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दोहरी नौकरी का ज्वालामुखी फूटने के कगार पर

Last Updated- December 11, 2022 | 2:05 PM IST

क्यों एक ही समय दो नौकरी के मुद्दे पर मालिकों और कर्मचारियों में तनाव बढ़ रहा है? इसका आकलन कर रहे हैं इंद्रजित गुप्ता  
दोहरी नौकरी ज्वलंत मुद्दा बन चुका है। इस पर कर्मचारियों के एक बड़े समूह में अंसतोष पनप रहा है जिसे भांपना मुश्किल नहीं है। इस मसले से सर्वमान्य हल के जरिये कैसे निपटा जाए, इसको लेकर असमंजस बना हुआ है। इसका आंशिक कारण यह है कि इस मुद्दे पर दोनों पक्षों ने कड़ा रुख अपना लिया है और कोई भी आसानी से झुकने को तैयार नहीं है।
इस खींचतान वाली स्थिति में एक तरफ विप्रो है। उसके कार्यकारी चेयरमैन रिशद प्रेमजी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने दोहरी नौकरी (मूनलाइटिंग) पर लक्ष्मण रेखा खींच दी। उन्होंने यहां तक कह दिया कि दोहरी नौकरी साफ-साफ धोखाधड़ी है। उन्होंने कहा कि विप्रो के 300 कर्मचारियों को गैरकानूनी रूप से दोहरी नौकरी करने के कारण संस्थान से बाहर का रास्ता दिखाया गया। इसके बाद से हर अगले दिन इन्फोसिस, टीसीएस और आईबीएम अपने संस्थान के कर्मचारियों के दूसरे संस्थान में नौकरी करने से हो रहे नुकसान को उजागर कर रहे हैं। साथ ही दोहरी नौकरी को जड़ से खत्म करने की बात कह रहे हैं।
इस मुद्दे के दूसरे छोर पर टेक महिंद्रा के मुख्य कार्या​धिकारी सी पी गुरनानी है। गुरनानी ने आईटी कंपनियों के इस रुख में शामिल नहीं होने का विकल्प चुना है। आईटी क्षेत्र के मोहनदास पई अपने बयानों के कारण कई बार विवादों में रहे हैं। पई ने जोरदार ढंग से कर्मचारियों का पक्ष लिया। उन्होंने कहा कि आईटी क्षेत्र में युवा कर्मचारियों का कई सालों तक शोषण होता है। संगठन के पिरामिड में सबसे निचले पायदान पर रहने वाले इन कर्मचारियों को वेतन वृद्धि भी नहीं मिलती है।
इस मामले पर बीते कुछ दिनों के दौरान केंद्रीय कौशल विकास और उद्यमिता विकास मंत्री राजीव चंद्रशेखरन और इन्फोसिस के गैर कार्यकारी चेयरमैन नंदन निलेकणी ने ‘जेनरेशन शिफ्ट’ (पीढ़ी की सोच में बदलाव) के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि क्यों कंपनियां काम करने के नए तरीकों के बारे में नहीं सोचती हैं। नियोक्ता को ऐसे कर्मचारियों की पहचान और उनके सपनों का तोड़ना नहीं चाहिए।
ऐसे में इसका हल निकालना बेहद मुश्किल हो गया है? मुख्य मामला यह है : दो बिल्कुल अलग तरह की सोच हैं और इन्हें समझौतावादी रुख के लिए तैयार करना मुश्किल लगता है। इस बारे में आम लोगों के स्तर पर तर्कपूर्ण चर्चा शुरू होने पर दोनों पक्ष अपने रुख की समीक्षा करेंगे और अपने से सवाल पूछ सकते हैं। लेकिन इस मसले पर आम लोगों के स्तर पर ही दो कट्टर समूह बन गए तो ऐसे में स्थिति खराब होने के लिए तैयार रहना चाहिए।
कल्पना कीजिए कि आप दोहरी नौकरी के खिलाफ हैं : अगर आप बड़ी आईटी फर्म हैं या मध्यम आकार की आईटीईएस फर्म हैं तो आप इस दोहरी नौकरी के मुद्दे को खत्म करने के लिए एक या एक से अधिक तरीके अपनाएंगे। पहला, कर्मचारियों पर नजर रखेंगे या निगरानी करेंगे। रिमोट पर कर्मचारियों की उत्पादकता पर नजर रखने के लिए आर्टिफिशल इंटेलीजेंस के कई सॉफ्टवेयर उपलब्ध हैं। चोरी छिपे रूप से कई फर्म यह स्वीकार कर चुकी हैं कि वे कर्मचारी के ‘कीस्ट्रोक’ (कंप्यूटर के प्रयोग) की निगरानी कर रही हैं। इससे उन्हें यह पता चल जाता है कि कर्मचारी ने ऑफिस के कंप्यूटर पर कितनी देर और कितना काम किया है।
यदि कर्मचारी की दिन में आठ घंटे की पाली है तो वह दफ्तर के मुख्य काम को नुकसान पहुंचाने वाले काम को छोड़कर अन्य काम कर सकता है। कानून कर्मचारी को अपने हिसाब से काम करने की इजाजत देता है। हालांकि कर्मचारी की इस तरह से निगरानी करने से यह आशंका बढ़ जाती है कि शीघ्र ही कर्मचारी की निजता का अतिक्रमण शुरू हो जाएगा।
