दिन पर दिन वैश्विक आर्थिक हालात बिगड़ते ही चले जा रहे हैं। पिछले साल के आखिर में लोगों ने यह अनुमान लगाना शुरू कर दिया था कि वर्ष 2008 में अमेरिका मंदी की ओर रुख कर रहा है।
इसके परिणाम दूसरे देशों को भी भुगतने पड़ेंगे, इतना तो तय था। इसी खतरे को भांपते हुए और इससे कुछ हद तक बचने की कोशिश में अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने बेंचमार्क दरों में कटौती करना शुरू कर दिया। इसके साथ जुड़ा, कर में कटौती और अमेरिकी सरकार की ओर से आय में सहयोग का सिलसिला।
इन्हीं कोशिशों का नतीजा है कि पहली तिमाही में अमेरिकी अर्थव्यवस्था में थोड़ा सुधार देखने को मिला है, यह अलग बात है कि सुधार की प्रक्रिया धीमी गति से बढ़ रही है। इधर अगर एशियाई क्षेत्र की बात करें तो भले ही महंगाई के राक्षस ने सिर उठाया है, पर बावजूद इसके पहली तिमाही में एशियाई देशों ने विकास दर को बनाए रखा है। वहीं दूसरी ओर सबप्राइम संकट ने वित्तीय कंपनियों के बैलेंस शीट का ग्राफ इस कदर बिगाड़ कर रख दिया कि वह अब तक नुकसान से बाहर नहीं निकल पाई हैं।
जैसे ही लगने लगा था कि हालात कुछ हद तक पटरी पर आने लगे हैं तभी एक जोरदार झटका और लगा। अमेरिका की दो सबसे बड़ी मार्गेज गारंटी कंपनियों फैनी मे और फ्रैडी मैक ने खुद को खस्ताहाल घोषित कर दिया। हालांकि इसे झटका कहना शायद सही नहीं होगा, क्योंकि इन दोनों कंपनियों के पोर्टफोलियो पर नजर दौड़ाएं तो पता चलता है कि ये मुख्यत: होम लोन के क्षेत्र में कारोबार करती हैं और पिछले कुछ समय में इस क्षेत्र की हालत खस्ता रही है।
इस संकट के शुरू होने के एक साल बाद कुछ लोगों को लगने लगा था कि धीरे धीरे अब इस समस्या से छुटकारा मिलने लगेगा लेकिन तभी उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया, जब पता चला कि नार्दन रॉक और बेयर स्टन्र्स की हालत भी पतली हो चुकी है। भले ही इस साल के प्रारंभ में विकास का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर रहा है पर इससे यह नहीं कहा जा सकता कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अंधकार वाले दिन बीत चुके हैं। हालांकि आईएमएफ ने अपने हालिया वैश्विक परिदृश्य में कहा है कि उसे नहीं लगता कि आने वाले समय में हालात इतने बुरे रहेंगे जितने पिछले दिनों रहे हैं।
आईएमएफ का मानना है कि 2008 के दौरान वैश्विक अर्थव्यवस्था 4.1 फीसदी की दर से बढ़ेगी, हालांकि पिछले साल इसमें पांच फीसदी की दर से विकास हुआ था। वहीं 2009 के लिए यह अनुमान और कम है करीब 3.9 फीसदी का। विकास पर खतरा उतना अधिक नहीं है, पर कमोडिटीज और ऊर्जा संसाधनों की तेजी से बढ़ती कीमतें निश्चित तौर पर खतरे की घंटी है। बैंक ऑफ इंटरनेशनल सेटलमेंट्स ने अपनी हालिया जारी सालाना रिपोर्ट में वित्तीय संकट को लेकर फिक्रमंदी जताई है।
उसका कहना है कि वर्तमान समस्या की एक बड़ी वजह बाजार में अत्यधिक तरलता का होना है और इससे निपटने के लिए केंद्रीय बैंकों को सतर्क रहने की जरूरत है। अमेरिकी और ब्रिटेन में खस्ताहाल वित्तीय संस्थानों को सरकार की ओर से मदद दी गई है। इसका एक नुकसान तो निश्चित तौर पर यह रहा है कि ऐसे संस्थानों को अब जोखिम लेने से डर नहीं लगेगा। भले ही आईएमएफ का अनुमान सही हो या नहीं, पर इस संकट से निपटने के लिए सोच समझकर कदम उठाने पड़ेंगे, इतना तो तय है।