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रोजगार के आंकड़े और असलियत

Last Updated- December 11, 2022 | 1:26 PM IST

छत्तीसगढ़ विधानसभा के एक सदस्य ने हाल में मुझे फोन करके सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) के बेरोजगारी के आंकड़ों पर स्पष्टीकरण मांगा। उन्होंने कहा कि उनकी नजर में राज्य में बेरोजगारी की जमीनी स्थिति और सीएमआईई के आंकड़े विरोधाभासी दिखाई देते हैं।
सीएमआईई के कंज्यूमर पिरामिड हाउस होल्ड सर्वेक्षण (सीपीएचएस) के आंकड़ों के अनुसार छत्तीसगढ़ में बेरोजगारी की दर आधा फीसदी से भी कम है। लेकिन विधायक चंद सरकारी नौकरियों के लिए सैकड़ों व हजारों लोगों को आवेदन करते हुए देखते हैं। इसके बाद विधायक ने तर्क पेश किया कि इतने लोगों का आवेदन करना बेरोजगारी का सूचक है। लेकिन सीएमआईई के अनुसार छत्तीसगढ़ में बेरोजगारी की दर नगण्य थी। उन्होंने आश्चर्य जताया कि कैसे दोनों तथ्य सही हो सकते हैं।
मीडिया ने 16 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा आयोग की प्राथमिक योग्यता परीक्षा के दौरान रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड पर अभ्यर्थियों की भीड़ की तस्वीरें छापकर फिर यही सवाल उजागर किया। राज्य में करीब 38 लाख आवेदक परीक्षा के लिए एक-जगह से दूसरी जगह गए क्योंकि कानून आवेदक को उसके निवास स्थान पर परीक्षा की अनुमति नहीं देता है।
इससे राज्य में कई जगह विचित्र स्थिति पैदा हो गई। साथ ही उम्मीद से परे युवा भारत की सरकारी नौकरी प्राप्त करने की चिंताजनक तस्वीर पेश हुई। इस परीक्षा से नौकरी नहीं मिलती है बल्कि इसमें आवेदक आवश्यक अंक प्राप्त करने के बाद राज्य की ग्रुप सी की नौकरी के लिए आवेदन करने के योग्य हो जाता है। 
हालांकि सीएमआईई के आंकड़ों के अनुसार छत्तीसगढ़ की तरह उत्तर प्रदेश में भी बेरोजगारी की दर काफी कम है। उत्तर प्रदेश में बेरोजगारी की दर 3-4 फीसदी है जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 7-8 फीसदी है। लिहाजा अब इस पहेली को कैसे हल किया जाए? पहला स्पष्टीकरण यह है कि सरकारी नौकरियों के लिए केवल बेरोजगार आवेदन नहीं करते हैं। अगर कोई व्यक्ति गैर-सरकारी नौकरी कर रहा है तो भी उसकी चाहत सरकारी नौकरी की होती है।
इसके दो कारण हैं। पहली बात यह है कि ज्यादातर निजी क्षेत्र की नौकरियों में असंगठित क्षेत्र के अंतर्गत अनौपचारिक रोजगार होता है और नियोक्ता न तो अच्छा वेतन देता है और न ही सरकारी नौकरी की तरह सुरक्षा मिलती है। दूसरा, निजी क्षेत्र की नौकरियों को सुरक्षित नौकरियां नहीं माना जाता है। निजी क्षेत्र में यह खतरा होता है कि नौकरी से आसानी से निकाल दिया जाएगा। लिहाजा निजी नौकरी में काम करने वाला व्यक्ति भी मौका रहने पर सरकारी नौकरी के लिए प्रयास करता है।
दूसरी बात यह है कि ऐसे में कोई महिला न ही तो सक्रिय रूप से नौकरी ढूंढ़ रही हो और न ही साक्षात्कार के दौरान काम करने की इच्छुक हो। लिहाजा वह महिला कह सकती है कि वह श्रम बल का हिस्सा नहीं है। ऐसे में महिला उम्र कम रहने तक ही कुछ साल के लिए सरकारी नौकरी के लिए आवेदन कर सकती है। यदि उसे सरकारी नौकरी मिल जाती है, तब ही वह नौकरी करेगी। ऐसा भी संभव है कि कई आवेदक अभी भी छात्र हों।