दूसरा, अगर कई संगठनों ने अभी तक कर्मचारियों की अनुबंध की शर्तों को कड़ा नहीं किया है तो वे इसे कड़ा कर सकते हैं। नई शर्तें जोड़ी जा सकती हैं। इसमें सबसे घातक यह उपबंध हो सकता है कि दूसरी जगह नौकरी करने पर पकड़े जाने पर कर्मचारी को बिना नोटिस के नौकरी से निकाल दिया जाएगा। उसकी सेवाएं बर्खास्त की जा सकती हैं।
तीसरा, कारोबार के कई दिग्गजों का मानना है कि कहीं से भी कार्य करने की संस्कृति के कारण दोहरी नौकरी का प्रचलन बढ़ा है। व्यापक स्तर पर ऐसी नीतियां बनाई जाएंगी कि कर्मचारी हाई ब्रिड काम करने के तरीके में 70:30 को अपनाना ही होगा। दो साल से घर या कहीं और से काम करने वाले कर्मचारी अब ऑफिस आने के इच्छुक नहीं हैं। इस तरह के फरमान जारी होने से बाजार में अपने हुनर बेचने में समर्थ कर्मचारीगण व्यापक स्तर पर त्यागपत्र दे सकते हैं।
यह स्पष्ट है कि अगर फर्म कड़ा रुख अपनाती हैं तो इससे नियोक्ता और कर्मचारी के विश्वास की बुनियाद हिलेगी। अभी नियोक्ता लगातार परेशान हो रहे हैं कि कर्मचारी तेजी से एक छोड़कर दूसरी नौकरी पकड़ रहे हैं। नौकरी के बारे में अंतिम स्तर तक बातचीत करके पीछे हट रहे हैं। आईटीईएस फर्म के एक संस्थापक ने कहा कि वरिष्ठ स्तर पर आधी से ज्यादा नियुक्तियों में लोग नौकरी करने का पत्र स्वीकार करने के बावजूद नौकरी करने नहीं आते हैं। वे अपने लिए सबसे अच्छी कार्यदशाएं वाली नौकरी खोजने की फिराक में रहते हैं। कई बार तो हालिया पेशकश से 50 गुना अधिक की बढ़ोतरी हासिल कर लेते हैं। उन्होंने कहा कि जब तक बाजार में नौकरियां कम नहीं होंगी तब तक ऐसा अनैतिक व्यवहार आसानी से जाने वाला नहीं है। 
अच्छे खासे आर्थिक कोष से बनी स्टार्टअप अपना काम धंधा जमाने के लिए कर्मचारियों को मुंह मांगे दाम पर नौकरियां मुहैया करा रही हैं। जब ऐसी स्टार्टअप कंपनियों की माली हालत खराब होगी तो छंटनी का दौर शुरू होगा। ऐसी स्थिति में ज्यादा पैसा मिलने पर नौकरी बदलने के रुख में कुछ लगाम लगेगी।
यदि आप दोहरी नौकरी करते हैं : कोरोना के दौरान कंपनियों ने अपनी कुछ नीतियां तय कर ली थीं। उन्होंने कर्मचारियों को नौकरी से नहीं निकाला था और वेतन या भत्तों में भी कटौती नहीं की थी। इन कंपनियों ने स्वास्थ्य सेवा की मदद को दोगुना कर दिया था। कर्मचारियों के लिए काउंसलिंग की सेवा मुहैया करवाई। खराब दौर में स्वाभाविक रूप से सहानुभूति प्रकट की। दूसरी तरफ कॉरपोरेट कंजूस थे जिन्होंने वेतन में बहुत ज्यादा कटौती कर दी, भत्ते देने से इनकार किया और निर्दयता से कर्मचारियों को निकाल दिया लेकिन मुख्य कार्या​धिकारियों के वेतन में खासा इजाफा किया। कर्मचारी ऐसे दोगला रुख देख चुके हैं। ऐसे कई कर्मचारी अपने संस्थान में काम नहीं करना चाहते हैं। हालांकि इसका एक और पक्ष है, उनके जीवन का महत्त्व। 
पीढ़ी की सोच में बदलाव आने के कारण युवा लोगों में काम करने के स्थान को लेकर खासा बदलाव आया है। युवाओं को ठेके की नौकरी और कठोर नीतियों से बांधने के नुकसानदायक परिणाम सामने आ सकते हैं। इस मामले एक और असलियत है : दफ्तर की जगह घर या किसी और स्थान से काम करने का एक तरीका बीते दो दशकों से अधिक समय में विकसित हुआ है। कई कर्मचारी घर से काम कर चुके हैं और इसके फायदे जान चुके हैं। ऐसे कर्मचारी योजना बनाने और कार्य करने के तरीके में लचीलापन चाहते हैं। हालांकि दूसरी तरफ कई कर्मचारी दफ्तर आकर काम करना पसंद करते हैं।
काम करने के लचीले रुख बनाम कठोर नीतियों के इर्द-गिर्द दोहरी नौकरी की चर्चा को केंद्रित किए जाने की जरूरत है। लिहाजा यह महत्त्वपूर्ण है कि सभी तरह की प्रतिभाओं को रखने के बजाए क्षमताओं तक पहुंच बनाई जाए।  वर्तमान समय ने पारंपरिक नौकरी की जगह अन्य तरीकों से पैसा अर्जित करने वाले श्रमिकों की संख्या बढ़ रही है। कोविड के बाद के दौर में स्विगी ने व्यावहारिक नजरिया अपनाकर दोहरी नौकरी पर अपनी नीति का खुलासा किया है, उद्योग में ऐसी नीति अपनाने वाली पहली कंपनी स्विगी है। किस बात का अन्य मुख्य कार्या​धिकारी इंतजार कर रहे हैं?
(लेखक फाउंडिंग फ्यूल के सह-संस्थापक हैं)

First Published - October 5, 2022 | 9:07 PM IST

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