तेल की कीमतें पिछले एक साल में ही दोगुनी क्यों हो गई हैं? आखिर क्या वजह है इसकी?
सट्टेबाजी का खेल
कारोबारी वायदा के जरिये आने वाले वक्त में तेल की कीमतों पर सट्टा लगाते हैं। यदि कोई प्राकृतिक आपदा आती है और देश में सत्ता शीर्ष पर बैठे व्यक्ति या फिर दुनिया की किसी बड़ी तेल कंपनी के मुखिया का कोई बयान आता है तो सट्टेबाज कीमतों पर ज्यादा सट्टा लगाना शुरू कर देते हैं।
न्यू यॉर्क मर्केंटाइल एक्सचेंज में जुलाई अनुबंध के लिए कच्चे तेल की कीमतों ने इसी वजह से रेकॉर्ड 140 डॉलर प्रति बैरल तक की छलांग लगा दी।
भू-राजनीतिक समस्या, आपूर्ति में किल्लत युद्ध, आतंकवादियों का हमला, तेल के मामले में समृद्ध देशों में सैन्य उठापकठक से तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई है। अमेरिका का लीबिया में हस्तक्षेप, ईरान को बार-बार धमकाना और इराक पर हमले ने तेल की आपूर्ति में बाधा डाली है। वहीं दूसरी ओर भारत, चीन और पश्चिम एशिया में तेल की मांग में तेजी आई है। अब जबकि आपूर्ति उतनी ही है और मांग बढ़ती जा रही है तो कीमतें तो बढ़ेंगी ही।
उत्पादन पर ओपेक का नियंत्रण
तेल निर्यात करने वाले देशों के संगठन ओपेक के सदस्य देशों के पास दुनिया के तेल भंडार का दो तिहाई हिस्सा है और इन देशों की दुनिया के कुल तेल उत्पादन में 40 फीसदी की हिस्सेदारी है। ओपेक नहीं चाहता कि तेल का उत्पादन बिलकुल भी बढ़ाया जाए। सीधी सी वजह है कि यदि उत्पादन बढ़ा तो आपूर्ति भी बढ़ जाएगी। नतीजतन तेल की कीमतें गिर जाएंगी जो सीधे इन देशों की कमाई पर असर डालेंगी। इसलिए उन्हें तेल के ज्यादा दाम ही सुहाते हैं।
डॉलर पर मार
इसके अलावा दूसरे देशों की मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की कीमत में आई गिरावट भी तेल की कीमतों को बढ़ा रही है क्योंकि तेल का अंतरराष्ट्रीय कारोबार डॉलर में ही होता है।
आंकड़ों की बाजीगरी
अमेरिका में बिना सब्सिडी के ही पेट्रोल 44.5 रुपये प्रति लीटर में मिलता है जबकि दिल्ली में सब्सिडी के बावजूद पेट्रोल 5.5 रुपये प्रति लीटर महंगा मिलता है। इससे पता चलता है कि भारत में पेट्रोलियम पदार्थों पर कितना अधिक कर लगता है।
वेनेजुएला में केवल 2 रुपये प्रति लीटर की दर से पेट्रोल मिलता है। वेनेजुएला प्रमुख तेल उत्पादक देशों में से एक है और यहां तेल पर भारी सब्सिडी दी जा रही है। अगर सारे कर खत्म कर दिए जाएं तो दिल्ली में पेट्रोल 24 रुपये प्रति लीटर और डीजल 23 रुपये प्रति लीटर में मिलना शुरू हो जाएगा।
क्या हैं दूसरे विकल्प?
हम भारत की बात करें तो यह उन देशों में है जहां प्राकृतिक गैस का बड़े पैमाने पर उपयोग शुरू हुआ है। पहले तेल के साथ जो गैस निकलती थी, वह ऐसे ही जाया हो जाती थी। अब दुनिया भर की सरकारें अपनी अर्थव्यवस्था में दम भरने के लिए बड़े-बड़े गैस भंडारों की खोज में जुटी हैं,तेल कंपनियां भी इसमें पीछे नहीं हैं।
इसके अलावा अमेरिका के साथ प्रस्तावित परमाणु करार से भी कुछ उम्मीदें हैं।
कई कंपनियां पवन ऊर्जा के विकास में जुटी हैं। इनमें भारत की सुजलोन एनर्जी भी शामिल है। यह कंपनी महाराष्ट्र में पुणे के पास धुले में एशिया का सबसे बड़ा पवन ऊर्जा पार्क विकसित कर रही है।
रिलायंस जैसी कंपनियां सौर ऊर्जा के विकास में जुटी हैं। रिलायंस पश्चिम बंगाल में 10 मेगावॉट की क्षमता वाला सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित कर रही है। इसके अलावा कंपनी महाराष्ट्र में एक गांव भी गोद लेना चाहती है जहां सूर्य की रोशनी को ऊर्जा में तब्दील करने का काम किया जा सके।
टाटा और रिलायंस की योजना कोयले से तेल बनाने की भी है। वैसे यह तकनीक अभी एकदम शुरुआती स्तर पर है। गौरतलब है कि भारत उन देशों में से है जहां कोयले का काफी बड़ा भंडार है।
भारत में कई जगहों पर समुद्र के किनारे से गैस का दोहन भी किया जा रहा है, इसको गैस हाइड्रेट कहते हैं।
इस तकनीक का अभी विकास ही किया जा रहा है। भारत के अलावा इस तकनीक का परीक्षण केवल अमेरिका और जापान में किया जा रहा है। ऐसा समझा जा रहा है कि इन चट्टानों में मौजूद प्राकृतिक गैस का भंडार दुनिया के कुल गैस के भंडारों से कई गुना अधिक है।
भारत के लिए परेशानी की बात क्या है
कितनी खपत है भारत में
भारत में 30.1 लाख प्रति बैरल कच्चे तेल की जरूरत होती है।
लगभग 25.8 लाख प्रति बैरल पेट्रोलियम उत्पादों की जरूरत होती है।
उत्पादन कितना होता है
प्रतिदिन 700,000 बैरल कच्चे तेल का उत्पादन होता है। कच्चे तेल की मांग में 7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो रही है जबकि आयात में 9 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। कीमतों में इजाफा होने से आयात बिल में भी तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। इससे सरकारी खजाने पर भी खासा असर पड़ सकता है।
आप इसकी वजह जानते हैं
क्या तेल की कीमतें जल्द ही होंगी कम?
