भारत का हित इसी बात में है कि देश के सत्ताधारी नेता चमकदार अंतरराष्ट्रीय आयोजनों के बजाय घरेलू समस्याओं को हल करने में अधिक ध्यान दें। सुझाव दे रहे हैं जैमिनी भगवती
शासन प्रमुखों के स्तर पर होने वाली विभिन्न देशों की बैठकें धूमधाम से किया जाने वाला आयोजन होती हैं और मीडिया भी इन्हें खूब तरजीह देता है। तमाम देशों के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भी ऐसे स्वप्रचार का लाभ लेते हैं जहां उनके नाम और वीडियो तमाम समाचार पत्रों और टेलीविजन चैनलों पर नजर आते हैं। भारत सरकार को इस बात की समीक्षा करनी चाहिए कि मंत्रियों और प्रधानमंत्री के स्तर पर ऐसी अंतरराष्ट्रीय बैठकों पर स्वयं शामिल होने की अवसर लागत क्या चुकानी पड़ती है। खासतौर पर ऐसी बैठकों में शामिल होने का जो एक तय प्रारूप में होती हैं।
कोविड-19 महामारी के कारण 2020 और 2021 में कई उच्चस्तरीय सरकारी और कॉर्पोरेट बैठकें आभासी ढंग से आयोजित की गईं। इससे समय की काफी बचत हुई। जून-जुलाई 2022 में नाटो, यूरोपीय संघ और जी7 देशों के शासन प्रमुख स्तर की बैठक दोबारा व्यक्तिगत भागीदारी वाली बैठकों में बदल गई। अभी हाल ही में 16 सितंबर को शांघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की शिखर बैठक उजबेकिस्तान के समरकंद शहर में आयोजित की गई जिसमें भारत के प्रधानमंत्री, रूस और चीन के राष्ट्रपति तथा अन्य सदस्य देशों के राष्ट्रप्रमुख सभी उपस्थित थे।
बैठक में भारतीय प्रधानमंत्री ने बेहतर आपूर्ति श्रृंखलाओं तथा पारगमन के संपूर्ण अधिकारों की बात कही। क्या निकट भविष्य में पाकिस्तान भारत को अपने क्षेत्र में से पारगमन की सुविधा दे सकता है? जहां तक चीन की बात है 16 सितंबर को एससीओ शिखर बैठक के दिन उसने भारत और अमेरिका के लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी साजिद मीर को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के 1267 अल कायदा प्रतिबंधित समिति के तहत काली सूची में डालने के प्रयासों को रोक दिया था। 26 नवंबर के मुंबई हमलों के लिए अमेरिका ने मीर पर 50 लाख डॉलर का इनाम रखा है। चीन के साथ भारत के द्विपक्षीय रिश्ते भी लद्दाख सीमा पर सशस्त्र संघर्ष के कारण इतने उलझे हैं कि किसी बहुपक्षीय बैठक से इतर आपसी चर्चा मुश्किल है।
जी20 की अगली बैठक नवंबर में इंडोनेशिया में होनी है। इस बात की संभावना बहुत कम है कि यूक्रेन को लेकर पश्चिमी देशों और रूस के मतांतर के बीच वह सफल हो सकेगी। पाकिस्तान और चीन के साथ भारत के मौजूदा रिश्तों को देखते हुए क्या उन देशों के प्रमुख भारत में होने वाली 2023 की एससीओ और जी20 देशों की बैठक में शामिल होंगे? भारत को शायद इन दो शिखर बैठकों से अपनी अपेक्षाएं कम करनी चाहिए।
बीते कुछ दशकों में और खासकर 2008 के वित्तीय संकट के बाद जी20 देशों को शासन प्रमुखों की बैठक में परिवर्तित किए जाने के बाद भारतीय प्रधानमंत्री लगातार जी20 तथा अन्य बहुपक्षीय बैठकों में शामिल हुए हैं। बहरहाल, जरूरी नहीं है कि मीडिया में होने वाली कवरेज से सत्ताधारी राजनीतिक दलों की तकदीर चमके। ऐसा इसलिए कि सन 1981 के बाद पैदा होने वालों के समाचार पत्र पढ़ने या नियमित टेलीविजन चैनल देखने की संभावना कम ही है। मीडिया घरानों को यह बात पता है। जहां तक ग्रामीण और छोटे कस्बों की बात है, उनके लिए खबरों का स्रोत सोशल मीडिया बचा है।