हमें सीएमआईई के कंज्यूमर प्राइस हाउस होल्ड सर्वे (सीपीएचएस) यह अनुमान मुहैया कराता है कि कितने छात्र काम करने के इच्छुक हैं और सक्रिय रूप से रोजगार ढूंढ़ रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में तीन चौथाई बेरोजगार वो हैं जिन्होंने अपने को छात्र घोषित कर रखा है। रोचक तथ्य यह है कि खास अवधि के श्रम बल सर्वेक्षण (पीएसएफएस) सिस्टम में व्यक्ति विशेष को एक साथ छात्र और बेरोजगार व्यक्ति के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है। लेकिन सीएमआईई का सीपीएचएस यह दर्शाता है कि छात्र की भी सक्रिय रूप से नौकरी ढूंढ़ने की संभावना है। हालांक पीएसएफएस इस तर्क को नहीं स्वीकारता है।
हालांकि भारत के श्रम बल में एक अन्य नजरिया यह भी है कि कई लोग तभी नौकरी करेंगे जब उन्हें सरकारी नौकरी मिलेगी, वरना वे काम नहीं करेंगे। ऐसे लोग सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन करते हैं लेकिन अपने को श्रम बल से बाहर घोषित करते हैं।
उत्तर प्रदेश में प्राथमिक योग्यता परीक्षा के 38 लाख आवेदकों और राज्य में बेरोजगार की संख्या की तुलना करते हैं। सीएमआईई के सीपीएचएस के मुताबिक जनवरी – अगस्त, 2022 में राज्य में केवल 19 लाख बेरोजगार थे। लेकिन इस योग्यता परीक्षा के लिए दोगुना अधिक लोगों ने आवेदन किया।
पीएलएफएस के आधिकारिक आंकड़े के मुताबिक उत्तर प्रदेश में बेरोजगार अधिक थे। पीएलएफएस के मुताबिक उत्तर प्रदेश में 2020-21 (जुलाई, 2020 से जून, 2021 तक) बेरोजगारी की दर 4.2 फीसदी थी जो इसी अवधि में सीपीएचएस की प्रस्तावित दर 5.8 फीसदी से कम थी।
पीएलएफएस के अनुमान के अनुसार श्रम बल की सहभागिता दर (एलपीआर) 50.1 फीसदी थी। हालांकि सीपीएचएस की दर 35.8 फीसदी थी। लिहाजा पीएलएफएस की दर अधिक थी। अनुमानित जनसंख्या 12.53 करोड़ में 50.1 फीसदी एलपीआर होने पर श्रम बल 6.28 करोड़ होगी। इस श्रम बल में बेरोजगारी की दर 4.2 फीसदी होने पर करीब 26 लाख लोग बेरोजगार होंगे। ऐसे में भी बेरोजगारों की संख्या उत्तर प्रदेश प्राथमिक योग्यता परीक्षा के 38 लाख आवेदकों से कम ही होगी।
उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरियों के प्रति असाधारण चाहत है। इस चाहत को ऐसे भी समझाया जा सकता है कि राज्य में तुलनात्मक रूप से कम वेतन मिलता है। जनवरी से अगस्त, 2022 के दौरान केवल 14 फीसदी ही वेतनभोगी कर्मचारी थे। राज्य में दो तिहाई रोजगार में किसान या दिहाड़ी मजदूर थे।
बाकी लोगों को व्यापार के क्षेत्र में रोजगार प्राप्त था। अखिल भारतीय स्तर पर नौकरी पेशा कर्मचारियों के रोजगार की दर करीब 21 फीसदी थी। उत्तर प्रदेश में नौकरी पेशा नौकरियां कम थीं। इसलिए राज्य में सरकारी नौकरियों की ओर लोगों की अधिक चाहत है।
ऐसे में जो तस्वीर उभर कर आई है, उसे हजार शब्दों से अधिक में नहीं समझाया जा सकता है। यह कहानी बयां करती है कि उत्तर प्रदेश के लाखों लोग चंद नौकरी को पाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा देते हैं। ऐसे में सीपीएचएस या पीएलएफएस के आंकड़े से ज्यादा नौकरी पाने की ऐसी चाहत दिखाई देती है।
सीपीएचएस के मुताबिक उत्तर प्रदेश में 19 लाख बेरोजगार हैं। हालांकि पीएलएफएस के मुताबिक बेरोजगार 26 लाख हैं। हालांकि मीडिया में छपी तस्वीरें हमें अच्छी गुणवत्ता वाली नौकरी पाने वाले 38 लाख आवेदकों की स्थिति बयां करती है। लिहाजा हमारे समक्ष हाउस होल्ड सर्वे के जो आंकड़े उजागर होते हैं, उसके मुकाबले रोजगार की वास्तविकता और भी भयावह है। यह छत्तीसगढ़ के साथ- साथ उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के मामले में सही साबित होता है। 
(लेखक सीएमआईई प्रा. लि. के प्रबंध निदेशक और सीईओ हैं)

First Published - October 20, 2022 | 10:38 PM IST

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