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प्रदूषण का पक्का इलाज इलेक्ट्रिक कारें

Last Updated- December 07, 2022 | 9:02 AM IST

आज पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों ने आम लोगों के साथ तेल कंपनियों का बजट भी बिगाड़ कर रख दिया है।


अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों की वजह से महंगाई भी तेज रफ्तार से बढ़ती जा रही है। ऊपर से पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहनों से जो प्रदूषण फैलता है, सो अलग। ऐसे में राहत का सबब बनकर आए हैं, बिजली से चलने वाले वाहन यानी इलेक्ट्रिक व्हीकल। इनमें न तो पेट्रोल या डीजल की जरूरत पड़ती है और न ही इनसे किसी भी तरह का कोई धुंआ निकलता है।

यानी तेल की चढ़ती कीमतों से भी मुक्ति और साफ हवा में सांस लेने का मजा भी अलग से।  अपने देश में तो अब इन वाहन का इस्तेमाल खूब हो रहा है। बड़े शहरों में इन्हें चाहने वालों की तादाद काफी तेजी से बढ़ रही है। इन वाहनों के इतने लोकप्रिय होने की एक वजह यह भी है कि पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहनों की तुलना में इन्हें चलाना बहुत ही आसान है। वैसे अब भी कई ऐसी बातें हैं जो इनके बारे में लोग-बाग नहीं जानते हैं। तो आइए, जानते हैं बिजली से चलने वाले इन वाहनों के उन अनजान पहलुओं के बारे में।

क्या बला है ये?

इलेक्ट्रिक व्हीकल यानी बिजली से चलने वाला वाहन। इन्हें वैकल्पिक ईंधन वाले वाहनों के नाम से भी जाना जाता है। यह आम वाहनों से बिल्कुल जुदा होते हैं। इनमें पहली बात तो यह है कि न तो इंजन होता है और न ही फ्यूल टैंक। इलेक्ट्रिक व्हीकल में इंजन की जगह बिजली से चलने वाले मोटर होते है और उन्हें कंट्रोल करने के लिए होता है, मोटर कंट्रोलर।

फ्यूल टैंक की जगह इन कारों में बैटरी का एक सेट होता है। इसी बैटरी के सेट से इसकी मोटर को बिजली मिलती है, जिसकी मदद से कार को आगे बढ़ाया जाता है। इन कारों की बैटरियों को 70-80 मील के बाद रिचार्ज करना पड़ता है। लेकिन इनकी बैटरियों की वजह से इलेक्ट्रिक व्हीकल से जरा सा भी धुंआ नहीं निकलता है। वैसे, ये वाहन हाइब्रिड वाहनों से बिल्कुल ही अलग होते हैं।

ऐसा इसलिए क्योंकि हाइब्रिड वाहनों में ऊर्जा के दो स्रोत होते हैं। इनमें पेट्रोल या डीजल का इस्तेमाल भी किया जाता है, जबकि बैटरी का इस्तेमाल जरूरत के वक्त होता है। एक और बात, बिजली से चलने वाले वाहनों से रत्ती भर भी धुंआ नहीं निकलता है, जबकि हाइब्रिड कारों से कम ही सही, लेकिन धुंआ निकलता है। बिजली से चलने वाले वाहनों में मूल रूप से एक ही तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है।

क्या हैं इसके फायदे?

बिजली से चलने वाले वाहनों के एक नहीं, बल्कि कई फायदे हैं। जाने माने ऑटो एक्सपर्ट रनोजॉय मुखर्जी का कहना है कि, ‘बिजली से चलने वाली कारों और बाइक्स से प्रदूषण जरा सा भी नहीं फैलता है। वजह है इसमें लगी बैटरी। साथ ही, इससे ध्वनि प्रदूषण भी नहीं होता। ऐसा इसलिए क्योंकि इसमें लगा हुआ है बिजली से चलने वाली मोटर। इसकी वजह से इन वाहनों से ज्यादा आवाज नहीं होती।’ इसी वजह से तो कई विशेषज्ञ धरती को ग्लोबल वार्मिंग के नुकसान से बचाने के लिए इन वाहनों को अपनाने की मांग कर रहे हैं।

अब आप सोच रहे होंगे कि नई तकनीक होने की वजह से इसकी मेंटेनेंस पर काफी खर्च आएगा। लेकिन जनाब ऐसी बात बिल्कुल भी नहीं है। मुखर्जी की मानें तो इसकी मेंटेनेंस पर ज्यादा खर्च नहीं होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि इसकी तकनीक काफी साधारण है। इसमें बस एक बिजली से चलने वाली मोटर होती है और बैटरियों का एक सेट। इसलिए कोई दिक्कत आने पर इसे काफी आसानी से दुरुस्त किया जा सकता है।  बकौल मुखर्जी, ‘इन वाहनों का सबसे फायदा इनका किफायती होना है। पेट्रोल और डीजल वाहनों के मुकाबले इन्हें चलाने में काफी कम खर्च आता है।’

