सर्वोच्च न्यायालय के 13 अप्रैल के निर्णय ने एक बार फिर विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया के संचालन पर ध्यान केंद्रित कर दिया है। अपने फैसले में न्यायालय ने पश्चिम बंगाल के उन मतदाताओं को अंतरिम मतदान का अधिकार देने से इनकार कर दिया है जिनके नाम एसआईआर की प्रक्रिया में हटा दिए गए थे। यानी आगामी विधान सभा चुनावों के लिए करीब 27 लाख मतदाता, सूची से बाहर हो गए हैं।
इन मतदाताओं की अपीलें वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय 19 विशेष न्यायिक पंचाटों के समक्ष लंबित हैं। पश्चिम बंगाल 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एकमात्र ऐसा है जहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की 4 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में की गई अपील के बाद विशेष न्यायिक निर्णय की एक अतिरिक्त परत मौजूद है।
कुल मिलाकर 90 लाख मतदाता यानी कुल मतदाताओं के 12 फीसदी सूचियों से बाहर हो गए हैं। इनमें से करीब 60 लाख अनुपस्थित या मृत मतदाता थे। बाकियों के लिए निर्वाचन आयोग ने माना है कि या तो 2002 की सूचियों से उनका संबंध नहीं साबित हुआ या फिर उनके मामलों में कुछ ‘तार्किक विसंगतियां’ है। एक विवादास्पद एआई एल्गोरिद्म के तहत इन तार्किक विसंगतियों को पांच श्रेणियों में बांटा गया था।
इनमें वर्तनी के अंतर, माता-पिता और मतदाता के बीच आयु अंतर, एक ही पूर्वज से जुड़े छह से अधिक लोग आदि शामिल थे। हालांकि, यह धीरे-धीरे स्पष्ट हो गया कि इन तथाकथित विसंगतियों के पीछे का तर्क संदिग्ध है। परिणामस्वरूप, कुछ परिवार के सदस्य बाहर कर दिए गए जबकि अन्य को शामिल किया गया। दशकों से मतदान कर रहे कुछ मतदाताओं को सूची से बाहर कर दिया गया, और इसी तरह के अन्य मामले हैं।
एक ओर जहां न्यायालय द्वारा निर्धारित पंचाटों को इन मुद्दों को अधिक गहराई से देखना था, वहीं प्रक्रिया के क्रियान्वयन पर प्रश्न उठाए ही जाने चाहिए। पश्चिम बंगाल और पड़ोसी ओडिशा तथा झारखंड से आए करीब 700 न्यायिक अधिकारियों ने 60 लाख से अधिक मामलों की सुनवाई की। जिन लोगों के नाम इस प्रारंभिक प्रक्रिया में साफ नहीं हुए हैं उन्हें इस उद्देश्य के लिए स्थापित किए गए 19 विशेष पंचाटों के पास जाने की अनुमति दी गई। यहां समस्या यह है कि निर्णय के लिए कोई समयसीमा निर्धारित नहीं की गई है। ऐसा इसलिए क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय का तर्क है कि पंचाटों में कार्यरत पूर्व न्यायाधीशों पर बहुत अधिक बोझ नहीं डाला जा सकता।
इस स्थिति को देखते हुए, अदालत को अधिक संसाधन जुटाने और मामलों से निपटने के लिए समयसीमा तय करनी चाहिए थी। ऐसा न करने से इस अभ्यास का उद्देश्य विफल हो गया है। फिर भी, न्यायाधीशों ने मतदाताओं को बाहर करने की प्रक्रिया पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यदि 10-15 फीसदी मतदाताओं को बाहर कर दिया जाता है तो 2 फीसदी तक का जीत का अंतर अमान्य हो सकता है।
अब जबकि मतदाता सूची में परिवर्तन रोक दिया गया है, तो लगभग 27 लाख मतदाता 23 और 29 अप्रैल को मतदान नहीं कर पाएंगे। यह दावा कि एसआईआर प्रक्रिया का उद्देश्य सूची को ‘साफ’ करना और ‘गैर-नागरिकों’ को मतदान से बाहर करना है (पश्चिम बंगाल की बांग्लादेश के साथ लगी सीमा से घुसपैठ का संकेत) नाम हटाने के रुझान में परिलक्षित होता नहीं दिखता।
निश्चित रूप से, रिपोर्टों के अनुसार, मुसलमानों का हिस्सा इस कटौती में एक-तिहाई से अधिक है, और मालदा, मुर्शिदाबाद, नदिया और कूच बिहार जैसे सीमावर्ती जिले सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। लेकिन राज्य की राजधानी कोलकाता के उत्तर और दक्षिण दोनों हिस्सों में 27 से 30 फीसदी मतदाताओं को सूची से बाहर कर दिया गया है, जो राज्य में सबसे अधिक दर है।
इसी तरह कुछ हिंदू-बहुल जिलों, जैसे पश्चिम बर्दवान, में भी तीव्र कटौती हुई है। ये रुझान एसआईआर प्रक्रिया की सत्यता पर सवाल उठाते हैं और तत्काल पुनर्विचार की आवश्यकता जताते हैं। यह भी बहस योग्य है कि क्या एसआईआर चुनाव के ऐन पहले आयोजित किया जाना चाहिए था। यदि बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाता बाहर रह जाते हैं, तो यह उद्देश्य को विफल कर देता है। ऐसी प्रक्रियाएं न केवल निष्पक्ष होनी चाहिए बल्कि निष्पक्ष दिखनी भी चाहिए।