संपादकीय

Editorial: बांग्लादेश-भारत संबंधों में सुधार की उम्मीद

बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने इस सप्ताह नए प्रधानमंत्री के विदेश मामलों के सलाहकार हुमायूं कबीर के साथ भारत का दौरा किया

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बीएस संपादकीय   
Last Updated- April 10, 2026 | 10:53 PM IST

बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने इस सप्ताह नए प्रधानमंत्री के विदेश मामलों के सलाहकार हुमायूं कबीर के साथ भारत का दौरा किया। उम्मीद है कि इस दौरे से ढाका में बांग्लादेश नैशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के नेतृत्व वाली नई सरकार और भारत सरकार के बीच संबंधों में सुधार होगा। विदेश मंत्री के रूप में रहमान का यह पहला विदेश दौरा नहीं है।

पिछले महीने वह इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईएस) की बैठक के लिए सऊदी अरब गए थे, जहां उन्होंने पाकिस्तान सहित कई देशों के साथ द्विपक्षीय बैठकें कीं। खबरों के अनुसार, भारत में हुई उनकी बैठक में बांग्लादेश ने अपनी पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग रखी, जो इस समय भारत में निर्वासन में हैं।

फिर भी, भारत को इस महत्त्वपूर्ण रिश्ते को फिर से मजबूत करने के लिए लगातार प्रयास करते रहना चाहिए। अतीत में उससे कई गलतियां हुई हैं। बांग्लादेश की घटनाओं और चुनावों के कारण मजबूर होने से पहले ही उसे बीएनपी के साथ संबंध सुधारना शुरू कर देना चाहिए था।

असम और पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनावों के प्रचार के दौरान व्याप्त तनावपूर्ण माहौल से इस प्रक्रिया में और भी बाधा आ रही है, जहां कथित ‘घुसपैठ’ एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा है। बांग्लादेश में भी विरोध प्रदर्शन और कट्टरपंथी गतिविधियां हुई हैं, जिनमें अखबारों समेत कथित ‘भारत समर्थक’ हितों और गतिविधियों को निशाना बनाया गया है। कूटनीति इस कठिन राजनीतिक माहौल को नजरअंदाज नहीं कर सकती, बल्कि इससे पार पाने के लिए उसे प्रयासरत रहना चाहिए।

सहयोग के लिए एक व्यावहारिक एजेंडा है जिस पर दोनों पक्षों को काम करना चाहिए। कनेक्टिविटी अवसंरचना, व्यापार सुगमता और ऊर्जा नीति ऐसे क्षेत्र हैं जिन्हें प्रभावी रूप से राजनीति से मुक्त किया जा सकता है और जिनसे ऐसे समाधान निकल सकते हैं जिनमें दोनों पक्ष अपनी जीत का दावा कर सकें। इस तरह के ठोस परिणाम सद्भावना पैदा कर सकते हैं और साथ ही किसी भी सरकार को कठिन राजनीतिक सवालों का तुरंत सामना करने से बचा सकते हैं।

यह निर्विवाद है कि बांग्लादेश में चीन की बढ़ती रणनीतिक उपस्थिति स्वाभाविक रूप से भारत के लिए चिंता का विषय है और इससे इस सहयोग में तत्परता आएगी, लेकिन भारत को निश्चित रूप से बांग्लादेश को चीन के साथ अपनी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा में मोहरे के रूप में इस्तेमाल करने के प्रलोभन से बचना चाहिए। न ही बांग्लादेश को पाकिस्तान के अधीन माना जाना चाहिए, भले ही वह उस देश के साथ संबंधों को सुधारने का प्रयास कर रहा हो।

इसके बजाय, उसे निरंतर, उच्च स्तरीय सहयोग बनाए रखने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो यह संकेत दे कि भारत बांग्लादेश को एक ऐसे पड़ोसी के रूप में गंभीरता से लेता है जिसके अपने वैध हित हैं और जो राजनीतिक बदलाव से गुजरा है।

बीएनपी नेतृत्व को यह संकेत देने के लिए और अधिक प्रयास करने होंगे कि वह समावेशी शासन करना चाहता है और अपने राजनीतिक गठबंधन में अल्पसंख्यक-विरोधी और भारत-विरोधी तत्त्वों पर लगाम लगाएगा। उसे यह समझना होगा कि यदि उसे क्षमा करना और भूलना कठिन लग रहा है, तो भारत के साथ भी ऐसा ही है।

पार्टी के पिछले कार्यकाल ने भारत में कड़वाहट का गहरा असर छोड़ा है। लेकिन यह दशकों पहले की बात है, और तब से बहुत कुछ बदल गया है। दोनों देशों ने आर्थिक विकास किया है और ऊर्जा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर वे समान चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। सहयोग करने के लिए वे बहुत कुछ कर सकते हैं।

सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय नेतृत्व बांग्लादेश की नई सरकार को यह स्पष्ट करे कि वह उसे सत्ता से हटाने या हेरफेर करने का प्रयास नहीं कर रहा है, बल्कि सह-अस्तित्व और सहयोग का एक नया स्वरूप खोजना चाहता है। पड़ोसी देशों के संबंध एक ही यात्रा से नहीं सुधर सकते, लेकिन यह कम से कम एक अच्छी शुरुआत होगी। इसके बाद सरकार के विभिन्न स्तरों पर निरंतर संपर्क बनाए रखना आवश्यक है।

First Published : April 10, 2026 | 10:37 PM IST