हाल ही में ओस्लो में संपन्न भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन यूरोप के नॉर्डिक क्षेत्र के साथ भारत के रिश्तों को व्यापक बनाने के मामले में अहम रहा है
हाल ही में ओस्लो में संपन्न भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन यूरोप के नॉर्डिक क्षेत्र के साथ भारत के रिश्तों को व्यापक बनाने के मामले में अहम रहा है। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिरकत की। नॉर्डिक में उत्तरी यूरोप के डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, नॉर्वे और स्वीडन जैसे देश शामिल हैं और अब भारत इनके साथ पारंपरिक कूटनीतिक रिश्तों के बजाय कहीं अधिक गहन रणनीतिक साझेदारी की दिशा में बढ़ रहा है।
इसमें पर्यावरण के अनुकूल तकनीक, नवाचार, रक्षा विनिर्माण और दीर्घकालिक पूंजी प्रवाह आदि शामिल हैं। शिखर सम्मेलन में कई अहम परिणाम सामने आए। इनमें हरित तकनीक और नवाचार रणनीतिक साझेदारी, जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सहयोग में इजाफा, आर्कटिक और पोलर शोध, समुद्री अर्थव्यवस्था तथा विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं की आवाजाही शामिल है।
नॉर्डिक देशों ने अगले 15 वर्षों में भारत में 100 अरब डॉलर का निवेश करने की प्रतिबद्धता जताई है। बदले में भारत ने इन देशों की रक्षा कंपनियों को रक्षा उद्योग गलियारे में 100 फीसदी विदेशी निवेश पहुंच प्रदान करने का वादा किया है।
यह भारत की विदेश नीति में व्यापक बदलाव को दर्शाता है जो भूआर्थिक और प्रौद्योगिकी-आधारित साझेदारियों की ओर अग्रसर है। इस संदर्भ में नॉर्डिक देश वे क्षमताएं प्रदान करते हैं जिनकी भारत को तत्काल आवश्यकता है। भारत और नॉर्डिक क्षेत्र के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग 19 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है जबकि 700 से अधिक नॉर्डिक कंपनियां पहले से ही भारत में काम कर रही हैं।
ऑफशोर विंड, कार्बन कैप्चर और स्टोरेज तथा सॉवरिन वेल्थ कैपिटल में नॉर्वे की ताकत भारत की कार्बन घटाने की महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करती हैं। डेनमार्क की नवीकरणीय ऊर्जा, बंदरगाह लॉजिस्टिक्स और साइबर सुरक्षा में विशेषज्ञता, स्वीडन का उन्नत विनिर्माण और रक्षा तकनीकें, तथा फिनलैंड की दूरसंचार और डिजिटल अधोसंरचना क्षमताएं भारत की औद्योगिक और तकनीकी प्राथमिकताओं से काफी मेल खाती हैं।
यह शिखर सम्मेलन भारत के इस प्रयास को भी रेखांकित करता है कि वह बढ़ती वैश्विक अनिश्चितता के बीच अपनी रणनीतिक साझेदारियों को विविध बनाना चाहता है। आपूर्ति श्रृंखलाएं अब भी चीन और पूर्वी एशिया में अत्यधिक केंद्रित हैं। इसलिए, भारत की यह पहल इस क्षेत्र की उन्नत और नवाचार-संचालित अर्थव्यवस्थाओं के साथ भरोसेमंद तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र और सुदृढ़ आर्थिक नेटवर्क के निर्माण पर केंद्रित है।
इस साझेदारी का स्वच्छ ऊर्जा संबंधी पहलू सबसे अहम है। भारत के उद्योगों को पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए बहुत बड़े पैमाने पर प्रौद्योगिकी, अधोसंरचना, वित्तपोषण और विशेषज्ञता की जरूरत होगी। नॉर्डिक देश ऑफशोर विंड, हरित हाइड्रोजन, टिकाऊ नौवहन, चक्रीय अर्थव्यवस्था मॉडल और जलवायु प्रतिरोधी अधोसंरचना में दुनिया में अग्रणी हैं।
नॉर्वे का 2.1 लाख करोड़ डॉलर का सॉवरिन वेल्थ फंड, जो दुनिया का सबसे बड़ा है, पहले से ही कई भारतीय कंपनियों में 34 अरब डॉलर से अधिक का निवेश रखता है और भारत की अधोसंरचना तथा ऊर्जा बदलाव परियोजनाओं के वित्तपोषण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
इस प्रकार, भारत की नॉर्डिक क्षेत्र के साथ सहभागिता तेजी से आर्कटिक भू-राजनीति, जलवायु विज्ञान और समुद्री रणनीति से जुड़ रही है। नॉर्डिक देशों के साथ सहयोग भारत को ध्रुवीय अनुसंधान विशेषज्ञता, समुद्री प्रौद्योगिकियों और आर्कटिक क्षेत्र से संबंधित उभरती शासन चर्चाओं तक पहुंच प्रदान करता है। प्रधानमंत्री की यात्रा का इटली वाला हिस्सा भी इसी रणनीतिक दिशा को मजबूत करता है।
भारत और इटली ने संबंधों को ‘विशेष रणनीतिक साझेदारी’ के स्तर तक आगे बढ़ाया और अहम खनिज, समुद्री अधोसंरचना, वैज्ञानिक अनुसंधान और कौशल आवाजाही पर समझौते किए, जो यूरोप में प्रौद्योगिकी साझेदारियों और आपूर्ति-श्रृंखला लचीलापन पर भारत के बढ़ते जोर को दर्शाते हैं। फिर भी चुनौतियां बरकरार हैं।
उदाहरण के लिए, नॉर्डिक निवेशक सख्त पर्यावरणीय, शासन और पारदर्शिता मानकों के तहत काम करते हैं जैसा कि कुछ भारतीय कंपनियों में निवेश से जुड़ी विवादों में देखा गया है। इसलिए भारत को दीर्घकालिक पूंजी आकर्षित करने के लिए नियामक पूर्वानुमान, संस्थागत विश्वसनीयता और शासन मानकों को मजबूत करना होगा।