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तेल का महंगा खेल

Last Updated- December 07, 2022 | 3:43 AM IST

घाटे के बोझ से दिनोंदिन सरकारी तेल कंपनियों की टूटती कमर को बुधवार के फैसले से काफी राहत मिलेगी।


आलम यह था कि उनके पास कच्चे तेल खरीदने के लिए भी पैसे खत्म हो रहे थे। ये कंपनियां उम्मीद कर रही हैं कि अगले नौ महीनों में कीमतों में हुए इस इजाफे से उन्हें 21 हजार करोड़ रुपये की कमाई होगी।

दूसरी तरफ, उत्पाद कर और सीमा शुल्कों में दी गई छूट से उपभोक्ताओं को भी 21 हजार करोड़ रुपये की राहत मिलेगी। चूंकि, पेट्रोल. डीजल और एलपीजी की कीमतों में हुए 10 फीसदी इजाफे का वामदल काफी विरोध कर रहे थे, इसलिए सरकार के इस फैसले की और भी तारीफ करनी चाहिए।

वामपंथियों का कहना था कि सरकार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का बोझ आम लोगों पर डालने के बजाए तेल क्षेत्र के जरिये हुई 1,64,000 करोड़ रुपये की कमाई का इस्तेमाल करना चाहिए। हालांकि उनके इस बयान तो तथ्यों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना ही कहेंगे। असल में केंद्र ने सीमा शुल्क और उत्पाद करों के जरिये तेल सेक्टर से केवल 78000 करोड़ रुपये की कमाई की थी। बाकी तो राज्य सरकारों ने वैट के जरिये वसूली थी।

दूसरी तरफ सच कहें तो यह पूरी रकम भी पिछले साल की कमाई से केवल 6500 करोड़ रुपये ही ज्यादा थी। इसलिए इस बात की उम्मीद कम ही थी कि तेल की चढ़ती कीमत से सरकार को कोई मोटा मुनाफा होगा। साफ है कि इस कदम से तेल कंपनियों को काफी राहत मिलेगी। लेकिन उनके लिए चैन की बांसुरी बजाने का वक्त अभी नहीं आया है।

कुछ ही दिनों पहले ही ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ में बताया गया था कि पिछले महीने के पहले पखवाड़े में एक लीटर पेट्रोल पर सरकारी कंपनियों को कम से कम 16.3 रुपये का घाटा उठाना पड़ता था। इस महीने के आते-आते यही घाटा बढ़कर 21.4 रुपये प्रति लीटर हो गया था। इसे देखते हुए पेट्रोल की कीमतों को 5 रुपये से बढ़ाना एक बड़ा कदम माना जा सकता है, लेकिन इससे भी बात फिर वही आ जाएगी कि सरकार को अब भी 16 रुपये का नुकसान सहना पड़ रहा है।

मई के पहले पखवाड़े में एक लीटर डीजल को बेचने पर सरकार को 23.5 रुपये का घाटा उठाना पड़ता था, जबकि जून की शुरुआत तक यह रकम 31.6 रुपये तक पहुंच चुकी थी। इसकी कीमत में तीन रुपये का इजाफा ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर होगा। दूसरी तरफ, केरोसीन तेल के मामले में तो 36 रुपये प्रति लीटर के घाटे को पाटने की कोई कोशिश नहीं की जा रही।

वहीं कीमत बढ़ाने के बावजूद एलपीजी के एक सिलेंडर पर अब भी सरकार को 300 रुपये का जबरदस्त घाटा उठाना पड़ रहा है। सवाल उठता है कि क्या इस इजाफे से तेल कंपनियों को कोई फायदा होगा? इसका एक ही जवाब है, नहीं। ओएनजीसी  पर इस साल 45000 करोड़ रुपये का मोटा-ताजा बोझ पड़ेगा, जबकि आईओसी को भी 20 हजार करोड़ रुपये का जबरदस्त घाटा सहना पड़ सकता है। दूसरी तरफ, 95 हजार करोड़ रुपये के तेल बॉन्ड जारी करने से भी देसी अर्थव्यवस्था पर भी बुरा असर पड़ेगा।

First Published - June 5, 2008 | 1:29 AM IST

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