संपादकीय

Editorial: PM मोदी का विदेशी मुद्रा बचाने के लिए देश को एकजुट होने का आह्वान

होर्मुज संकट के कारण वैश्विक तेल कीमतों में उछाल से भारत पर दबाव बढ़ा है। पीएम मोदी ने विदेशी मुद्रा बचाने के लिए व्यवहारिक बदलाव और ऊर्जा बचत की अपील की है

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बीएस संपादकीय   
Last Updated- May 11, 2026 | 10:05 PM IST

होर्मुज स्ट्रेट संकट का वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर गहरा और दीर्घकालिक प्रभाव पड़ेगा। इस प्रकार यह मुद्रास्फीति, उत्पादन और वृद्धि पर भी असर डालेगा। अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि संकट कब तक जारी रहेगा। यह बात सराहनीय है कि केंद्र सरकार इस खतरे को गंभीरता से ले रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया भाषण यह दिखाता है कि सरकार इस भू-राजनीतिक झटके के संभावित खतरों को समझती है।

खासतौर पर वह खतरा जो व्यापक आर्थिक स्थिरता के लिए है। जब कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो भारत विशेष रूप से अपने बाहरी खाते पर दबावों को लेकर संवेदनशील हो जाता है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने विदेशी मुद्रा बचाने के महत्त्व पर सावधानीपूर्वक जोर दिया। उन्होंने इसे राष्ट्र के लिए सात अपीलों के रूप में प्रस्तुत किया। इनमें विदेश यात्रा को कम से कम करना, खाना पकाने में तेल की मात्रा कम करना और पेट्रोल व डीजल की खपत घटाने के लिए सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करना शामिल है।

प्रधानमंत्री ने किसानों से कम उर्वरक उपयोग करने का आह्वान भी किया जो आयातित उत्पादों पर निर्भर हैं और पेट्रोकेमिकल आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा हैं। इसके अलावा, सोना न खरीदने की अपील भी की गई। ध्यान रहे देश में सोने की खरीद विदेशी मुद्रा पर स्थायी बोझ है।

सरकार की मंशा सराहनीय है। व्यवहार संबंधी जो भी निर्देश दिए गए हैं वे मूल्यवान हैं लेकिन नीतिगत विकल्प और भी अधिक मायने रखते हैं। यदि सरकार बदली हुई आपूर्ति स्थिति के जवाब में कीमतों को शीघ्रता से समायोजित करने की अनुमति देती है तो लोग स्वतः ही उसका पालन करेंगे।

भारतीय राजनीति में कीमतों में बदलाव की इजाजत देने में एक किस्म की हिचकिचाहट है क्योंकि इससे कमजोर वर्गों पर प्रभाव पड़ने का डर है। यह स्वाभाविक चिंता है। परंतु किसी भी प्रकार की पीड़ा को लक्षित हस्तक्षेपों के माध्यम से दूर किया जा सकता है और किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, सरकार ने पहले ही इस उद्देश्य के लिए एक क्रेडिट गारंटी योजना तैयार की है।

हालांकि ऐसी चिंताएं कीमतों का उपयोग न करने का कारण नहीं हैं। विशेष रूप से पेट्रोल और डीजल की खपत को कम करने की संभावना तब ज्यादा है जब इन वस्तुओं की कीमतों को वैश्विक कीमतों के अनुरूप नियंत्रित करते हुए जवाबदेह तरीके से बढ़ाने की अनुमति दी जाए।

यह तकनीकी रूप से वही प्रणाली है जो भारत में कुछ हद तक पहले से मौजूद है। लेकिन तथ्य यह है कि अभी भी कीमतों के समायोजन स्तर को लेकर राजनीतिक प्रतिबंध हैं। अब जबकि सरकार इसे स्पष्ट संकट मान रही है तो ऐसे संकट के समय में इन प्रतिबंधों को अलग रख देना चाहिए।

विपक्षी दलों के कुछ लोग पहले से ही संकेत देने लगे हैं कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कोई भी बदलाव राजनीतिक मुद्दा बन जाएगा। लेकिन इन बातों को नजरअंदाज करना चाहिए। यह मानने की पर्याप्त वजह है कि जनता कीमतों में वृद्धि के व्यापक वैश्विक संदर्भ को समझती है।

सरकार को यह भी साफ बताना चाहिए कि न तो तेल विपणन कंपनियां और न ही बजट उपभोक्ताओं को अनिश्चित काल तक सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं। जानकारी के मुताबिक तेल कंपनियों को हर महीने 30,000 करोड़ रुपये की अंडर रिकवरी का सामना करना पड़ रहा है।

दो अन्य व्यापक आर्थिक हकीकतों को भी ध्यान में रखने की जरूरत है। पहला, चालू खाते के घाटे को लेकर चिंताओं पर सबसे सुरक्षित तरीका यह है कि रुपये को इस तरह अवमूल्यित होने दिया जाए कि आयात की खपत सामान्य रूप से घट जाए। फिलहाल यही नीति नजर आ रही है और इसे बनाए रखना चाहिए।

दूसरा, ठोस पूंजी प्रवाह ऐसी परिस्थितियों को संभालने में मदद कर सकते हैं। इसलिए, सरकार को यह पहचानना होगा कि अर्थव्यवस्था में विशेषकर विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा पूंजी को बाहर ले जाने की प्रवृ​त्ति क्यों बनी हुई है। इस प्रवृत्ति को उलटने के लिए सुधार की गति को तेज करना आवश्यक होगा। इनमें प्रशासनिक सुधार भी शामिल हैं।

First Published : May 11, 2026 | 10:05 PM IST