बुखार में काम आने वाली ओवर द काउंटर (बिना चिकित्सक के पर्चे के दी जा सकने वाली) पैरासिटामॉल दवा बनाने वाली बेंगलूरु की माइक्रो लैब्स पर हाल ही में आयकर विभाग ने छापा मारा। यह दवा कोविड-19 महामारी के दौरान जमकर इस्तेमाल की गई। इस बात ने औषधि कंपनियों और चिकित्सा से जुड़े पेशेवरों के बीच नैतिक आचरण एवं व्यवहार सुनिश्चित करने के लिए आचार संहिता की ओर नए सिरे से ध्यान आकृष्ट किया है। कर वंचना के अलावा माइक्रो लैब्स पर यह आरोप भी है कि कंपनी ने कोविड-19 के मरीजों को डोलो 650 दवा लिखने के लिए चिकित्सकों को करीब 1,000 करोड़ रुपये की राशि रिश्वत में दी। इसका नतीजा यह हुआ कि कंपनी की दवा अन्य प्रतिस्पर्धी दवाओं की तुलना में अधिक बिकी। यह विडंबना ही है कि यह ताजा विवाद देश में ‘अतिशय मार्केटिंग’ गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए एक संहिता की मौजूदगी के बावजूद उत्पन्न हुआ है। यह संहिता 2015 में बनाई गई थी ताकि कंपनियां चिकित्सकों पर अपना खास ब्रांड लिखने के लिए दबाव न बनाएं। परंतु इस संहिता के स्वैच्छिक होने के कारण यह प्राय: बेअसर साबित हुई।
सर्वोच्च न्यायालय फिलहाल एक याचिका पर सुनवाई कर रहा है ताकि औषधि विपणन व्यवहार के लिए समान संहिता (यूसीपीएमपी) को सांविधिक जरूरत बनाया जा सके। यह निहायत आवश्यक है क्योंकि चिकित्सकों और औषधि कंपनियों के बीच का गठजोड़ किसी से छिपा नहीं है। अपने सबसे आम और अहानिकारक रूप में इसके जरिये चिकित्सकों को ब्रांडेड स्टेशनरी, कैलेंडर और मेज पर रखने वाली चीजें भेजी जाती हैं ताकि भीड़ भरे बाजार में वे उनके उत्पादों को वरीयता दे सकें। भारत जैसे बाजार में यह बात खासतौर पर महत्त्वपूर्ण है जहां कई जरूरी दवाओं पर मूल्य नियंत्रण लागू है। इस गठजोड़ का ज्यादा गंभीर उदाहरण यह है कि चिकित्सकों को चिकित्सा सेमीनारों के नाम पर मौज मस्ती के लिए ले जाया जाता है या फिर चिकित्सकीय परीक्षणों में प्रमुख जांचकर्ता के रूप में काम करने अथवा शोध पत्रों को आगे बढ़ाने के लिए पैसे दिए जाते हैं।
जानकारी के मुताबिक सांविधिक संहिता के अधीन सभी औषधि कंपनियां चिकित्सकों अथवा उनके संगठनों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से चुकाई जाने वाली राशि का खुलासा करेंगी। यह एक समझदारी भरा सुझाव प्रतीत होता है लेकिन यह प्रश्न बरकरार है कि स्वैच्छिक संहिता को सांविधिक संहिता में बदलने से क्या हालात वाकई बदलेंगे, भले ही भारी भरकम जुर्माना लगा दिया जाए। संहिता को प्रभावी बनाने के लिए कई शर्तें पूरी करनी होती हैं। इस तरह का व्यवहार केवल भारत में नहीं बल्कि दुनिया भर में होता है। परंतु विकसित देशों में कड़े नियमन और मजबूत व्हिसलब्लोअर नीति ने यह सुनिश्चित किया है कि ऐसे घटनाक्रम समय-समय पर उजागर होते रहें। भारत में व्हिसलब्लोअर संरक्षण न्याय प्रणाली के कारण अभी भी काफी कमजोर है। परंतु भारतीय प्रशासनिक जगत की एक विशिष्ट दिक्कत यूसीपीएमपी को प्रभावित कर सकती है। यह समस्या है न्याय क्षेत्र के अतिक्रमण की।
फिलहाल यूसीपीएमपी का दायरा रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के अधीन आने वाले औषधि विभाग तथा स्वास्थ्य मंत्रालय के बीच विवाद का विषय है। स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि यूसीपीएमपी को औषधि, चिकित्सा उपकरण तथा प्रसाधन सामग्री अधिनियम के अधीन लाया जाना चाहिए लेकिन औषधि विभाग इस बड़े और तेजी से विकसित होते उद्योग पर नियंत्रण छोड़ना नहीं चाहता। इस अहम नियामकीय काम पर चाहे जिस संस्थान को नियंत्रण मिले, उसे इतनी संस्थागत क्षमता रखनी होगी कि 3,000 से अधिक कंपनियों और 10,500 से अधिक विनिर्माण इकाइयों वाले इस विशालकाय उद्योग में गड़बड़ियों पर नजर रख सके। इस संदर्भ में देखा जाए तो नकली दवाओं के प्रसार को रोकने में अक्षमता यूसीपीएमपी के प्रवर्तन को लेकर बहुत भरोसा नहीं पैदा करती।