंबई की आबादी आज की तारीख में 1.9 करोड़ के आस-पास पहुंच चुकी है, बल्कि अमेरिकी महावाणिज्य दूतावास ने दूसरी बार इस तरह की सलाह जारी की है। इससे भी बड़ी बात यह है कि यह सलाह उन नागरिक सेवाओं की क्वालिटी पर तीखा प्रहार है, जो पाठक साहब का संगठन मुहैया करवाता है।

बड़े स्तर पर देंखे तो यह अपने सलाह अपने मुल्क में शहरीकरण की घटिया हालत की पोल खोलता है। दुनिया के सभी बड़े शहरों को साल भर में कभी न कभी बुरे मौसम का सामना करना पड़ता है। दुनिया की दो वित्तीय राजधानियों में से एक, लंदन पर तो लगभग साल भर ही बारिश के बादल मंडराते रहते हैं। कब कहां झमाझम बारिश हो जाए, इस बात का भी ठिकाना नहीं रहता।

आप कहेंगे, तो क्या हुआ यूरोप तो काफी विकसित महाद्वीप है। तो चलिए, एशिया की ही बात करते हैं। सिंगापुर में तो नवंबर और दिसंबर को छोड़ दें, तो यहां बाकी के 10 महीनों में काफी चिपचिपी गर्मी होती है। ऊपर से हर मानसून में मलेरिया फैलने का खतरा होता है, सो अलग। दूसरी तरफ, दुबई में गर्मी के मौसम में पारा 50 डिग्री के भी ऊपर चला जाता है। इसकी वजह से हर साल वहां भी कई लोगों की जान जाती है।

यहां तक की बीजिंग में भी, साल भर काफी तेज हवाएं चलती रहती हैं। सर्दी के मौसम में यहां काफी बर्फ भी पड़ती है। फिर भी अमेरिकी महावाणिज्य दूतावासों ने तो मौसम की वजह से इन शहरों में आने के खिलाफ अपने नागरिकों के लिए कोई सलाह जारी नहीं की। उलटे इन शहरों में तो भारत के किसी भी शहर के मुकाबले ज्यादा सैलानी आते हैं। इसकी वजह यह है कि ये और इन जैसे एशिया के कई दूसरे शहर अपने लोगों और सैलानियों को मौसम की दिक्कतों से बचा कर रखते हैं।

जब पाठक यह कहते हैं कि मुंबई के लोगों को कोई खतरा नहीं है, वह केवल एक खास तबके की बात करते हैं। साथ ही. इस बात से उनकी कमजोर याददाश्त का भी पता चलता है। पक्के घरों में रहने वाले अमीर और मध्यम वर्ग के लोग तो इस बारिश से महफूज हैं, लेकिन मुंबई के स्लम्स में रहनी वाली बड़ी आबादी का क्या? वे तो इस बारिश से कतई महफूज नहीं हैं।

हर साल की तरह इस बार भी बारिश उनके लिए बजबजाती गंदी नालियां उनके लिए कई बीमारियों की सौगात लेकर आई है। साथ ही, उनके सिर के ऊपर की छत के छीन जाने का खतरा पैदा हो गया है। दरअसल, हर साल बारिश अपने साथ कई लोगों के घरों को भी बहाकर ले जाती है। जुलाई, 2005 में तो बारिश ने मुंबई की कभी न रुकने वाली जिंदगी को भी रोक दिया था।

उस दौरान करंट लगने से, डूबने से या फिर भूस्खलन की वजह से मरने वाले ज्यादातर लोग-बाग निचले तबके से संबंधित हुआ करते थे। इस त्रासदी के खत्म होने के बाद भी कई लोगों की जानें उसकी वजह से गई थी। उस बाढ़ की वजह से मरने वाले लोगों की तादाद लंदन में हुए बम हमलों में मारे गए लोगों से भी ज्यादा थी। 

दूसरे शहरों में रहने वालों की तरह मुंबइकर भी, चाहे वे अमीर या गरीब, विदेशियों की तुलना में कहीं ज्यादा महफूज हैं। दरअसल हम लोग कमोबेश घटिया नागरिक सेवाओं की वजह से पैदा होने वाले खतरों के लिए तैयार रहते हैं। लेकिन विदेशी मेहमानों के साथ दिक्कत यह है कि उन्हें अच्छी नागरिक सेवाओं की आदत होती है। उनके वास्ते तो खुले हुए मेनहोल भी बड़ी मुसीबत साबित हो सकते हैं। 

मुंबई में ऐसी कई खासियतें हैं, जो देश के लिए शान की बात साबित हो सकते हैं। यह रिलायंस, टाटा समूह और आदित्य बिड़ला समूह जैसीं मुल्क की कुछ सबसे बड़ी कंपनियों का मुख्यालय है। इन सभी कंपनियां की तरफ दुनिया का ध्यान है। साथ ही, उन्हें काफी इज्जत भी मिल रही है। यह देश की वित्तीय राजधानी है।

अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री पी. चिदंबरम साहब ने मुंबई की शान में कहा था कि यह शहर आज एशिया के तीसरे सबसे बड़े (नैशनल स्टॉक एक्सचेंज) और पांचवें सबसे बड़े (बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज) स्टॉक एक्सचेंजों का घर बन चुका है। वर्ल्ड बैंक के मुलाजिम रह चुके पर्सी मिस्त्री ने मुंबई को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्र बनाने के बारे में एक काफी बड़ा और काफी चर्चित रिपोर्ट लिखा था।

लेकिन इस शहर की घटिया नागरिक सेवाएं इन बातों की महत्ता को खत्म कर देती है। अब तो इससे संयम बांधे लोग-बाग भी त्रस्त हो गए हैं। यह केवल मुंबई की ही नहीं, ज्यादातर भारतीय शहरों की हकीकत है। फिर चाहे वो दिल्ली हो या बेंगलुरू या हैदराबाद या फिर पुणे, सभी की कहानी एक सी है। एक अजीब सी सच्चाई यह है कि जितनी तेजी से मुल्क ने तरक्की की सीढ़ियां चढ़ी हैं, उतनी ही तेजी से हमारे शहरों की नागरिक सेवाओं की हालत पस्त हुई है।

भले ही अखबार हमें भविष्य का सुपरपॉवर कहें, लेकिन हकीकत यही है कि हमारे शहरों की हालत तो दूसरे विकासशील एशियाई मुल्कों के शहरों से बदतर है। मुंबई भारत में मौजूद शहरी संकट की एक बानगी भर है। यह भी अनिश्चित ही है कि जवाहरलाल नेहरू शहरी पुनर्विकास मिशन जैसी योजनाएं भी उस बदलाव को ला पाएंगी, जिसकी जरूरत तेजी से विकास कर रहे हमारे मुल्क को है। इस मामले में अमेरिकी सलाह को दो तरीके से लिया जा सकता है। या तो पाठक की तरह हम भी इसे छोटी-मोटी बात मानकर भूल जाएं या फिर इसे एक खुद को बदलने की एक कोशिश में बदल दें, ताकि अपना भारत विश्व स्तरीय बन सके। 

First Published - June 11, 2008 | 11:30 PM IST

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