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सरकारी फैसले से निराशा

Last Updated- December 07, 2022 | 8:45 PM IST

बेहतरीन किस्म के गैर बासमती चावल के निर्यात पर सरकार ने जो पाबंदी हटाई है, इस कदम से चावल उत्पादकों और निर्यातकों को खुश होना चाहिए था, बावजूद इसके यह तबका निराश है।


बासमती उत्पादक क्षेत्र में चावल की पूसा-1121 किस्म बड़े पैमाने पर उगाई जाती है। सरकार के इस फैसले से बेहतरीन किस्म के बासमती चावल पर असर पड़ सकता है। पिछले कई साल से बासमती चावल के वैश्विक बाजार पर इस देसी बासमती चावल का दबदबा रहा है। अपनी सुगंध, पतले और लंबेपन जैसी विशिष्ट खूबियों की वजह से इसका नाम ‘लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ‘ में शुमार हो चुका है।

भारत और पाकिस्तान में पैदा होने वाली बासमती की दूसरी किस्मों के बनिस्बत यह सबसे अधिक कीमत पर बेचा जाता है। निर्यातकों को चिंता सता रही कि इस चावल की कीमतों में कमी आ जाएगी क्योंकि यह पहले से ही गैर बासमती चावल के तौर पर वैश्विक बाजार में बेचा जा रहा है।

गैर बासमती चावल के तौर पर पूसा-1121 उस छूट से वंचित रह जाएगा जो यूरोपीय संघ बासमती चावलों को देता है। वहीं चावल उत्पादकों ने कई अलग-अलग कारणों से पूसा-1 समेत बासमती चावल की दूसरी किस्में उगाना बंद कर दिया है। इसमें भी सबसे खराब बात यह है कि सरकार ने बासमती की जिस किस्म को अधिसूचित किया है, उसका उत्पादन बहुत सीमित है।

इस वजह से भारत से बासमती चावल का निर्यात घट सकता है और वैश्विक बाजार में भारत की हिस्सेदारी कम हो सकती है। इस स्थिति से हमारा पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान फायदे में रहेगा क्योंकि बासमती चावल के निर्यात में पाकिस्तान भी अहम खिलाड़ी है और भारत को इस मोर्चे पर भी उससे जूझना पड़ता है। वैश्विक बासमती बाजार में पूसा-1121 किस्म देश के लिए ट्रंप कार्ड बन चुकी है।

यह किस्म राष्ट्रीय कृषि शोध तंत्र के कार्यक्रम ‘बासमती विकास और सुधार कार्यक्रम’ के तहत विकसित की गई है। कृषि मंत्रालय भी मई में घोषणा कर चुका कि पूसा-1121 किस्म बासमती चावल के मानदंड पर पूरी तरह से खरी उतरती है। बासमती चावल के व्यावसायिक उत्पादन के लिए पंजाब को उपयुक्त बताया गया है।

अधिसूचना जारी करते हुए वाणिज्य मंत्रालय और विदेश व्यापार महानिदेशालय ने इन सब बातों को नजरअंदाज किया। बासमती चावल को परिभाषित करने में कुछ दिक्कतें जरूर हैं। दूसरे सुगंधित चावलों को विशेष श्रेणी में रखा जाना चाहिए। व्यापार से संबंधित ट्रिप्स समझौते के भौगोलिक पहचान(जीआई) प्रावधान के दायरे में भी यह बेहतरीन चावल आता है।

यह खास इसलिए भी है कि केवल भारत ने ही बासमती चावल को जीआई के दायरे में लाने की बात नहीं की थी, पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में भी बासमती चावल उगाया जाता है। सबसे आदर्श स्थिति यही है कि भारत और पाकिस्तान को इस मामले में साथ मिलकर कुछ कदम उठाने होंगे।

लेकिन इसका निराशाजनक पहलू यह भी है कि सीमा के उस पार से सहयोग के संकेत नहीं मिल रहे हैं। फिलहाल तो घरेलू बौद्धिक संपदा अधिकार कानून के दायरे में ही तत्काल कुछ कदम उठाने की जरूरत है। वैसे पूसा-1121 के लिए नई अधिसूचना जारी करके अभी भी इस भूल को दुरुस्त किया जा सकता है।

First Published - September 11, 2008 | 10:36 PM IST

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