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भू-अधिग्रहण मामलों में आज भी ‘सरकार राज’

Last Updated- December 07, 2022 | 5:41 PM IST

देश इस बात की खुशी मना रहा है कि उसे राजे-रजवाड़ों और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन से मुक्ति मिल गई, लेकिन नए भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास कानून में उसकी यादें अभी भी जिंदा हैं।


यह लोकतांत्रिक सरकार और उसकी प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करता है। कानून के मसौदे में यह प्रावधान है कि अगर सरकार किसी जमीन का अधिग्रहण करती है, तो उसका मुआवजा दिया जाएगा, उनके बारे में यह कानून कुछ भी नहीं कहता जो उद्योग के लिए जमीन बेचते हैं। अब कंपनियों को जमीन दिलाने में सरकार की भूमिका होगी।

मसौदे के मुताबिक सरकार कुल जमीन का 30 प्रतिशत अधिग्रहण करेगी। यह विधेयक जल्द ही कानूनी शक्ल अख्तियार कर लेगा। सरकार उनकी मदद करेगी, जो जमीन खरीदना चाहते हैं, न कि बेचने वालों की। और सरकार किस तरह से मदद करती है। हाल ही में दो कंपनियों के पक्ष में फैसला आया, जो उड़ीसा में खनन कार्य करना चाहती हैं।

एक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्टरलाइट से कहा कि वे उड़ीसा के कालाहांडी जिले के नियामगिरि इलाके में रहने वाले लोगों को सालाना के हिसाब से 10 करोड़ रुपये मुआवजे का भुगतान करें। क्या इस पैसे से यह तय होता है कि नदियों का जल नहीं सूखेगा और पहाड़ियों की गुणवत्ता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा?

दूसरे मामले में जहां पोस्को ने आवेदन किया था और उड़ीसा सरकार ने वहां के लोगों के खिलाफ याचिका दायर की थी, जो लोग विस्थापित होंगे। न्यायालय ने खनन जारी रखने का आदेश दिया। वहां तीन ग्राम पंचायतें हैं जिनकी जमीनें ली गई हैं। नुआगांव और गडकूजंग गांव में पुलिस और कंपनी के समर्थकों ने स्थानीय लोगों को शांत कर दिया है और अब धिनकिया पंचायत के लोग अलग-थलग पड़ गए हैं।

कंपनी ने परोक्ष रूप से कहा कि वह धिनकिया को छोड़कर बाकी जगहों पर काम करेगी। यह एक युध्द के समान है। वास्तव में इस मामले में नया मोड़ तब आया जब एक अमेरिकी अध्यापक डेविड पग को पिछले 12 अगस्त को एक भारतीय दुभाषिए के साथ जगतसिंहपुर के माओवादियों से जुड़े होने के आरोप में  गिरफ्तार कर लिया गया। वहां पर पोस्को विरोधी आंदोलन चल रहा था।

एक तीसरी कंपनी आर्सेलर मित्तल ने गांव वालों के साथ बातचीत करनी शुरू कर दी है, जो वहां जमीन खरीदना चाहती है। यह पूरी तरह से सही तरीका है। ग्रामसभा की बैठक बुलाई गई और गांव वालों को अपनी राय रखने के लिए कहा गया, कि वे अपनी जमीन बेचना चाहते हैं या नहीं। क्योंझर जिले के भ्रुंगराजपोसी ग्राम सभा के लोगों ने जमीन बेचने के लिए पहले ही सहमति दे दी।

लेकिन सरकार की इन ग्रामसभाओं में क्या भूमिका रही? कंपनी के मुताबिक भ्रुंगराजपोसी ग्रामसभा में बैठक के दौरान जिलाधिकारी मौजूद रहे और पुलिस ने चारों ओर से घेरा बना रखा था। इससे यही लगता है कि गांव के अशिक्षित और भोले भाले लोग आज भी सरकार की दया पर निर्भर हैं।