अपनी अहम जनांकिकी तथा प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद एशिया अपनी क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाया है। बहरहाल, यह केवल समय की बात है और वह दिन दूर नहीं जब एशिया का समग्र आर्थिक वजन और भौतिक आकार भूराजनीति में अधिक अहमियत के साथ सामने आएगा। बहरहाल, प्रतिव्यक्ति आय के मामले में भारत समेत कई एशियाई देशों को अभी काफी कुछ हासिल करना है।
भारत के घरेलू मसलों की बात करें तो दक्षिण भारत के राज्य उत्तर भारत के राज्यों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से विकसित हो रहे हैं। इसकी वजह से देश के उत्तरी और दक्षिणी राज्यों के बीच केंद्रीय राजस्व के बंटवारे को लेकर गंभीर विवादों की स्थिति पैदा हो सकती है। एक अन्य संभावित और बड़े विवाद का विषय बन सकता है वह है लोकसभा सीटों का नए सिरे से परिसीमन। पिछली बार यह काम 2001 की जनगणना के आधार पर किया गया था और 2026 में इसकी समीक्षा होनी है। संयोग की बात है कि तमिलनाडु के वित्त मंत्री ने हाल ही में बेहद आक्रामक ढंग से कहा कि उनके राज्य की वित्तीय स्थिति केंद्र सरकार की तुलना में काफी बेहतर है तथा उसकी वृद्धि दर भी राष्ट्रीय औसत से अधिक है। इससे इतर सर्वोच्च न्यायालय को ऐसे मसलों से निपटना पड़ रहा है जिन्हें केंद्र और राज्यों के सत्ताधारी राजनीतिक दलों द्वारा निपटाया जानी ही बेहतर है। इनमें तमाम तरह के विवाद शामिल हैं। उदाहरण के तौर पर धार्मिक उपासना स्थलों से लेकर सरकारी नौकरियों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग का कोटा आदि। एक अलग समस्या यह भी है कि राज्यों के बिजली निगम पारेषण तथा वितरण के नुकसान से बुरी तरह त्रस्त हैं। कई राज्यों द्वारा प्रदान की जा रही भारी भरकम सब्सिडी उनकी मुश्किल लगातार बढ़ाती आ रही है। भारतीय रिजर्व बैंक के जुलाई 2022 के बुलेटिन के मुताबिक पंजाब, राजस्थान और झारखंड वित्तीय रूप से खासतौर पर कमजोर हैं।
वित्तीय मोर्चे पर मुश्किलों की एक और वजह गैर जरूरी सब्सिडी भी है। उदाहरण के लिए उर्वरक सब्सिडी। ऐसी तमाम सब्सिडी को समाप्त किया जाना चाहिए तथा जिन लोगों के ना पर कार नहीं है तथा जो 21 वर्ष से अधिक आयु के हैं उनको सार्वभौमिक बुनियादी आय समर्थन दिया जाना चाहिए। प्रवर्तन निदेशालय को बहुत अधिकार सौंपे गए हैं और इसे लेकर मीडिया रिपोर्ट में भी लगातार सवाल उठ रहे हैं। इसके साथ ही केंद्र सरकार के पसंदीदा अधिकारियों को मिल रही नियुक्तियों और उनके सेवा विस्तार के मसले को भी सही ढंग से हल करने की आवश्यकता है।
कुल मिलाकर देखा जाए तो अगर केंद्र सरकार विवादित मसलों पर राज्य सरकारों के साथ बातचीत करे तो अधिक बेहतर होगा। वस्तु एवं सेवा कर के मसले पर वह ऐसा करके एक आम सहमति से निर्णय लेने की स्थिति में पहुंच सकी है। सभी बातों पर विचार करते हुए देखें तो यह बात भारत के हित में होगी कि केंद्र सरकार तात्कालिक घरेलू चुनौतियों को हल करने पर ध्यान दे बजाय कि चमकदार अंतरराष्ट्रीय बैठकों को तवज्जो देने के।
(लेखक भारत के पूर्व राजदूत एवं वर्तमान में सेंटर फॉर सोशल ऐंड इकनॉमिक प्रोग्रेस के फेलो हैं)