संपादकीय

Editorial: फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों और एथनॉल अर्थव्यवस्था पर फोकस

सरकार ने ई 22, ई 25, ई 27 और ई 30 पेट्रोल को उत्पाद शुल्क से छूट देने की घोषणा की है। उसका यह कदम भी अधिक एथनॉल के मिश्रण वाले ईंधनों के समर्थन में माना जा रहा है

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बीएस संपादकीय   
Last Updated- June 12, 2026 | 12:09 AM IST

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने हाल ही में ई 85 ईंधन प्रस्तुत किया है। यह 85 फीसदी एथनॉल और 15 फीसदी पेट्रोल का मिश्रण है। उसका यह कदम भारत के तेल आयात को कम करने और घरेलू जैव-ईंधन अर्थव्यवस्था के निर्माण के प्रयासों का हिस्सा है। यह पहल देश भर में ई 20 पेट्रोल की शुरुआत के बाद आई है और इसका उद्देश्य ऐसे फ्लेक्स-फ्यूल वाहन तैयार करना है जो एथनॉल-पेट्रोल मिश्रण की अलग-अलग श्रेणियों पर सहजता से चल सकें।

इस बीच, सरकार ने ई 22, ई 25, ई 27 और ई 30 पेट्रोल को उत्पाद शुल्क से छूट देने की घोषणा की है। उसका यह कदम भी अधिक एथनॉल के मिश्रण वाले ईंधनों के समर्थन में माना जा रहा है। यह कर राहत केवल राजकोषीय उपाय नहीं है बल्कि यह ई 20 से आगे के ईंधनों की मांग के लिए प्रोत्साहन तैयार कर सकती है और घरेलू आसवन क्षमता के तेजी से विस्तार के बाद उत्पन्न अधिशेष एथनॉल उत्पादन क्षमता के इस्तेमाल का व्यावसायिक मार्ग प्रदान करती है।

ये सभी कदम मिलकर भारत की ऊर्जा मिश्रण में एथनॉल की भूमिका को बढ़ाने के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को रेखांकित करते हैं। साथ ही सरकार के हालिया बयानों से संकेत मिलता है कि भारत पहले ई 25 की ओर बढ़ सकता है, उसके बाद फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों और ई 100 ईंधन की ओर रुख किया जा सकता है। यह ऐसे समय में देश की परिवहन ईंधन रणनीति पर सावधानीपूर्वक विचार करने की मांग करता है जब ऑटोमोबाइल उद्योग नीतिगत निश्चितता की तलाश कर रहा है।

ईंधन मानकों को बदलने के लिए वाहन निर्माताओं को अल्पावधि में बड़े अनुपालन खर्च उठाने होंगे। एथेनॉल की मात्रा में हर वृद्धि के लिए इंजीनियरिंग बदलाव, इंजन का नए सिरे से समायोजन, परीक्षण, प्रमाणन और उन पुर्जों में संशोधन की आवश्यकता होती है जो ईंधन के संपर्क में आते हैं। आश्चर्य नहीं कि वाहन उद्योग के कुछ हिस्सों ने एथेनॉल मिश्रण के लक्ष्यों में बार-बार बदलाव पर आपत्ति जताई है। सरकार का एथेनॉल के प्रति उत्साह समझा जा सकता है। इसका उच्च मिश्रण आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करता है, ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करता है और घरेलू जैव-ईंधन के लिए बाजार तैयार करता है। भू-राजनीतिक अनिश्चितता और अस्थिर तेल कीमतों से भरी दुनिया में ये नीतिगत उद्देश्य उचित हैं।

ब्राजील की फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के साथ सफलता अक्सर इस बात का प्रमाण मानी जाती है कि ऐसा बदलाव संभव और लाभकारी है। हालांकि भारत के अधिकांश वर्तमान वाहन मुख्य रूप से पारंपरिक ईंधनों और ई 20 पेट्रोल के लिए डिजाइन किए गए हैं। ई 85 केवल विशेष रूप से डिजाइन किए गए फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों में ही इस्तेमाल किया जा सकता है, जिनकी संख्या भारतीय सड़कों पर बहुत कम है। अनुकूल वाहनों, ईंधन पंप और आपूर्ति श्रृंखलाओं का राष्ट्रीय स्तर पर पारिस्थितिकी तंत्र बनाना समय और बड़े निवेश की मांग करेगा।

आर्थिक पहलू भी गहन जांच के योग्य हैं। एथनॉल में पेट्रोल की तुलना में कम ऊर्जा होती है जिससे ईंधन दक्षता घट जाती है। अनुमान बताते हैं कि ई 85 पर चलने वाले वाहनों की प्रति लीटर माइलेज 20 से 30 फीसदी तक कम हो सकती है। इसलिए प्रति लीटर कम खुदरा मूल्य उपभोक्ताओं के लिए स्वतः कम परिचालन लागत में नहीं बदलता। जब तक मूल्य निर्धारण ईंधन अर्थव्यवस्था में कमी की भरपाई नहीं करता तब तक उपभोक्ता स्वीकृति सीमित रह सकती है।

इसके बाद सवाल आता है फीडस्टॉक का। भारत का एथनॉल कार्यक्रम मुख्य रूप से गन्ने और शर्करा-आधारित उत्पादों पर निर्भर है। एथनॉल उत्सर्जन को कम करने में मदद कर सकता है लेकिन गन्ना देश में उगाई जाने वाली सबसे अधिक जल-गहन फसलों में से एक है। जल संकट और संसाधन आवंटन की समस्या का निपटारा किए बिना एथनॉल उत्पादन का विस्तार करना, एक समस्या हल करने की कोशिश करते हुए नया पर्यावरणीय दबाव पैदा कर सकता है।

बड़ा मुद्दा यह है कि भारत की दीर्घकालिक परिवहन रणनीति में जैव-ईंधन कहां हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों और एथनॉल-आधारित ईंधनों को प्रतिस्पर्धी मार्गों के बजाय पूरक रूप में देखा जाना चाहिए। जहां ईवी अकार्बनीकरण का रास्ता प्रदान करते हैं वहीं वे महत्त्वपूर्ण खनिजों और बैटरी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर अत्यधिक निर्भर हैं जो कुछ ही देशों में केंद्रित हैं। इसके विपरीत एथनॉल घरेलू स्तर पर उत्पादित होता है और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत कर सकता है। कम्प्रेस्ड बायोगैस में बढ़ती रुचि भी ऐसे परिवहन ईंधनों की खोज को दर्शाती है जो कृषि और पशुधन अपशिष्ट का उत्पादक उपयोग करते हैं, किसानों की आय को सहारा देते हैं और आयात पर निर्भरता कम करते हैं। यही वजह है कि एक विविध दृष्टिकोण रणनीतिक रूप से समझदारी भरा हो सकता है।

First Published : June 12, 2026 | 12:09 AM IST