जून 1919 में जब अंग्रेजों का शासन था, महाराष्ट्र के पुणे के समीप मुलसी के किसानों को एक नोटिस मिली। इसमें टाटा के लिए 6 प्राइवेट बांध बनाने के लिए उनकी जमीन के अधिग्रहण की बात कही गई थी। सेनापति बापट के नेतृत्व में चले सत्याग्रह आंदोलन को दबा दिया गया औह टाटा ने 500 रुपये प्रति एकड़ की दर से जमीन खरीद ली। वहां के लोग विस्थापित हो गए और आज भी राहत का इंतजार कर रहे हैं।

दिल्ली के निकट ग्रेटर नोएडा के 5 किसानों को अपनी जान गंवानी पड़ी। उन्होंने तीन साल पहले सरकार को जमीन बेची थी। उनका कहना है कि मुआवजे के रूप में उन्हें बहुत कम पैसा मिला। एक तरफ तो कंपनियों के शेयर आसमान छू रहे हैं, वहीं जमीनों के दाम आसमान छूने से गरीबों की जमापूंजी घटती जा रही है। 

लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता और नॉर्थ ईस्टर्न सोशल रिसर्च सेंटर के डॉयरेक्टर वाल्टर फर्नांडीज ने यह आंकड़ा पेश किया है कि अब तक विभिन्न सरकारी परियोजनाओं के क्रियान्वयन में 5-6 लाख लोग विस्थापित हुए हैं, जिनमें से 25 प्रतिशत आदिवासी इलाकों के हैं।

उद्योग जगत जिन लोगों की जमीन माटी के मोल खरीद रही है, उनको आमदनी में से एक ढेला भी देने का इच्छुक नहीं है।  इन सौदों में भेदभाव का पता इसी से चलता है कि जमीन की कीमत दिनोंदिन आसमान छू रही हैं। इसका सीधा लाभ कंपनियों को मिलता है। बेचने वाले को तो पैसा एक बार ही मिलता है।

मित्तल स्टील के वाइस प्रेसीडेंट रेमी बॉयर ने कुछ महीने पहले इस समाचार पत्र को दिए गए साक्षात्कार में कहा था कि ‘जमीन बेचने वाले लोगों को शेयर दिए जाने की बात करना हास्यास्पद है’। इसका कारण यह है कि ये लोग अशिक्षित हैं और उन्हें नहीं पता है कि शेयरों का इस्तेमाल किस तरह से किया जाना चाहिए।

लेकिन क्या यही कारण है, जिसके चलते सरकार या कंपनी को लाभ में से हिस्सा नहीं देना चाहिए? इस तरह के शेयर दिए जाने की बात करना उस समय सोच से परे की बात थी जब 1919 में ब्रिटिश सरकार ने टाटा पॉवर प्लांट के लिए भूमि अधिग्रहण किया था। लेकिन क्या स्वतंत्र भारत में भी स्थितियां उसी तरह की बनी रहनी चाहिए?

और एक शताब्दी के बाद सरकार उद्योगों के लिए जमीन खरीदने की योजना बना रही है और जिन लोगों को जमीनें बेचने के लिए मजबूर किया जा रहा है, उन्हें कोई हिस्सेदारी नहीं मिल रही है। क्या यह नियम कंपनियों के लिए हैं या उनके लिए जिन्हें विस्थापित किया जाना है?

उन लोगों के खिलाफ तेजी से कार्रवाई की जा रही है, जिन्होंने विस्थापितों के हित में आवाज उठाई है। उन्हें माओवादी कहा जा रहा है। चाहे वह छत्तीसगढ़ के विनायक सेन हों, या अब उड़ीसा के डेविड पग। अब उनके लिए स्वतंत्रता दिवस के कोई मायने नहीं हैं, जिनके पास जश्न मनाने के लिए कुछ भी नहीं है और वे अपना सब कुछ खो चुके हैं। चाहे वह मायावती की सरकार हो या मुलायम की या छत्तीसगढ़, उड़ीसा की या केरल की कम्युनिस्ट सरकार। सभी सरकारें जमीनों के अधिग्रहण का विरोध करने वाले लोगों को दबाने में लगी हैं।

First Published - August 19, 2008 | 12:47 AM IST

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