प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
असम और केंद्र शासित प्रदेश पुदुच्चेरी को छोड़ दिया जाए तो ताजा विधान सभा चुनाव परिणामों का प्रमुख संदेश यही है कि मतदाता बदलाव चाहते हैं। दो साल पहले अभिनेता से राजनेता बने जोसेफ विजय चंद्रशेखर (लोकप्रिय नाम विजय) द्वारा बनाई गई पार्टी तमिलगा वेट्री कषगम (टीवीके) की कामयाबी इसका बेहतरीन उदाहरण है। टीवीके ने तमिलनाडु के दो पुराने राजनीतिक दलों सत्ताधारी द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (एआईएडीएमके) को न केवल कड़ी चुनौती दी बल्कि सबसे बड़ा दल बनकर भी उभरी।
विजय ने अपनी विराट सितारा छवि और शक्ति का उपयोग एक ‘परिवर्तनकारी’ विकल्प के रूप में किया जिसमें नकद और सोने जैसी भारी मुफ्त सुविधाओं के ऐलान के साथ-साथ महिलाओं और युवा मतदाताओं को लक्षित करने वाली छात्रवृत्तियों के प्रस्ताव भी शामिल थे। ये सभी बड़ी संख्या में मतदान करने आए। केरलम में मतदाताओं ने अपनी पारंपरिक प्रवृत्ति की ओर लौटते हुए दो स्थापित राजनीतिक गठबंधनों की अदला-बदली जारी रखी है। कांग्रेस-नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट ने पिनाराई विजयन के लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट की ऐतिहासिक दो कार्यकालों की जीत को बड़े अंतर से पलट दिया।
सत्ताविरोधी भावना का सबसे स्पष्ट सबक पश्चिम बंगाल से निकला जहां भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने आखिरकार ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस को 15 साल के बाद सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाने की अपनी हसरत पूरी कर ली। प्रदेश में दोनों चरणों में रिकॉर्ड मतदान हुआ था। मतदान और जीत का पैमाना दोनों यह स्पष्ट करते हैं कि विवादास्पद विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की चुनाव परिणामों में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका नहीं रही।
तृणमूल कांग्रेस ने इसे चुनाव अभियान के केंद्र में रखकर गलत आकलन किया। परंतु इससे ममता बनर्जी के शासन की अस्थिर होती प्रकृति को कम करके दिखाने में कोई मदद नहीं मिली। निवेश में ठहराव, पार्टी में बढ़ता भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा को लेकर समानुभूति का न होना और बढ़ती राजनीतिक हिंसा। इन सभी ने युवा मतदाताओं और महिलाओं को पार्टी से विमुख करने में अहम भूमिका निभाई।
तृणमूल कांग्रेस की सरकार का आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना जैसी केंद्रीय योजनाओं का विरोध करना भी इसमें अहम हो सकता है। ममता बनर्जी की अल्पसंख्यकों को ‘सुरक्षित’ वोट बैंक के रूप में तुष्ट करने की नीति भी उनके खिलाफ गई। और भाजपा एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में सामने आई। यह ममता बनर्जी के शासन रिकॉर्ड के बारे में बहुत कुछ कहता है कि भाजपा ने कई मुस्लिम-बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में उल्लेखनीय पैठ बनाई है।
एक बार अंतिम परिणाम आने के बाद, शासन का वास्तविक कामकाज ही आने वाली सरकारों की क्षमता की परीक्षा लेगा। तमिलनाडु में, जहां टीवीके को सरकार बनाने के लिए संभवतः सहयोगियों की आवश्यकता होगी वहां विजय को यह आभास हो सकता है कि उच्च ऋण और राजकोषीय दबाव उनकी कल्याणकारी योजनाओं की उदारता को कम कर सकते हैं। उनके वादों में महिलाओं के लिए 2,500 रुपये मासिक भत्ता, गरीब महिलाओं के लिए विवाह सहायता (सोना और रेशमी साड़ी), मुफ्त रसोई गैस, परिवहन और स्वच्छता उत्पाद, छात्रवृत्तियां, प्रारंभिक ऋण और बहुत कुछ शामिल थे।
केरल में मुख्य चुनौती खाड़ी देशों में नौकरियों और वहां से धन प्रेषण में कमी के कारण उत्पन्न तात्कालिक संकट को संभालने की है जिसने लंबे समय से राज्य में आर्थिक वृद्धि और नौकरियों की कमी को छिपा रखा था। बहुलतावादी संस्कृति वाले पश्चिम बंगाल में, भाजपा के ‘विकास’ एजेंडे की परख अब बंगाली समाज के खुले सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के मुकाबले होगी। इन प्रतिस्पर्धी ताकतों को संतुलित करने के लिए भूमि कानूनों को उलटना, दशकों की राजनीतिक हिंसा को थामना और कई दशकों बाद राज्य को व्यवसाय-अनुकूल बनाना आवश्यक होगा। जैसा कि राजनीतिक दलों ने अतीत में भी महसूस किया है, चुनाव जीतने और शासन चलाने के बीच की खाई को पाटना एक चुनौतीपूर्ण कार्य हो सकता है।