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1980 के दशक जैसे बने देश के आर्थिक हालात, थका हुआ कॉरपोरेट सेक्टर सुधारने के लिए रणनीतिक कदम जरूरी

वैश्विक झटकों और थमे हुए निजी निवेश के कारण देश की विकास प्रक्रिया अटक गई है। अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए कड़े आर्थिक सुधारों की तुरंत आवश्यकता है

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अजय शाह   
Last Updated- June 08, 2026 | 9:23 PM IST

देश की अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता का माहौल है। अब वृहद आर्थिक आंकड़े एक अंतराल के बाद सामने आते हैं जिससे विश्लेषण में एक हिस्सा धारणात्मक हो जाता है। बहरहाल, मौजूदा माहौल को आकार देने में झटकों के एक पूरे सिलसिले की भूमिका है। वर्ष2018 और 2019 में अर्थव्यवस्था बुरी हालत में थी। उसके बाद महामारी, यूक्रेन युद्ध, अमेरिकी शुल्क वृद्धि, ईरान युद्ध और तेल के झटकों का सामना करना पड़ा। वैश्विक समृद्धि की राजनीतिक बुनियाद उदार लोकतंत्र और वैश्वीकरण को माना जाता है।

यह व्यवस्था पश्चिम के नेतृत्व में विकसित हुई लेकिन अब वह ढांचागत कमजोरियां दिखा रही है। अब देश में वृहद आर्थिक हालात वैसे ही हैं जैसे कि 1980 के दशक में थे। उस समय वित्तीय दबाव और समाजवादी राज्य ढांचा देश की पहचान थे।

तेल का झटका भी देश के सामने 1970 के दशक जैसी समस्या का खतरा पैदा कर चुका है। परंतु केंद्रीय समस्या निजी निवेश में निरंतर आ रही कठिनाई में निहित है जो देश की आर्थिक वृद्धि का मूल है। घरेलू निजी क्षे​त्र ने आ​खिरी बार शुद्ध स्थिर परिसंपत्तियों में एक वर्ष में 20फीसदी से अधिक की नॉमिनल वृद्धि 2009-10 में हासिल की थी। यह आंकड़ा आ​खिरी बार 10 फीसदी से ऊपर 2019-20 में गया था। भारतीय निजी कॉरपोरेट क्षेत्र थका हुआ है और जोखिम से बचना चाहता है। आर्थिक नीति इन बाधाओं को कैसे पार कर सकती है और एक सतत निजी-निवेश चक्र कैसे उत्पन्न कर सकती है? यह कहना सुरक्षित है कि विकास प्रक्रिया अटकी हुई है।

सामान्य तौर पर किए जाने वाले छोटे-छोटे उपाय मदद नहीं करेंगे। हमें बड़े पैमाने पर सोचने की आवश्यकता है। आवश्यक आर्थिक नीति रणनीति में दस महत्त्वपूर्ण विचार इस प्रकार हैं।  पहला, तेल के झटके का भार पूरी तरह उपभोक्ताओं पर डाला जाना चाहिए। मूल्य संकेत वह प्रणाली है जिसकी मदद से आपूर्ति और मांग में संतुलन बनता है। जब कीमतों पर नियंत्रण किया जाता है तो विसंगति आती है और वित्तीय संतुलन पर दबाव बनता है। पेट्रोलियम पदार्थों की ऊंची कीमत खपत और उत्पादन में जरूरी समायोजन पैदा करेगी।

दूसरा, व्यापक आर्थिक झटके को पूरी तरह विनिमय दर में परिलक्षित होना चाहिए। विनिमय दर को नियंत्रित करने के प्रयास आर्थिक वृद्धि को नुकसान पहुंचाते हैं और अंततः व्यर्थ साबित होंगे। एक लचीली विनिमय दर आवश्यक झटके को अवशोषित करने का काम करती है।  

तीसरा, भारतीय आर्थिक सफलता उच्च उत्पादकता वाली कंपनियों के उदय पर आधारित है, जिनमें निर्यातकों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की प्रमुख भूमिका है। ये कंपनियां अनिश्चित वैश्विक वातावरण का सामना कर रही हैं और उन्हें वित्त तक बेहतर पहुंच की आवश्यकता है। इस अराजकता के युग में संचालन के लिए उन्हें वैश्विक वित्तीय प्रणाली तक पूर्ण पहुंच चाहिए ताकि वे कम लागत वाला पूंजी और हेजिंग साधन प्राप्त कर सकें। प्रत्यक्ष कर संबंधी कई बाधाएं सीमा-पार गतिविधियों में रुकावट डाल रही हैं, जिन्हें हल करना आवश्यक है।

इसे लागू करने के लिए पूंजी-खाता उदारीकरण का एक व्यापक पैकेज चाहिए। वित्त मंत्रालय को एक विशेषज्ञ समिति गठित करनी चाहिए जिसे एक तकनीकी टीम का समर्थन मिले ताकि यह सुधार पैकेज तैयार किया जा सके और आवश्यक कानूनी साधनों का मसौदा बनाया जा सके।