वहीं, ऑटो एक्सपर्ट टूटू धवन का कहना है कि, ‘इन वाहनों को चलाना पेट्रोल या डीजल वाहनों की तुलना में काफी आसान होता है। इसमें गियर नहीं होते हैं, जिसकी वजह से इसे कोई भी साइकिल चलाना जानने वाला शख्स आराम चला सकता है। यही वजह तो है कि इलेक्ट्रिक बाइक को महिलाएं और बच्चे खूब चलाते हैं।’ साथ में, इस पर सरकार अच्छी खासी सब्सिडी भी दे रही है।

तस्वीर का दूसरा पहलू

यह बात तो सभी मानते हैं कि इलेक्ट्रिक वाहनों के फायदे काफी सारे हैं, लेकिन इसकी भी काफी सीमाएं हैं। मुखर्जी का कहना है, ‘पहली बात तो यह जान लीजिए कि इसे प्रदूषण फैलाने में रोकने वाला कतई नहीं माना जा सकता है। इनमें बैटरी को चार्ज करने के लिए बिजली का इस्तेमाल होता है। बिजली को पैदा करने के लिए कोयले को ही जलाया जाता है। उससे तो प्रदूषण होता ही है न। इसकी बैटरी में भी कई दिक्कतें हैं।

आम तौर पर भारत में जिस बैटरी का इस्तेमाल किया जाता है, वो काफी महंगी होती है और 20 से 25 हजार किलोमीटर चलने के बाद दम तोड़ देती। मतलब आपको नई बैटरी की जरूरत पड़ेगी, जिसकी कीमत काफी ज्यादा होती है। ऊपर से, मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों में बिजली की वैसी ही काफी किल्लत है। ऐसे में आपको अपनी कार या स्कूटर को चार्ज करने का मौका कैसे मिल पाएगा? साथ ही, अगर आप इसमें एसी और दूसरी चीजों को जोर देंगे तो इसकी माइलेज भी कम हो जाती है। एक अकेली बैटरी कितनी चीजों का बोझ उठा पाएगी। ‘

धवन का कहना है कि, ‘अगर हम भारत की पहली इलेक्ट्रिक कार ‘रेवा’ की बात करें तो इसका एसी कतई दमदार नहीं है। गर्मी के दिनों में तो यह काफी दुखदायी अनुभव होगा।’ विशेषज्ञों की मानें तो इन वाहनों में पिकअप भी नहीं होता है और पेट्रोल व डीजल से चलने वाले वाहनों के मुकाबले इनकी रफ्तार भी काफी कम होती है। एक और बड़ी दिक्कत इस कार के साथ यह है कि यह लंबे सफर के लिए कतई अनुकूल नहीं है।

देसी बाजार पर चला जादू

इलेक्ट्रिक वाहनों का जादू तो अपने मुल्क पर सिर चढ़ कर बोल रहा है। ये भारत में खूब बिक रहे हैं। अगर इलेक्ट्रिक बाइक बनाने वाली कंपनी हीरो इलेक्ट्रिक की बात करें तो पिछले साल उसने करीब 21 हजार ई-बाइक बेची थी। कंपनी के मुताबिक इस साल के लिए उसने 70 हजार ई बाइक बेचने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए उसने 80 करोड़ रुपये का निवेश करने का भी इरादा जताया है।

साथ ही, उसने अपनी सालाना उत्पादन क्षमता को भी बढ़ाकर एक लाख इकाई करने की भी योजना बनाई है। जहां तक देश की पहली इलेक्ट्रिक कार ‘रेवा’ की बात है, तो इसने भी कामयाबी के कई झंडे गाड़े हैं। यह दुनिया की सबसे कामयाब इलेक्ट्रिक कार है। आज की तारीख में हजारों रेवा कारें केवल भारत की ही नहीं, बल्कि अमेरिका और यूरोप की सड़कों पर भी दौड़ रही हैं।

वैसे इसके सामने चुनौतियां भी जबरदस्त हैं। सबसे बड़ी चुनौती तो उसे मिलने वाली है, टाटा की नैनो से। नैनो के बेसिक मॉडल की कीमत जहां 1.25 से 1.30 लाख रुपये होगी, वहीं रेवा के बेसिक मॉडल की कीमत करीब तीन लाख रुपये है। वह भी तब, जब रेवा पर राज्य सरकारें भारी छूट दे रही हैं। 

First Published - July 3, 2008 | 10:09 PM IST

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