जब सरकार ने वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने की घोषणा की थी तब लगा था कि कुछ ज्यादा ही ऊंचा लक्ष्य तय कर लिया गया है। परंतु अगर व्यवस्थित अध्ययनों पर आधारित ताजा प्रमाणों पर गौर किया जाए तो ऐसा प्रतीत होता है कि यह लक्ष्य हासिल करने में हम पूरी तरह नहीं चूके हैं। तथ्य तो यह है कि मुद्रास्फीति के समायोजन के बाद किसानों की आय में दोगुना इजाफा हुआ है या फिर कई राज्यों में हम इसके आसपास पहुंच चुके हैं। गन्ने, काजू, चाय, कॉफी अथवा रबर जैसी वाणिज्यिक फसलों के मामले में ऐसा देखने को मिला है। कई मामलों में जहां हम पिछड़े हैं वहां भी अंतर बहुत अधिक नहीं है। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के आर्थिक शोध विभाग तथा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के अध्ययन कुछ ऐसा ही बताते हैं।
एसबीआई की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2017-18 और 2021-22 के बीच देश भर में किसानों की औसत आय 1.3 से 1.7 गुना बढ़ी है। कुछ फसलों मसलन महाराष्ट्र में सोयाबीन और कर्नाटक में कपास के मामले में इस अवधि में प्रतिफल दोगुना रहा है। अध्ययन के बारे में दावा किया गया है कि इसमें बड़े, छोटे और सीमांत सभी तरह के किसानों को शामिल किया गया है। अध्ययन में कहा गया है कि कृषि से संबद्ध तथा गैर कृषि गतिविधियों ने भी उनका राजस्व बढ़ाने में मदद की है। बल्कि इन स्रोतों से हासिल होने वाला प्रतिफल 1.4 से 1.8 गुना तक रहा। यह बात राष्ट्रीय नमूना सर्वे के 77वें दौर के निष्कर्षों से भी मेल खाती है जिसमें संकेत दिया गया है कि खेती से होने वाली आय के स्रोतों में काफी विविधता आई है और अब वे केवल फसली खेती और पशुपालन तक सीमित नहीं हैं।
आईसीएआर की रिपोर्ट सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 75,000 किसान परिवारों के केस अध्ययन पर आधारित है। यह रिपोर्ट और अधिक आश्वस्त करने वाली तस्वीर पेश करती है। इस रिपोर्ट के अनुसार खेती से होने वाली आय में शुद्ध वृद्धि में काफी अंतर है और यह लद्दाख में 125 फीसदी तथा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में 270 प्रतिशत तक बढ़ी। उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और पुदुच्चेरी जैसे राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों में किसानों की आय 200 प्रतिशत से अधिक बढ़ी है। अधिकांश अन्य राज्यों में यह वृद्धि 150 से 200 प्रतिशत के बीच रही। बहरहाल, दोनों रिपोर्ट में आय वृद्धि के कारकों को लेकर उनके-उनके पूर्वग्रहों को स्पष्ट महसूस किया जा सकता है। एसबीआई की रिपोर्ट में न्यूनतम समर्थन मूल्य में नियमित इजाफे को वृद्धि के प्रमुख कारक के रूप में रेखांकित किया गया है जो आमतौर पर बाजार मूल्य के मानक तय करती है। वहीं आईसीएआर की रिपोर्ट तकनीकी हस्तक्षेप को इसकी वजह बताती है। तथ्य यह है कि इन दोनों कारकों ने अपनी-अपनी भूमिका निभाई है और एक दूसरे के पूरक के रूप में काम किया है। लेकिन एक बात और साफ तौर पर जाहिर है कि किसान अभी भी फसल बढ़ाने वाले कच्चे माल के लिए कर्ज पर काफी हद तक निर्भर हैं और किसान क्रेडिट कार्ड की शुरुआत के बावजूद यह कर्ज आसानी से उपलब्ध नहीं है। एसबीआई की रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि इन कार्ड को ‘आजीविका क्रेडिट कार्ड’ में बदल दिया जाए। इस पर विचार किया जाना चाहिए क्योंकि इससे किसानों को साहूकारों के चंगुल से निकालने में मदद मिलेगी जो उनकी आय का एक बड़ा हिस्सा हथिया लेते हैं।
एक तथ्य यह भी है कि सरकार की कृषि मूल्य नीतियां अभी भी कृषि आय को निर्धारित करने वाला प्रमुख कारक हैं। इन नीतियों का लक्ष्य उत्पाद बढ़ाने के बजाय आय बढ़ाना करना होगा। एम एस स्वामिनाथन की अध्यक्षता वाले नैशनल कमीशन ऑन फार्मर्स ने भी इस बात पर जोर दिया था। खाद्य मुद्रास्फीति पर नियंत्रण की नीतियां बनाते समय किसानों के आर्थिक हितों की अनदेखी नहीं की जा सकती है। यदि ऐसा किया गया तो किसानों की आय को दोगुना करने का लक्ष्य दूर बना रहेगा।