चौथा, ऊंचे ईंधन मूल्य और मुद्रा अवमूल्यन मुद्रास्फीति का दबाव उत्पन्न करेंगे। व्यापक आर्थिक स्थिरता के लिए मूल्य स्थिरता आवश्यक है। आर्थिक एजेंट 4 फीसदी लक्ष्य के प्रति संस्थागत प्रतिबद्धता का आकलन कर रहे हैं। यदि विधिक व्यापक आर्थिक ढांचा विफल होता है तो नीति की विश्वसनीयता एक दशक तक प्रभावित होगी। हमें मुद्रास्फीति-लक्ष्यीकरण प्रक्रिया में आर्थिक क्षमताओं को सुधारना होगा। विश्वसनीयता बनाने के लिए वित्त मंत्रालय को अब भारतीय रिजर्व बैंक को दी गई सहनशीलता सीमा को घटाना चाहिए। इसे वर्तमान 2 से 6 फीसदी से घटाकर 3 से 5 फीसदी करना चाहिए। मौद्रिक नीति की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए आरबीआई अधिनियम में संशोधन करना होगा ताकि मौद्रिक नीति समिति में गैर-सरकारी अर्थशास्त्रियों को सुपर-बहुमत मिले।

पांचवां, व्यापक आर्थिक स्थिरता के लिए राजकोषीय विवेक भी आवश्यक है। महामारी के दौरान सामान्य सरकारी ऋण तेजी से बढ़ा और अब तक पूर्ववर्ती मार्ग पर वापस नहीं आया है। यद्यपि वर्तमान वर्ष में तत्काल राजकोषीय समेकन कठिन है लेकिन संरचनात्मक मार्ग सहमति से अभी तैयार किया जाना चाहिए। सरकार को एक विशेषज्ञ समिति की आवश्यकता है, जो ऐसी राजकोषीय रणनीति तैयार करे जिसके माध्यम से 2027 और उसके बाद के वर्षों के बजट में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 0.5 फीसदी का सतत प्राथमिक अधिशेष सुनिश्चित हो सके।

छठा, भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि के लिए कंपनियों का अंतरराष्ट्रीयकरण आवश्यक है। इसे प्रोत्साहित करने के लिए आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) के सदस्य देशों (अमेरिका को छोड़कर) के साथ गहरे व्यापार समझौते करने होंगे।

इन समझौतों में भारत को यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौतों की तुलना में अधिक व्यापार उदारीकरण करना होगा। 1990 के दशक की द्विपक्षीय निवेश संधि के दर्शन पर लौटना आवश्यक है। निजी विदेशी कारोबारियों को आश्वस्त करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता और अंतरराष्ट्रीय कर मध्यस्थता की आवश्यकता है जो प्रभावी ढंग से काम करे। हाल के वर्षों में आर्थिक राष्ट्रवाद और कर सक्रियता ने विदेशी कंपनियों का विश्वास कम किया है; इस रुख को संरचनात्मक रूप से पुनर्संतुलित करना होगा। 

सातवां, अप्रत्यक्ष कर प्रणाली भारत में निवेश का मूल्यांकन करने वाली हर कंपनी की गणना पर भारी पड़ती है। इनपुट टैक्स क्रेडिट में बाधाओं ने माल एवं सेवा कर (जीएसटी) सुधार से प्राप्त आर्थिक लाभों को कई मायनों में उलट दिया है। जीएसटी में इनपुट टैक्स क्रेडिट की हर बाधा को हटाना होगा। जीएसटी को 10 फीसदी की एकल दर में परिवर्तित करना चाहिए। इन्हें समाप्त करना होगा।

आठवां, वैश्विक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और पोर्टफोलियो निवेशक भारत की गैर-मानक कार्यप्रणालियों से आशंकित हैं। अधिकांश मुद्दों पर हमें 10 मजबूत उभरते बाजारों के औसत दृष्टिकोण का शांतिपूर्वक अनुसरण करना चाहिए।

नौवां, सुधार के लिए परियोजना प्रबंधन और तकनीकी क्षमता आवश्यक है। इस सरकार की तीन सफल कहानियां हैं। मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण, जीएसटी, और दिवालियापन एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी)। हमें उस अवधि में काम करने वाले परिवर्तन के सिद्धांत से सीखना चाहिए और इन तरीकों को ऊपर बताए गए आठ क्षेत्रों में लागू करना चाहिए।

दसवां, आर्थिक एजेंटों को एक ऐसे भारतीय राज्य की आवश्यकता है जो कानून के शासन और वैश्वीकरण के प्रति प्रतिबद्ध हो और केंद्रीय नियोजन से बाहर निकलने का मार्ग तय करे। असामान्य बयान अनुपातहीन रूप से उन लोगों के विश्वास को बाधित कर सकते हैं जो महत्त्वपूर्ण हैं। संदेश देने में अधिक अनुशासन आवश्यक है।  जुलाई 1991 के बजट भाषण से निजी निवेश में उछाल 1995 में जाकर उत्पन्न हो पाया।

इसी तरह, वाजपेयी सरकार के सुधारों ने निजी निवेश में उछाल 2003 में देखने को मिला। महत्त्वपूर्ण आर्थिक एजेंट समय के साथ भारतीय राज्य का अवलोकन करते हैं और धीरे-धीरे पूंजी आवंटित करते हैं।

(लेखक एक्सकेडीआर फोरम में शोधकर्ता हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

First Published : June 8, 2026 | 9:23 PM IST