संपादकीय

Editorial: हादसों के पीछे छिपे भ्रष्टाचार और लापरवाह शहरी शासन की कहानी

यह विडंबना ही है कि सवालों के घेरे में आए बीऐंडबी का नाम फ्लरिश यानी फलने-फूलने वाला या प्रभावशाली है जबकि उसने कई नियमों को तोड़ा

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बीएस संपादकीय   
Last Updated- June 09, 2026 | 11:23 PM IST

दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) 22 (14 विदेशी नागरिकों सहित) लोगों की मौत के बाद सक्रिय हो गया है। ये मौतें दक्षिण दिल्ली के मालवीय नगर में बेड ऐंड ब्रेकफास्ट (बीऐंडबी) होटल में आग लगने से हुई थीं। इससे जुड़ी सार्वजनिक स्मृति और आधिकारिक उत्साह जल्द ही कम हो जाएगा। लेकिन इस तरह की सिलसिलेवार त्रासदियों में निहित व्यापक भ्रष्टाचार का मुद्दा जल्द थमने वाला नहीं है।

यह विडंबना ही है कि सवालों के घेरे में आए बीऐंडबी का नाम फ्लरिश यानी फलने-फूलने वाला या प्रभावशाली है जबकि उसने कई नियमों को तोड़ा। छह कमरों के संचालन के लाइसेंस वाले इस प्रतिष्ठान को अवैध रूप से छह मंजिलों और 25 कमरों वाले होटल में तब्दील कर दिया गया था। इमारत में अग्निशमन उपकरण, आपातकालीन निकासी, अलार्म और धुएं की पहचान प्रणाली का अभाव था। इसके अलावा भूतल पर एक अवैध रेस्तरां संचालित हो रहा था जहां से आग शुरू हुई।

वास्तविक प्रश्न तो यह है कि नियमों को धता​ बताने वाला फ्लरिश नगर निगम के अधिकारियों की आंखों के सामने कैसे फल-फूल रहा था। एमसीडी ने उसके बाद दावा किया है कि उसने सिर्फ 24 घंटों में 82 संपत्तियों को ध्वस्त किया और 43 को सील कर दिया। यह कवायद यह सवाल भी उठाती है कि आखिर शुरुआत में ही इन सभी प्रतिष्ठानों को संचालन की अनुमति कैसे मिली।

फ्लरिश के मालिक पुलिस हिरासत में हैं और एमसीडी पूरे शहर में निरीक्षण बढ़ा रहा है जिससे मझोले स्तर के पर्यटकों को सेवा देने वाला बीऐंडबी व्यवसाय प्रभावित होगा। हालांकि ऐसा केवल कुछ ही समय के लिए होगा। परंतु नगर निगम अधिकारियों में जवाबदेही की अनुपस्थिति में नियमों का उल्लंघन रुकने की संभावना नहीं है।

बीऐंडबी तो केवल एक खतरनाक हिमखंड का सिरा भर हैं। वर्ष 2024 में पूर्वी दिल्ली के बेबी केयर न्यू बॉर्न हॉस्पिटल में लगी भीषण आग में आठ नवजात शिशुओं की दम घुटने से मौत हो गई थी। उस हादसे ने भी भ्रष्टाचार की ऐसी ही दुखद कहानी उजागर की थी। अस्पताल का संचालन लाइसेंस आग लगने से दो महीने पहले ही समाप्त हो चुका था।

इसे पांच बिस्तरों के संचालन की अनुमति थी लेकिन इसमें 12 शिशुओं को भर्ती किया गया था। मालिक ने परिसर में अवैध ऑक्सीजन सिलिंडर भरने का व्यवसाय चला रखा था, जहां आग लगी और वहां आपातकालीन निकास और बचाव मार्ग मौजूद ही नहीं थे।

दो महीने बाद तीन युवा सिविल सेवा अभ्यर्थियों की उस समय मौत हो गई जब एक एसयूवी के गुजरने से जलभराव वाली सड़कों का पानी बेसमेंट में भर गया। वे वहीं फंस गए। यह विचित्र त्रासदी कई चूक और गलतियों का परिणाम थी। यह बेसमेंट आईएएस कोचिंग संस्थान राउज स्टडी सर्किल का हिस्सा था और उसे कक्षा के रूप में नहीं बल्कि भंडारण आदि के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए था। वहां विद्यार्थी इसलिए फंस गए क्योंकि बिजली चली जाने से बायोमेट्रिक दरवाजे जाम हो गए। वहीं बाढ़ इसलिए आई क्योंकि भारी बारिश ने नालियां जाम कर दीं। नगर निगम ने माॅनसून से पहले उन्हें साफ नहीं किया।

देश की राजधानी में लापरवाह नगर प्रशासन की स्थिति पूरे भारत में नागरिक शासन की सामान्य गुणवत्ता को ही दर्शाती है। पिछले डेढ़ दशक में ऐसी त्रासदियों की भरमार रही है जो लालची व्यवसायों और अधिकारियों की मिलीभगत के घातक संयोजन को उजागर करती हैं। इसी साल दक्षिण दिल्ली के साकेत में एक इमारत गिरने से छह लोगों की मौत हुई और भवन मानकों के कई उल्लंघन सामने आए।

साल 2011 में कोलकाता के एक निजी अस्पताल में आग लगी जो एक प्रसिद्ध कारोबारी परिवार के स्वामित्व में था और इसमें 89 लोगों की मौत हुई। इसने सुरक्षा मानकों के उल्लंघन की वही कहानी उजागर की। 2017 में मुंबई के उच्चवर्गीय कमला हिल्स परिसर में एक रूफटॉप रेस्तरां में आग लगी जिसमें इसी तरह के उल्लंघनों को सामने लाया।

घटना हो जाने के बाद अवैध इमारतों को ध्वस्त करने और गिरफ्तारियां आदि जानबूझकर की गई लापरवाही और भ्रष्टाचार की भरपाई नहीं कर सकतीं जो लगातार आम शहरी नागरिक की सुरक्षा को खतरे में डालते हैं। यदि फ्लरिश त्रासदी से कोई संदेश निकलता है तो वह यह है कि तेजी से हो रहे शहरीकरण के बीच नगरीय शासन में तत्काल सुधार की आवश्यकता है।

First Published : June 9, 2026 | 11:23 PM IST