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Editorial: अमेरिका-चीन व्यापार समझौते से उम्मीद कम

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वैश्विक व्यापार परिदृश्य अनिश्चित

Last Updated- June 12, 2025 | 10:34 PM IST
Donald Trump
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने बुधवार को कहा कि वह चल रही व्यापार वार्ताओं को पूरा करने के लिए 9 जुलाई की समय सीमा को आगे बढ़ाने के लिए तैयार हैं। बढ़ती व्यापारिक और आर्थिक अनिश्चितता के दौर में यह अमेरिका के कारोबारी साझेदारों को सीमित राहत ही मुहैया कराएगी। बहरहाल आंशिक तौर पर यह भी दिखाता है कि अमेरिकी प्रशासन इस तथ्य को स्वीकार कर रहा है कि विभिन्न देशों के साथ अलग-अलग व्यापार वार्ताएं करना एक जटिल और समय खपाऊ कवायद है।

अमेरिका 15 बड़े साझेदार देशों के साथ व्यापार समझौते को लेकर वार्ता कर रहा है। भारत भी अमेरिका के साथ व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के करीब है। हालांकि यह कहना मुश्किल है कि यह 9 जुलाई तक पूरा हो जाएगा या नहीं। यह भी स्पष्ट नहीं है कि अमेरिका इस समय सीमा को किस हद तक बढ़ाने का इच्छुक है।

अब तक अमेरिका ने केवल यूनाइटेड किंगडम के साथ व्यापार समझौता किया है। चीन के साथ भी वह बुधवार को प्रारंभिक सहमति पर पहुंच गया। हालांकि समझौते की शर्तों के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर कहा कि चीन के साथ समझौता हो गया है लेकिन अभी उसे उनकी और चीन के राष्ट्रपति की मंजूरी मिलनी है।

वक्तव्य के मुताबिक चीन की वस्तुओं पर अमेरिका 55 फीसदी शुल्क लगाएगा जबकि चीन अमेरिकी आयात पर 10 फीसदी शुल्क लगाएगा। चीन दुर्लभ खनिजों के निर्यात में नरमी पर भी सहमत हो गया है। वहीं अमेरिका चीनी छात्रों को अपने विश्वविद्यालयों में पढ़ने की इजाजत देगा। खबरों के मुताबिक अमेरिका कुछ उच्च तकनीक वाली वस्तुओं के निर्यात पर भी सहमत हो गया है जिसे राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंताएं जताते हुए रोक दिया गया था।

चीन ने ‘लिबरेशन डे’ पर अमेरिका द्वारा की गई शुल्क वृद्धि के जवाब में कई दुर्लभ खनिजों के निर्यात पर लाइसेंस की जरूरत थोप दी थी और अमेरिकी आयात पर शुल्क बढ़ा दिया था। अमेरिका ने इसके जवाब में चीनी आयात पर 145 फीसदी शुल्क लगा दिया था। अब इसमें से तमाम शुल्क वापस ले लिए गए हैं। बहरहाल, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि क्या चीन और अमेरिका के बीच घोषित शुल्क दरें अंतिम होंगी? यह स्पष्ट है कि दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे पर बहुत अधिक निर्भर हैं। यह निर्भरता ट्रंप प्रशासन की सोच से कहीं अधिक है।

इतना ही नहीं चीन को बढ़त हासिल दिख रही है क्योंकि दुर्लभ खनिज की आपूर्ति श्रृंखला पर उसका नियंत्रण है। आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिए ये तत्त्व बहुत महत्त्वपूर्ण हैं और मोबाइल फोन से लेकर रक्षा उपकरणों तक में इनका इस्तेमाल होता है। चीन इस बढ़त का इस्तेमाल किस हद तक रियायत हासिल करने में करेगा यह आने वाले दिनों में देखने को मिलेगा। वह शायद 55 फीसदी की शुल्क दर पर न माने क्योंकि यह उसके निर्यात को प्रभावित करेगी। ऐसे में अंतिम समझौते की प्रतीक्षा अहम रहेगी।

अन्य कारोबारी साझेदारों के लिए अमेरिका- चीन समझौता यही सुझाता है कि शुल्क दरें तथाकथित जवाबी शुल्क के पहले के स्तर की तुलना में काफी ऊंचे स्तर पर रहेंगी और समझौते पर पहुंचना आसान नहीं होगा। अमेरिकी प्रशासन समय सीमा बढ़ाने का इच्छुक है। उसका नीतिगत पथ अमेरिका तथा शेष विश्व के आर्थिक नतीजों को प्रभावित करेगा। उदाहरण के लिए आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन ने हाल ही में अनुमान जताया कि अमेरिकी वृद्धि दर चालू वर्ष में घटकर 1.6 फीसदी रह जाएगी जबकि 2024 में यह 2.8 फीसदी थी।

यह भी उम्मीद है कि मुद्रास्फीति की दर चालू वर्ष की अंतिम तिमाही में 4 फीसदी के करीब रह सकती है और वह 2026 में लक्ष्य से ऊपर रहेगी। इससे फेडरल रिजर्व के पास नीतिगत ब्याज दर कम करने की गुंजाइश सीमित रहेगी। कुल मिलाकर चीन के साथ समझौते (जिसे अभी मंजूर होना है) और समय सीमा बढ़ाने की इच्छा के बावजूद भविष्य अनिश्चित नजर आ रहा है।

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First Published - June 12, 2025 | 10:26 PM IST

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