संपादकीय

Editorial: पश्चिम एशिया में महाजंग का भारत पर प्रहार

ईरान-इजरायल युद्ध के चलते भारत में ऊर्जा संकट, बढ़ती महंगाई और निर्यात में गिरावट का खतरा पैदा हो गया है, जिससे आर्थिक स्थिरता बनाए रखना बड़ी चुनौती है

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बीएस संपादकीय   
Last Updated- March 24, 2026 | 10:42 PM IST

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने सोमवार को एक वक्तव्य में कहा कि ईरान के ऊर्जा ठिकानों पर सैन्य हमलों को पांच दिनों के लिए रोका जा रहा है। इससे एक पल को उम्मीद जगी कि पश्चिम एशिया में शत्रुता का माहौल खत्म हो सकता है। यह बात बाजार की प्रतिक्रिया में भी नजर आई। हालांकि, यह उम्मीद टिक नहीं सकी क्योंकि ईरानी अधिकारियों ने कहा कि वे अमेरिका के साथ कोई बातचीत नहीं कर रहे हैं।

बहरहाल ऐसी रिपोर्ट हैं कि पाकिस्तान, तुर्किये और मिस्र जैसे देश दोनों पक्षों से बातचीत कर रहे हैं ताकि किसी नतीजे पर पहुंचा जा सके। लेकिन फिलहाल जैसे हालात हैं, यह स्पष्ट नहीं है कि यह जंग कब और कैसे खत्म होगी। ईरान को बहुत अधिक क्षति पहुंची है लेकिन उसने माद्दा दिखाया है और वह समझौते का इच्छुक भी नहीं नजर आ रहा है। दोनों पक्षों ने ऊर्जा ढांचों पर हमले करने की धमकी दी है। अगर ऐसा हुआ तो इसके गहरे परिणाम सामने आ सकते हैं।

जंग का चौथा सप्ताह चल रहा है और इसका असर पहले ही भारत समेत कई देशों पर नजर आने लगा है। यह असर कई तरह से देखने को मिल रहा है हालांकि वृहद संकेतक हर बात को दर्ज नहीं करते हैं। उदाहरण के लिए अलग-अलग किस्म की गैस की कमी देखी जा रही है। सरकार ने उचित ही यह निर्णय लिया है कि घरेलू जरूरतों का ध्यान रखा जाएगा।

हालांकि, इसकी कीमत कारोबारों को चुकानी पड़ रही है। ऐसी खबरें हैं कि औद्योगिक क्षेत्रों के कामगार अपने गांवों को लौट रहे हैं। हालांकि यह सब कोविड जैसे पैमाने पर नहीं हो रहा है। कोविड कहीं अधिक बड़ा संकट था लेकिन छोटे कारोबारों के बंद होने से उत्पादन का नुकसान हो सकता है और मध्यम अवधि में हमें इसका असर देखने को मिल सकता है। फिलहाल तो उत्पादन और रोजगार पर इसके असर का आकलन करना मुश्किल है।

बहरहाल, अगर युद्ध जल्दी खत्म नहीं होता है तो विश्लेषक और नीति निर्माता दोनों को अपने विश्लेषण में इन कारकों का ध्यान रखना होगा। पश्चिम एशिया न केवल पेट्रोलियम आयात का स्रोत है बल्कि वह भारतीय निर्यात का एक बड़ा केंद्र भी है। भारत ने 2024-25 में करीब 57 अरब डॉलर मूल्य की वस्तुओं का निर्यात खाड़ी देशों में किया। अगर संकट लंबा खिंचा तो इस पर भी काफी गहरा असर हो सकता है।

लंबा खिंचता युद्ध व्यापक आर्थिक प्रबंधन चुनौतियों को बढ़ा देगा। राजकोषीय मोर्चे पर देखें तो, सरकार ने अब तक कच्चे तेल और गैस की कीमतों में वृद्धि को चुनिंदा रूप से टालने का निर्णय लिया है। इसका अर्थ है कि तेल कंपनियां नुकसान उठा रही हैं, जिससे सरकार को मिलने वाले लाभांश भुगतान कम हो जाएंगे। सरकार को खुदरा बिक्री पर होने वाली अंडर रिकवरी के लिए तेल कंपनियों को मुआवजा भी देना पड़ सकता है। उत्पादन में गिरावट प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर संग्रह दोनों को प्रभावित करेगी।

हाल ही में सरकार ने 1 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक स्थिरीकरण कोष घोषित किया है, हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि इसका उपयोग कब और कैसे किया जाएगा। सरकार को उर्वरक सब्सिडी के लिए भी काफी अधिक आवंटन करना पड़ सकता है।

ऊंची ईंधन कीमतों को चुनिंदा रूप से टाला गया है, इसके बावजूद वे मुद्रास्फीति दर को बढ़ा सकती हैं। विभिन्न क्षेत्रों में गैस की कमी के कारण उत्पादन में गिरावट भी कीमतों में परिलक्षित होगी। रिजर्व बैंक के अर्थशास्त्रियों ने अपने नवीनतम मासिक बुलेटिन में तर्क दिया कि स्थिति पर करीबी निगरानी की आवश्यकता है, लेकिन केंद्रीय बैंक का वास्तविक आकलन उसकी अगली मौद्रिक नीति समिति की बैठक के बाद ही ज्ञात होगा। यह बैठक आगामी 6 से 8 अप्रैल को होनी है।

रिजर्व बैंक की तात्कालिक चुनौती बाहरी क्षेत्र का प्रबंधन है। भारत में भुगतान संतुलन का घाटा चल रहा है और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश तथा पोर्टफोलियो निवेश के आंकड़े उत्साहजनक नहीं हैं। ऊंची तेल कीमतें चालू खाते के घाटे को 2025-26 के लिए सकल घरेलू उत्पाद के अनुमानित 1 फीसदी से अधिक बढ़ा सकती हैं। मौजूदा वैश्विक वातावरण में चालू खाते के ऊंचे घाटे की वित्तीय भरपाई चुनौतीपूर्ण हो सकती है।  

शायद अब वक्त आ गया है कि सरकार और केंद्रीय बैंक समन्वय करें और ऐसे कदम उठाएं जिनसे नुकसान कम से कम हो और व्यापक आर्थिक स्थिरता बनी रहे। 

First Published : March 24, 2026 | 10:40 PM IST