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तेल की कीमतों पर फिसलती अर्थव्यवस्था

Last Updated- December 07, 2022 | 4:05 AM IST

सभी सीढ़ियां स्वर्ग की ओर नहीं जातीं, उसी तरह मूल सिध्दांतों के आधार पर की गई सभी भविष्यवाणियां सही नहीं होतीं- जैसे भारतीय रुपया 33 रुपये प्रति अमेरिकी डॉलर हो और तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल हों।


कम आपूर्ति में ही सरकार की नीतियों के तथ्य छिपे हैं। भारत सरकार कहती है कि गरीब किसानों के कर्ज का भुगतान करने के लिए 71,000 करोड़ रुपये की जरूरत है। अभी तक सरकार की किसी भी स्वतंत्र या अर्ध स्वतंत्र एजेंसी ने किसी आंकड़ों के  माध्यम से सरकार के इस मसौदे की पुष्टि नहीं की है।

आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक बैंकों और कोऑपरेटिव का डिफाल्ट करीब 30,000 करोड़ रुपये है। यह सही समय हो सकता है कि इस जानकारी के लिए वित्त मंत्रालय सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत जानकारी मांगे। तेल और ऊर्जा के मामले ज्यादा महत्त्वपूर्ण और ज्यादा कठिन हैं। सरकार, तेल कंपनियां और बाजार- सभी का कहना है कि अंडर रिकवरी के तहत सब्सिडी 225,000 करोड़ रुपये आती है।

गरीबों का तेल कहा जाने वाला केरोसिन तेल पर भारी-भरकम सब्सिडी दी जा रही है। ऊर्जा से संबंधित चार पदार्र्थों केरोसिन, एलपीजी, डीजल और पेट्रोल के अंतरराष्ट्रीय बाजार भाव और घरेलू दामों ने कई तथ्यों को उजागर किया है। सवाल यह नहीं है कि तेल पर कितना कर लगे, सवाल यह है कि भारत सरकार की तेल नीति पारदर्शी है या नहीं।

तेल से संबंधित पांच तथ्य बेहद दिलचस्प हैं। पहला- भारत में डीजल की कीमतें पेट्रोल की तुलना में 25 प्रतिशत के करीब कम हैं, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में डीजल की कीमतें पेट्रोल की तुलना में करीब 20 प्रतिशत ज्यादा हैं। दूसरा- भारत में पेट्रोल का उपभोक्ता मूल्य अमेरिका के 4.40 डॉलर प्रति गैलन से ज्यादा है और विकाससील देशों के पेट्रोल की कीमतों पर गौर करें तो यहां कीमतें सबसे ज्यादा हैं।

चीन में पेट्रोल की कीमत केवल 74 सेंट प्रति लीटर है, जबकि भारत में औसत कीमत 1.17 डॉलर प्रति लीटर है। तीसरा- जब तेल की कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल था तो केरोसिन तेल पर 5 प्रतिशत कर लगता था। मेरे सहित ज्यादातर लोग मानते हैं कि केरोसिन पर हद से ज्यादा सब्सिडी दी जाती है।

चौथा- जब तेल की कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल थीं तो अर्थव्यवस्था को कर के रूप में कुल 91,000 करोड़ रुपये मिले थे: आज तेल की कीमत 130 डॉलर प्रति बैरल है तो कुल सब्सिडी घाटा 25,000 करोड़ रुपये है जो सकल घरेलू उत्पाद का 0.5 प्रतिशत है। पांचवां और अंतिम, इस बात के कुछ संकेत मिल रहे हैं कि हमारी तेल नीतियों के चलते घाटे का आंकड़ा सकल घरेलू उत्पाद का 5 प्रतिशत (225,000 करोड़ रुपये) हो जाएगा।

इस तरह के आंकड़े कहां से मिले?  भारतीय नीति से ही मिले हैं जो पहले तो उत्पादित तेल पर कर थोपती है और बाद में इसे कुछ कम कीमत पर बेचती है। बाद में इस घाटे को पूरा करने के लिए ऑयल बांड जारी करती है, जिससे घाटे को पूरा किया जा सके। और अंत में यह कोई नहीं जानता कि वास्तविक सब्सिडी कितनी है और कर कितना है। साथ ही अर्थव्यवस्था की क्या स्थिति है।

