मुल्क की बेहद मशहूर सोशल साइंस पत्रिका इकोनॉमिक एंड पोलिटीकल वीकली को अब मुंबई में नई जगह मिल गई है।
ईपीडब्ल्यू नाम से मशहूर पत्रिका का नया दफ्तर लोअर परेल में खुला है। पहले इसका दफ्तर लगभग 40 वर्षों से सेंट्रल मुंबई में चल रहा था। ईपीडब्ल्यू के संपादक सी. राममनोहर रेड्डी का कहना है, ‘आखिरकार हमें जगह मिल ही गई।’ यह जगह समीक्षा ट्रस्ट ने खरीदी है। समीक्षा ट्रस्ट एक रजिस्टर्ड सहायतार्थ संगठन है जो पत्रिका का प्रकाशन करता है।
ईपीडब्ल्यू ने अपना नया दफ्तर इन फंड की बदौलत ही पा सकी है। वर्ष 2004 में इस पत्रिका के संपादक बने रेड्डी का कहना है कि इस ट्रस्ट के साथ मिलकर हमने अपने फंड की राशि को बढ़ाना शुरू किया। वर्ष 2006 में इस फंड की राशि 2 करोड़ रुपये थी। रेड्डी का कहना है, ‘इस रकम में कुछ दिनों से इजाफा नहीं हो पा रहा था इस कारण हम अपना लक्ष्य पूरा नहीं कर पा रहे थे।’ वर्ष 2006 में उन्होंने लगभग चार सालों में 2 करोड़ से 15 करोड़ का इजाफा करने की घोषणा की।
आज समीक्षा के पास नए दफ्तर के अलावा 8 करोड़ की राशि भी है। इस फंड में टाटा ट्रस्ट का भी कुछ हिस्सा है। रेड्डी का कहना है, ‘इस ट्रस्ट ने हमारे कुछ खास कामों के लिए सहायता राशि मुहैया कराई। जिन कामों में हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर के साथ ही ईपीडब्ल्यू के आर्काइव को डिजीटल रूप देना शामिल है।’ राशि में बढ़ोतरी की वजह से आमदनी में भी इजाफा हुआ है। इसका इस्तेमाल भी संपादकीय टीम में और स्टाफ जोड़ने, वेतन में बढ़ोतरी और मैगजीन के लिए बढ़िया कागज खरीदने में किया जाएगा।
रेड्डी का कहना है, ‘हम अपनी रिटेल बिक्री और मैगजीन खरीदने वाले ग्राहकों की तादाद बढ़ाना चाहते हैं। इसका सर्कुलेशन फिलहाल 11,500 है जिसे बढ़ाकर 15,000 तक करने का लक्ष्य है। इसके लिए हमें बाहरी मार्केटिंग एजेंसी की मदद भी लेनी पड़ सकती है।’ रेड्डी का कहना है कि हमें उम्मीद है कि मैगजीन का पेड सर्कुलेशन पिछले एक साल में 10,000 से बढ़कर 11,500 हो गया। इससे यह साफ है कि 1966 में सचिन चौधरी के द्वारा निकाली गई मैगजीन का जादू अब भी बरकरार है।
पहली बार यह मैगजीन 1949 में इकोनॉमिक वीकली के रूप में प्रकाशित हुई और 1966 में इकोनॉमिक एंड पोलीटिकल वीकली के नाम से छपने लगी। ईपीडब्ल्यू देश के नीति निर्माताओं, शोर्धकत्ताओं और अकादमिक जगत के विद्वानों के बीच काफी मशहूर रही है। जब यह जर्नल 1949 में लॉन्च हुआ था, उस वक्त देश की आजादी के लिए काम करने वाले विचारक भी इससे जुड़ गए थे और उनका योगदान भी इसमें था। उन समाजवादियों में अशोक मेहता, जे. सी. कुमारप्पा और अमर्त्य सेन जैसे युवा अर्थशास्त्री भी जुड़ गए थे। यह मैगजीन अपनी बेहतर संपादकीय के लिए जानी जाती है जो अपनी सामाजिक चेतना के लिए भी काफी मशहूर थी।