प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
नया वित्त वर्ष ऐसे समय में आरंभ हो रहा है जब वातावरण में संदेह के बादल इस वर्ष की फरवरी की तुलना में अधिक हैं। फरवरी में वर्ष 2026-27 का आम बजट पेश किया गया था। दरअसल केंद्र सरकार का राजकोषीय गणित अपेक्षाकृत शांत समय में तैयार किया गया था। उस समय मुद्रास्फीति में कमी आ रही थी और सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि के 6.5 फीसदी से अधिक रहने का अनुमान जताया गया था।
इस प्रकार बजट सरकार के पूंजीगत व्यय को प्रोत्साहित करने के दृष्टिकोण को बनाए रखने में सक्षम रहा, साथ ही उसने ऋण में कमी का संकेत भी दिया। हालांकि, तब से बीते हफ्तों में ये धारणाएं अब शायद लागू नहीं होतीं। सबसे अस्थिर करने वाला घटनाक्रम निश्चित रूप से पश्चिम एशिया में फैलता हुआ संघर्ष है, जिसने कच्चे तेल की कीमतों में इजाफा किया है।
जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर बमबारी शुरू की थी, तब ब्रेंट क्रूड का एक बैरल केवल 70 डॉलर के आसपास था जो अब 110 डॉलर तक जा पहुंचा है। भारतीय बास्केट के कच्चे तेल की कीमत उससे काफी अधिक है, क्योंकि हमारे देश की निर्भरता खाड़ी स्रोतों पर है। यह अस्थिरता निकट भविष्य में जारी रहेगी, क्योंकि अब ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट से किसी भी जहाज के आवागमन पर अपना अधिकार जताया है, और यमन में हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में जहाजों के खिलाफ अपना अभियान फिर से शुरू कर दिया है। इसका व्यापक असर व्यापारिक गतिविधियों पर पड़ेगा।
इससे कई क्षेत्र दबाव में आएंगे और वर्ष के लिए सरकार की योजना और अधिक जटिल बन जाएगी। ईंधन की ऊंची कीमतें मुद्रास्फीति पर असर डाल सकती हैं और ऐसे समय में रुपये का अवमूल्यन होने से आयातित मुद्रास्फीति में भी इजाफा हो सकता है। परंतु हमें और भी बातों पर विचार करना होगा। खास तौर से कच्चे माल की कमी कई अहम उद्योगों पर असर डाल सकती है।
उदाहरण के लिए उर्वरक उत्पादन गैस की उपलब्धता पर निर्भर है और आने वाले बोआई मौसम में इसकी कमी लागत, मुदास्फीति और यहां तक कि जीवन स्तर तक पर असर डालेगी। श्रम-प्रधान क्षेत्रों जैसे वस्त्र उद्योग में पॉलिएस्टर का उपयोग होता है, जो एथिलीन ग्लाइकॉल पर निर्भर है और यह होर्मुज से जुड़ा हुआ है। स्टील, अर्थव्यवस्था की पूंजीगत वस्तुओं की रीढ़ है।
उसके लिए चूना पत्थर फ्लक्स की आवश्यकता होती है और इसके आयात का बड़ा हिस्सा खाड़ी के एक ही बंदरगाह से आता है। ऐसे धीमेपन का असर न केवल लागत-प्रेरित मुद्रास्फीति और वृद्धि पर व्यापक आर्थिक प्रभाव डालेगा, बल्कि राज्य के लिए संरक्षण या सब्सिडी की मांग भी बढ़ाएगा।
सरकार ने पहले ही उपभोक्ताओं और तेल कंपनियों को इस संकट के कुछ प्रभावों से बचाने के लिए कदम उठाए हैं, जिससे ईंधन लागत में वैश्विक वृद्धि के असर को सीमित किया जा सके। लेकिन यह टिकाऊ नहीं है, और कुछ राजकोषीय प्रभाव पहले से ही अनुमानित किए जा सकते हैं। विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क को कम कर दिया गया है, जिसे यदि इसे पूरे वर्ष बनाए रखा जाए तो राजकोष को 1.3 से 1.7 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होगा।
यद्यपि बजट गणना में कुछ आकस्मिकताओं के लिए जगह रखी गई थी लेकिन इस आकार की कटौतियां राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 4.3 फीसदी तक रखने के लक्ष्य को हासिल करना कठिन बना देंगी। व्यापक ऋण समेकन एजेंडा पहले से ही इस वजह से जटिल हो गया है कि ऐसे लक्ष्यों का आधार, भारत का नॉमिनल जीडीपी नई जीडीपी श्रृंखला के तहत संशोधित कर घटाया गया है।
इसके अलावा, यदि मुद्रास्फीति अर्थव्यवस्था में फैलने लगे और रिजर्व बैंक के 4 फीसदी लक्ष्य को काफी हद तक पार करने की हालत बने, तो मौद्रिक नीति को समायोजित करना पड़ सकता है। और इसके बाद आने वाला धीमापन सरकार के राजस्व और उसके राजकोषीय लक्ष्यों को पूरा करने की क्षमता पर और असर डालेगा। सरकार के लिए यह समझदारी होगी कि वह स्वीकार करे कि बजट के बाद से उसकी धारणाएं भौतिक रूप से बदल गई हैं। पारदर्शी मध्य मार्ग सुधार, राजकोषीय गणना पर सतर्क नजर और संकट राहत के लिए संतुलित दृष्टिकोण आने वाले वर्ष में आवश्यक हो सकता है।