गणितीय उदाहरण इसे सरल बनाने में मदद कर सकता है। मान लीजिए कि अंतरराष्ट्रीय कीमत 100 रुपये है, इस पर पहले 50 रुपये कर लिया जाता है और 25 रुपये सब्सिडी दे दी जाती है। सरकार दावा करती है कि उसने 25 रुपये की छूट दे दी है, लेकिन हकीकत यह है कि वह उतना ही कर ले रही है। यह किस तरह की नीति है? यहां दिए गए आंकड़ों से भी चिंता होती है।

सरकार की अपारदर्शी नीतियों  और आयली एक्पेंडेचर्स का क्यों न सूक्ष्म परीक्षण और उस पर बहस की जाए? ये खर्चे बहुत ज्यादा हैं, जिनसे गरीबों को कम ही मदद मिलती है। लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि सरकार (रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय) की एक बार फिर 130 डॉलर प्रति बैरल कीमतों को ध्यान में रखते हुए अगले साल के लिए नीतियां बनाने की संभावना है।

बाजार की एक विस्तृत धारणा बन गई है कि अधिक जनसंख्या वाले चीन और भारत जैसे देशों में मांग बढ़ी है। यह तर्क दिया जा रहा है कि पिछले 10 साल में तेल की कीमतें 600 प्रतिशत तक बढ़ने के पीछे यह एक प्रमुख वजह है। (1990 में तेल की औसत कीमत 20 डॉलर प्रति बैरल थी।) लेकिन भारत और चीन तो पिछले तीस साल से विकास की ओर बढ़ रहे हैं, न कि 10 साल या पिछले तीन महीने से। इसलिए शायद तेल की कीमतें 130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने में कोई दूसरा कारण भी है।

सभी बाजारों और पंडितों का कहना था कि फरवरी 2008 में कीमतें 85 डॉलर प्रति बैरल रहेंगी, इस पर भी भारत और चीन पर ही आरोप लग रहे हैं। हो सकता है कि निवेश बैंक और हेज फंडों ने इस तरह की जोखिम भरी रणनीति बनाई हो, जिससे कीमतें बढ़ी हैं, लेकिन भारत सरकार क्या कर रही है? भारत और चीन की अवधारणाओं पर आधारित भविष्यवाणी डॉलर और रुपये के उतार चढ़ाव को संदेह की दृष्टि से देख रहा है।

यह तर्क दिया गया कि भारत और चीन में तेजी से विकास हो रहा है इससे वहां पर विनिमय दरों में परिवर्तन हो रहा है। रुपये के बारे में भविष्यवाणी की गई थी कि यह 2007 के अंत तक 38 रुपये प्रति डॉलर तक पहुंच जाएगा। इसके बाद यह 36 और कुछ ही दिनों में 33 पर आ जाएगा। यह निवेश बैंकों द्वारा कहा जा रहा था जबकि चीन का चालू खाता अधिशेष जीडीपी के 11 प्रतिशत लाभ में था, जबकि भारत में 3 प्रतिशत का घाटा था।

अगर रुपये की कीमत 38 या 33 पर पहुंचती तो यह घाटा और बढ़ जाता। आज रुपया 43 पर पहुंच गया है, जो की गई भविष्यवाणी से 12 प्रतिशत दूर है। बात साधारण सी है। यह सब सिध्दांतों पर आधारित है, तो यह जरूरी नहीं है कि कोई भविष्यवाणी विश्वसनीय ही होगी। सभी सीढ़ियां स्वर्ग की ओर नहीं जातीं और सभी भविष्यवाणियां सत्य नहीं होतीं।

तेल की कीमतों में हो रही असाधारण बढ़ोतरी, जो पिछले तीन महीने में 50 प्रतिशत के करीब है, ऐसे में एक सरकार या निवेश बैंक बाजार के स्थिर होने के इंतजार की रणनीति अपना सकता है। जैसा कि समझदार निवेशकों ने किया जब यूएस डॉलर की कीमत कम होकर 39 पर पहुंच गया।

(लेखक, दिल्ली स्थित एसेट मैनेजमेंट कंपनी- ऑक्सस इनवेस्टमेंट के चेयरमैन हैं। यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।)

First Published - June 8, 2008 | 11:10 PM IST

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