आईसीआईसीआई बैंक को काम पर रखने लायक एक शख्स को चुनने के लिए 42 बॉयोडेटा से गुजरना पड़ता है।
न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में शामिल कंपनियों के एक सर्वे में बैंक के प्रमुख के.वी. कामत ने कहा है कि भारत के इस सबसे बड़े प्राइवेट बैंक को पिछले साल 17,500 लोगों को चुनने के लिए कम से कम साढ़े सात लाख बायोडेटा की जांच करनी पड़ी। यह सर्वे पिछले सोमवार को जारी किया गया है।
वैसे, कामत इकलौते ऐसे शख्स नहीं हैं, जिनके मुताबिक अच्छे लोगों को चुनना एक बेहद मुश्किम काम है। मिसाल के तौर इन्फोसिस को ही ले लीजिए। देश की इस काफी मशहूर आईटी कंपनी में नौकरी पाना हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में दाखिला पाने से भी मुश्किल काम है। इसके पास हर साल करीब 15 लाख आवेदन पत्र आते हैं, लेकिन उनमें से केवल एक फीसदी लोगों को ही नौकरी मिल पाती है।
दूसरी तरफ, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के लिए आवेदन करने वालों में से करीब नौ फीसदी लोगों को वहां प्रवेश दिया जाता है। भारतीय कंपनियों की अच्छे लोगों की यह खोज केवल ऊंचे ओहदों तक ही सीमित नहीं है। पिछले महीने स्टेट बैंक में क्लर्क के 20 हजार पदों के लिए लिखित परीक्षाएं आयोजित हुई थीं।
उस परीक्षा में दो या तीन लाख नहीं, बल्कि पूरे 24 लाख लोग बैठे थे। इसका मतलब यह हुआ कि उस परीक्षा में बैठने वाले हर 120 लोगों में से केवल एक शख्स को ही नौकरी मिलेगी। ये आंकड़े एक ऐसे मुल्क के लिए वाकई चिंता की बात है, जहां हर साल विश्वविद्यालयों से कम से कम ग्रैजुएट पास आउट होते हैं। इनमें कम से कम चार लाख इंजीनियर होते हैं, जबकि दो लाख आईटी प्रोफेशनल होते हैं।
जाहिर सी बात है, पढ़े-लिखे लोगों की इतनी बड़ी फौज भी भारतीय कंपनियों का दिल लुभाने में नाकामयाब रही है। इन लोगों के काम करने की क्षमता पर बहुत बड़ा सवालिया निशान लगा हुआ है। हकीकत तो यह है कि खुद नैसकॉम का कहना है कि इनमें से आधे युवा भी काम करने के लायक नहीं हैं। इससे भी बड़ी दिक्कत तो इंजीनियरिंग जैसे विषयों में मास्टर्स और पीएचडी करने वाले लोगों की तेजी से घटती तादाद है।
देसी विश्वविद्यालय हर साल केवल 20 हजार छात्रों को ही मास्टर डिग्री प्रदान करते हैं, जबकि पीएचडी पाने वाले छात्रों की तादाद केवल एक हजार है। वहीं, अमेरिकी विश्वविद्यालय हर साल इंजीनियरिंग में 50 हजार मास्टर्स डिग्री और 12 हजार पीएचडी डिग्री प्रदान करते हैं। दरअसल, भारतीय विश्वविद्यालय इतने भी पीएचडी डिग्री होल्डर नहीं दे रहे हैं, जिससे उनकी खुद की जरूरतें पूरी हो सकें। इसी वजह से उनमें पढ़ाई की गुणवत्ता दिनोंदिन बद से बदतर होती जा रही है।
लेकिन निराशा की इस काली रात में उम्मीद की एक छोटी सी किरण भी है। वह किरण है इन कंपनियों का अपना अलग शिक्षा कार्यक्रम, जिसकी वजह से ये कंपनियां कमाल दिखा रही हैं। उनके अपने अलग शिक्षा कार्यक्रम की वजह से वे कई कठिन से कठिन कामों में माहिर लोगों की फौज तैयार कर रहे हैं। अमेरिका के कॉफमैन फाउंडेशन के लिए डयूक यूनिवर्सिटी ने इस बारे में काफी गहराई से अध्ययन किया।