अगर आप इन बातों पर यकीन करते हैं तो आप सपनों की दुनिया में जीते हैं।
रुस की कंपनी गैजप्रॉम यूरोप की एक चौथाई गैस की जरूरतों को पूरा करती है। इस कंपनी का अनुमान है कि तेल की कीमतें पहले से ही 135 डॉलर प्रति बैरल हैं लेकिन वर्ष 2009 तक तेल की कीमत 250 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाएंगी।
गोल्डमैन सैक्स का कहना है कि 2009 के अंत तक तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल हो जाएंगी।
मॉगर्न स्टैनली का कहना है कि अगले तीन हफ्ते में ही तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल हो जाएंगी।
हमारे देश के ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन का कहना है कि तेल की कीमतें कम तो नहीं हो सकती, हां ये बढ़ जरूर सकती हैं। ऐसे में मुमकिन है कि आप आपको गैस स्टेशन पर ज्यादा पैसे खर्च करने की आदत डालनी पड़े।
गोल्डमैन सैक्स की बात सही हो तो:
भारत में क्या है उपाय…
भारत में पेट्रोल और डीजल की सब्सिडी को खत्म कर दी जाए तो उनकी कीमत 100 रुपये प्रति लीटर हो सकती है।
संभव है कि 8 प्रतिशत की विकास दर कम हो जाए।
मुद्रास्फीति की दर 16 प्रतिशत तक बढ़ सकती है।
अगर तेल की कीमतें कम रहीं तो भारत की सभी तेल कंपनियों की हालत खस्ता हो जाएगी।
विश्व अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ सकती है।
कुछ और रोचक तथ्य
चीन, रुस, भारत और पश्चिम एशिया में प्रति दिन 2 करोड़ 6.7 लाख बैरल तेल की मांग है।
अमेरिका में प्रतिदिन तेल की मांग हैं 2करोड़ 3.8 लाख प्रति बैरल।
चीन में प्रतिदिन 78.9 लाख प्रति बैरल तेल की खपत है।
चीन और भारत में लगभग 2.45 अरब लोग तेल का इस्तेमाल करते हैं वहीं अमेरिका में महज 30 करोड़ 10 लाख लोग ही तेल की खपत करते हैं।
भारत में अमेरिका के मुकाबले प्रति व्यक्ति 10 प्रतिशत कम ऊर्जा का उपयोग होता है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के मुताबिक
वर्ष 2030 तक पूरी दुनिया में आज के मुकाबले ऊर्जा की जरूरतें 50 प्रतिशत बढ़ जाएंगीं।
पूरी दुनिया में ऊर्जा की बढ़ती मांग में 45 प्रतिशत हिस्सा चीन और भारत का है।
कुछ खास उपाय
आप इन्हें एक नया रास्ता भी कह सकते हैं
हमारे देश का दक्षिणी रेलवे ट्रेन को चलाने के लिए खाद्य तेलों का बखूबी इस्तेमाल कर रहा है। रेलवे चेन्नई और बेंगलुरु के रेस्तरां और होटल से इस्तेमाल किए हुए तेल को इकट्ठा करता है और उसे प्रसंस्कृत करता है। यह योजना अभी टेस्ट के आधार पर चल रही है।
कुछ कंपनियां मसलन सीमेंट बनाने वाली कंपनी एसीसी अब इस्तेमाल किए गए शैंपू का उपयोग ईंधन बनाने के लिए करना चाहती है। कंपनी इसके लिए परीक्षण प्रक्रिया पर काम कर रही है। इसके जरिए कंपनी की ऊर्जा जरूरतों का बेहद छोटा हिस्सा ही पूरा किया जा सकता है।