भारत की विदेश व्यापार नीति का नए सिरे से संतुलन जारी है। इस सप्ताह न्यूजीलैंड के साथ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर हस्ताक्षर किए गए। इसके तहत, जहां सभी भारतीय वस्तुओं को न्यूजीलैंड के बाजार में शुल्क-मुक्त प्रवेश मिलेगा, वहीं भारत के आयात का एक बड़ा हिस्सा भी खोला जाएगा, जिसमें कुछ श्रेणियों की वस्तुओं पर महत्त्वपूर्ण शुल्क कटौती या विस्तारित कोटा लागू होंगे। इनमें न्यूजीलैंड के लिए महत्त्वपूर्ण कृषि उत्पाद जैसे भेड़ का मांस और कीवी फल शामिल हैं।
भारत ने इस समझौते के शुल्क कटौती वाले हिस्से में इस पर जोर दिया है कि कुछ क्षेत्रों को सुरक्षित रखा गया है। हालांकि, वास्तविक अपवाद केवल डेरी क्षेत्र है, जिसमें न्यूजीलैंड अत्यधिक प्रतिस्पर्धी है। भारत में डेरी क्षेत्र राजनीतिक रूप से संवेदनशील है क्योंकि इसमें करोड़ों लोगों की आजीविकाएं जुड़ी हुई हैं, और यही कारण है कि हाल के सभी व्यापार समझौतों में इसे उचित रूप से संरक्षित किया गया है।
यूरोपीय संघ की तुलना में न्यूजीलैंड एक छोटा और अधिक चुस्त व्यापारिक इकाई है, इसलिए वह ऐसे समझौते कर सका जो भारत के लिए मुक्त व्यापार समझौते को अधिक आकर्षक बनाते हैं। उदाहरण के लिए, उसने अगले 15 वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था में 20 अरब डॉलर निवेश करने का वादा किया है। यह संभव होगा या नहीं, यह एक अलग प्रश्न है। इसी तरह का वादा यूरोपीय मुक्त व्यापार क्षेत्र (ईएफटीए) के देशों-नॉर्वे, स्विट्जरलैंड, आइसलैंड और लिकटेनस्टाइन ने किया था, लेकिन वह 100 अरब डॉलर का था।
भारत ने अक्सर निवेश को व्यापारिक उदारीकरण का दूसरा पहलू माना है और इसीलिए उसने बाजार तक पहुंच को ऐसे वादों पर आधारित किया है। हालांकि इतने बड़े निवेश को साकार करने के लिए भारत को व्यवसाय और निवेशक-हितैषी सुधारों को आगे बढ़ाते रहना होगा। इसलिए न्यायिक और मध्यस्थता सुधार एक प्रमुख प्राथमिकता होने चाहिए ताकि विवाद निपटान से जुड़ी चिंताएं वादा किए गए पूंजी प्रवाह में बाधा न डालें।
इस समझौते में व्यक्तियों की आवाजाही से संबंधित कुछ प्रावधान भी शामिल हैं, जो अपेक्षाकृत दुर्लभ हैं, खासकर उस समय जब कई देश आव्रजन के प्रति अधिक सख्त हो रहे हैं। न्यूजीलैंड में 5,000 भारतीय पेशेवरों को तीन-वर्षीय कार्य परमिट दिए जाएंगे, विशेष रूप से स्वास्थ्य सेवा और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे मांग वाले क्षेत्रों में। भारत लंबे समय से चाहता रहा है कि प्रवासन समझौते व्यापक व्यापार समझौतों का हिस्सा हों, लेकिन हाल के समझौतों में जैसे ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के साथ के समझौतों में इस जरूरत को राजनीतिक माहौल के कारण स्थगित करना पड़ा।
स्पष्ट है कि न्यूजीलैंड में यह अभी उतना बड़ा मुद्दा नहीं है लेकिन इसे सावधानीपूर्वक देखना होगा, क्योंकि ऐसे मुद्दों पर घरेलू राजनीति कुछ ही वर्षों में तेजी से बदल सकती है।
न्यूजीलैंड व्यापक एवं प्रगतिशील प्रशांत पार साझेदारी समझौते (सीपीटीपीपी) का पूर्ण सदस्य है। इस गठबंधन के 12 सदस्य ऑस्ट्रेलिया, ब्रुनेई, कनाडा, चिली, जापान, मलेशिया, मेक्सिको, न्यूजीलैंड, पेरू, सिंगापुर, वियतनाम और ब्रिटेन हैं। इनमें से अब आठ देशों के साथ भारत मुक्त व्यापार समझौता कर चुका है। इस महीने की शुरुआत में, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की आधिकारिक यात्रा के साथ, कनाडा के साथ वार्ताएं फिर से शुरू हुईं।
अब इस पर पुनर्विचार करना महत्त्वपूर्ण है कि क्या सीपीटीपीपी की सदस्यता के लिए आधिकारिक रूप से आवेदन करना समझदारी होगी। यह एक मानक व्यापार समझौता है, जो निवेशकों और व्यापारियों के लिए भरोसे के स्तर को उल्लेखनीय रूप से बढ़ा देगा। यह वर्तमान वैश्विक शासन में हो रहे व्यवधानों के लिए उपयुक्त भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक प्रतिक्रिया भी होगी।
भारत ने यूरोपीय संघ सहित कई देशों और व्यापारिक समूहों के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने में उल्लेखनीय खुलापन दिखाया है, और यह महत्त्वपूर्ण है कि इस गति को बनाए रखा जाए। भारत को अपनी औसत शुल्क दरों को भी कम करने पर विचार करना चाहिए, जो अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ तालमेल में नहीं हैं।