इस शोध में उन्होंने अमेरिकी कंपनियों को भारतीय कंपनियों से यह सीख लेने के लिए कहा गया कि अच्छे लोगों की फौज कैसे तैयार करते हैं। इस शोध का कहना है कि,’मुश्किल हालत में भी दुनिया को कड़ी टक्कर कैसे देते हैं, यह बात अमेरिका को शायद भारत से सीखनी चाहिए। अमेरिकी शिक्षा व्यवस्था की गिनती तो दुनिया की बेहतरीन में होती है, लेकिन हमें इसे हुनर के इजाफे के साथ जोड़ना चाहिए।
आज की आपस में जुड़ी दुनिया में खुद को दूसरों से आगे रखने का तरीका काफी सटीक है। इससे नई सोच को बढ़ावा मिलता है और कंपनी खुद को आगे रख सकती है।’ हालांकि, इस बात पर भरोसा काफी मुश्किल है। इसकी वजह यह है कि मुल्क के उद्योगों और शिक्षण संस्थानों के बीच बहुत ही कमजोर संबंध है। इसे लेकर देश को काफी आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ता है।
कुछ कंपनियों ने तो बिल्कुल अलग से कदम उठाकर लोगों को हैरान कर दिया है। उन्होंने कमजोर समझे जाने वाले संस्थानों से लोगों को लेकर उन्हें काफी जबरदस्त कर्मचारियों में बदल डाला है। उन्होंने छोटे कॉलेजों से छात्रों को लेते वक्त केवल एक बात को ध्यान में रखा कि उन्हें कुछ नहीं आता है और उन्हें सब कुछ शुरू से सिखाना पड़ेगा। मिसाल के तौर पर इन्फोसिस को ही ले लीजिए।
चुने गए हर शख्स को शुरू में हर दिन आठ घंटे कंपनी के विशाल मैसूर ट्रेनिंग सेंटर में बिताने पड़ते हैं। यहां उन्हें सॉफ्टवेयर प्रोग्रामिंग से लेकर टीम बिल्डिंग के बारे में बताया जाता है। कंपनी में नौकरी पाने के लिए हर नए शख्स को इसके बाद तीन-तीन घंटे के दो काफी मुश्किल इम्तिहान पास करना होता है।
इस मामले में टाटा कंसल्टेंसी सर्विस (टीसीएस) भी पीछे नहीं है। उसका टीसीएस इग्नाइट नाम का अपना टे्रनिंग प्रोग्राम है। इसके तहत कंपनी नौ राज्यों के 200 कॉलेजों में से विज्ञान स्नातकों को लेती है। फिर उन्हें सात महीने का खास प्रशिक्षण दिया जाता है, इसके बाद ही कंपनी के दरवाजे उनके लिए खुलते हैं। इसके लिए चुने गए लोगों को लिखित रूप से कंपनी के साथ दो साल तक काम करने का वादा करना पड़ता है।
केवल आईटी कंपनियां ही इस तरह के प्रोग्रामों को नहीं चला रही हैं। अब अकाउंटिंग फर्म अर्नेस्ट ऐंड यंग को ही ले लीजिए। वह नए स्नातकों को अपनी टैक्स एकेडमी की तरफ लुभा रही है, जहां उन्हें टैक्स एसोसिएट के तौर पर प्रशिक्षित किया जाता है। कंपनी ने यह कदम नए चार्टर्ड अकाउंटेंट की भारी कमी को देखते हुए उठाया है।
रिटेल सेक्टर की बड़ी कंपनी पैंटालून ने भी मदुरै कामराज यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर रिटेल क्षेत्र के लिए खास तौर पर एक बीबीए पाठयक्रम शुरु किया है। दूसरी तरफ, आईसीआईसीआई बैंक के प्रोबेशनरी ऑफिसर प्रोग्राम के तीसरे बैच की पढ़ाई नवंबर से शुरू होगी। इसके तहत चुने गए लोगों को एक साल तक बैंक के मणिपाल कैंपस में प्रशिक्षण दिया जाएगा।
इस प्रशिक्षण में पास होने पर उन्हें बैंक में सहायक प्रबंधक की नौकरी दी जाएगी, जिसमें उन्हें 3.5 लाख रुपये प्रति साल का शुरुआती वेतन दिया जाएगा। इसके लिए बैंक एक प्रवेश परीक्षा आयोजित कराता है, जिसमें 55 फीसदी अंक लाने वाला कोई भी स्नातक बैठ सकता है।
हालांकि, इन कार्यक्रमों के तहत प्रशिक्षण पाने वाले लोगों की तादाद आज काफी कम है, लेकिन भारतीय कंपनियों का अलग शिक्षण कार्यक्रम बदलाव की शुरुआत तो कर रहा है।