संपादकीय

Editorial: हार के बाद ममता बनर्जी की सियासत ने फिर बढ़ाया टकराव

अपनी पराजय में ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की राजनीति की उस हिंसक प्रकृति को ही उजागर किया है, जहां उन्होंने 15 वर्षों तक शासन किया

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बीएस संपादकीय   
Last Updated- May 07, 2026 | 10:31 PM IST

अपनी पराजय में ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की राजनीति की उस हिंसक प्रकृति को ही उजागर किया है, जहां उन्होंने 15 वर्षों तक शासन किया। हाल ही में संपन्न हुए विधान सभा चुनावों में अपनी पार्टी की पराजय के बाद उन्होंने चुनावी लोकतंत्र के परंपरागत शिष्टाचार का पालन करने और राज्यपाल को अपना त्यागपत्र सौंपने से इनकार कर दिया।

ऐसा करके वह तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच सड़क पर चल रही विषाक्त राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को और अधिक भड़का रही हैं। भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी के सहयोगी की हत्या कोई आश्वस्त करने वाला संकेत नहीं है। हालांकि तृणमूल कांग्रेस ने कहा है कि उसका इस घटना से कोई लेना-देना नहीं है। परंतु यह घटना दिखाती है कि किस कदर अशांति व्याप्त है।

चुनावी हार के बाद ममता बनर्जी ने असंतुष्ट और शायद अज्ञानी पराजित नेता के रूप में अपनी छवि को ही अधिक उजागर किया है। उनके पास मुख्यमंत्री के पद पर बने रहने का कोई संवैधानिक आधार नहीं है क्योंकि उनका कार्यकाल विधान सभा से जुड़ा हुआ है। उनके इस्तीफा देने या नहीं देने से कोई फर्क नहीं पड़ता। अनुच्छेद 172 के मुताबिक एक विधान सभा अपनी पहली बैठक से पांच साल तक चलेगी, उससे अधिक नहीं। यह अवधि 7 मई को समाप्त हो गई।

दूसरे शब्दों में कहें तो अब एक नई विधान सभा गठित होगी। यह भी स्पष्ट नहीं है कि ममता बनर्जी संवैधानिक रूप से वैध तरीकों से इस प्रक्रिया को कैसे बाधित कर सकती हैं। वह अपनी राजनीतिक विद्रोही की छवि पर भरोसा करके चल रही हैं ताकि परंपराओं को चुनौती दे सकें। आखिर वाम मोर्चे के विपक्ष में रहते हुए उन्होंने ऐसा ही तो किया था।

उन्होंने खुद को एक बार फिर से ‘सड़क की राजनीति’ करने वाले के रूप में पेश करने का विकल्प चुना है। एक समय था जब इस तरह की राजनीति ने उन्हें 34 वर्षों के वाम शासन से थके हुए मतदाताओं के बीच लाभ पहुंचाया था, लेकिन अब यह उस नेता को शोभा नहीं देता जिसे लंबे कार्यकाल के दौरान संयम का गंभीरता से पालन करना चाहिए था। लोकतंत्र को बनाए रखने वाले नियमों का पालन न करके, वे उन्हीं उल्लंघनों का शिकार हो रही हैं जिनका आरोप वे अपने विरोधियों पर लगा रही हैं।

ममता बनर्जी का तर्क है कि चुनाव निष्पक्ष नहीं हुए और केंद्रीय बलों का दुरुपयोग कर बूथों पर कब्जा किया गया तथा परिणाम को प्रभावित किया गया। उनकी पार्टी ने विवादास्पद विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया। इसके तहत सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बावजूद 27 लाख मतदाताओं को सूची से हटा दिया गया था। हकीकत यह है कि तृणमूल कांग्रेस को 80 और भाजपा को 207 सीटें मिली हैं। हार का यह बड़ा अंतर सत्ता विरोधी लहर को दर्शाता है। लेकिन चुनाव बाद के विश्लेषण से उनके आरोप में कुछ दम नजर आता है।

निर्वाचन आयोग द्वारा प्रकाशित परिणामों की जांच की जाए तो पता चलता है कि कई सीटों पर जहां तृणमूल कांग्रेस, भाजपा से हारी वहां भाजपा उससे कम मतों से जीती जितने नाम मतदान के पहले सूची से हटाए गए थे। ऐसी सीटों में ममता बनर्जी की भवानीपुर सीट भी शामिल है जहां वे 15,505 मतों से हारीं जबकि एसआईआर के तहत लगभग 51,000 नाम हटाए गए थे।

बेशक यह मान लेना उचित नहीं है कि सभी हटाए गए मतदाता तृणमूल कांग्रेस को ही वोट देते, लेकिन यह पैटर्न निश्चित रूप से और गहन जांच का विषय होना चाहिए। ममता बनर्जी को अधिकार है कि वे परिणाम घोषित होने के 45 दिनों के भीतर उच्च न्यायालय में चुनाव याचिका दाखिल करें या प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर करें। उनके लिए बेहतर होगा कि वे इन संवैधानिक रास्तों का अनुसरण करें, बजाय उस तीखी सड़क की राजनीति का सहारा लेने के जिसे बंगाल वहन नहीं कर सकता।

First Published : May 7, 2026 | 10:28 PM IST