प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
देश की डिजिटल भुगतान क्रांति ने नागरिकों के लेनदेन के तौर तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है। परतु इसके साथ ही लोगों के साथ साइबर धोखाधड़ी का जोखिम भी बढ़ता जा रहा है। इन चिंताओं को ध्यान में रखते हुए रिजर्व बैंक ने गत सप्ताह मसौदा निर्देश जारी किए हैं ताकि डिजिटल लेनदेन में ग्राहक की देनदारी को सीमित करने के ढांचे की समीक्षा की जा सके। इसके लिए नियमन विभाग द्वारा जारी जिम्मेदार व्यावसायिक आचरण संबंधी मौजूदा दिशा-निर्देशों में बदलाव का प्रस्ताव रखा गया है। इस प्रस्ताव में छोटे मूल्य के डिजिटल धोखाधड़ी मामलों के लिए एक क्षतिपूर्ति तंत्र शामिल है।
जिन ग्राहकों को धोखाधड़ीपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन के माध्यम से 50,000 रुपये तक का नुकसान होता है, उन्हें नुकसान का 85 फीसदी या अधिकतम 25,000 रुपये (जो भी कम हो) तक का मुआवजा मिल सकता है, बशर्ते कि धोखाधड़ी की सूचना तुरंत दी जाए। यह महत्त्वपूर्ण है और उपभोक्ता विश्वास को बढ़ावा देगा। मसौदा निर्देश 1 जुलाई, 2026 से हितधारकों से परामर्श के बाद लागू होने की उम्मीद है। इन निर्देशों में अन्य बातों के साथ-साथ यह भी स्पष्ट किया जाएगा कि बैंक या ग्राहक की लापरवाही किसे माना जाएगा।
यह ढांचा ऐसे समय में सामने आया है जब भारत का डिजिटल भुगतान तंत्र तेजी से विस्तारित हो रहा है। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई के इर्दगिर्द बने प्लेटफॉर्म, मोबाइल वॉलेट और ऑनलाइन बैंकिंग आदि सभी को तेजी से अपनाया गया है। यहां तक कि दूरदराज इलाकों में भी उनका इस्तेमाल हो रहा है।
हालांकि फिशिंग हमले, वन-टाइम पासवर्ड घोटाले, नकली कस्टमर-केयर कॉल और मालवेयर आधारित धोखाधड़ी अब बेहद आम हो गए हैं। रिजर्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि 2024-25 के दौरान कार्ड और ऑनलाइन धोखाधड़ी मामलों की संख्या कुल धोखाधड़ी मामलों का 66.8 फीसदी रही। लगभग 13,500 कार्ड और इंटरनेट धोखाधड़ी के मामले, जिनमें 520 करोड़ रुपये की राशि शामिल थी, 2024-25 में दर्ज किए गए। मसौदे में मजबूत ग्राहक सुरक्षा तंत्र का भी प्रस्ताव है, जिसमें 500 रुपये से अधिक के लेनदेन पर अनिवार्य एसएमएस अलर्ट और शिकायतों के त्वरित समाधान की समयसीमा शामिल है।
बैंकों को तय समयसीमा के भीतर ग्राहकों को जवाब देना होगा, जिससे धोखाधड़ी पीड़ितों को अक्सर झेलनी पड़ने वाली देरी और प्रक्रियात्मक अड़चनों को कम किया जा सके। इसके अलावा आंशिक क्षतिपूर्ति भी उपलब्ध हो सकती है, भले ही ग्राहक की लापरवाही हो, बशर्ते धोखाधड़ी की सूचना पांच दिनों के भीतर दी जाए।
यह भी सही है कि केवल क्षतिपूर्ति से डिजिटल धोखाधड़ी की गहरी चुनौती का समाधान नहीं हो सकता। कई घटनाएं डिजिटल साक्षरता के निम्न स्तर और साइबर जोखिमों के प्रति सीमित जागरूकता का नतीजा होती हैं। पहली बार उपयोग करने वाले, बुज़ुर्ग ग्राहक और छोटे व्यापारी विशेष रूप से नकली भुगतान लिंक या नकली कॉल से जुड़े घोटालों के शिकार होते हैं। इसके अलावा, बैंकों, दूरसंचार प्रदाताओं और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी अक्सर धोखाधड़ी वाले खातों को फ्रीज करने और धन की वसूली में देरी करती है।
इसलिए प्रस्तावित ढांचे की प्रभावशीलता इस पर निर्भर करेगी कि बैंक कितनी जल्दी वास्तविक समय में धोखाधड़ी का पता लगाने वाली प्रणालियां लागू करते हैं और अपनी आंतरिक साइबर सुरक्षा संरचना को मजबूत करते हैं। हमें एक व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र के जरिये प्रतिक्रिया आवश्यक है। बैंकों को ऐसे साधनों में अधिक निवेश करना होगा जो संदिग्ध लेनदेन को तुरंत चिह्नित कर सकें। अनिवार्य वास्तविक समय अलर्ट, उच्च-जोखिम वाली गतिविधियों के लिए लेनदेन सीमा और मजबूत प्रमाणीकरण प्रणालियां धोखाधड़ी की संभावना को कम कर सकती हैं।
बैंकों, नियामकों और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल के माध्यम से सार्वजनिक जागरूकता अभियान उपयोगकर्ताओं को आम घोटाले की तकनीकों के बारे में शिक्षित करने के लिए समान रूप से आवश्यक हैं। लक्ष्य होना चाहिए कि ऐसी धोखाधड़ी की संभावना को ही समाप्त किया जाए।
हालांकि जब तक यह हासिल नहीं होता, तब तक रिजर्व बैंक का नया ढांचा ग्राहक विश्वास को बढ़ाने में मदद करेगा। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस ढांचे में ग्राहक को क्षतिपूर्ति देने के लिए रिजर्व बैंक, ग्राहक के बैंक और लाभार्थी बैंक सभी का योगदान आवश्यक होगा। यह संकेत देता है कि केंद्रीय बैंक इस चुनौती का समाधान करने के लिए गंभीर है।