भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने एक महत्त्वपूर्ण चर्चा पत्र जारी किया है जिसमें सभी प्रकार की डिजिटल भुगतान प्रणालियों की व्यापक समीक्षा की गई है और इनमें से प्रत्येक में शुल्क लगाने की प्रक्रिया को रेखांकित किया गया है। बैंक ने आगामी 3 अक्टूबर तक नीति और शुल्क में संभावित बदलाव को लेकर प्रतिपुष्टि भी मांगी है। इस प्रतिपुष्टि यानी फीडबैक पर आधारित नीति डिजिटल भुगतान प्रणाली के भविष्य के लिए अहम होगी।
एक सुरक्षित, किफायती और सक्षम प्रणाली विकसित करने के लिए इस नीति का सही होना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि तभी डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा मिल सकेगा। केवल डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देकर ही नवाचारी, पारस्परिकता वाली और समावेशी भुगतान व्यवस्थाओं का विकास हो पाएगा। ऐसा करने से ही भुगतान के बुनियादी ढांचे में सुधार आएगा। ऐसे में शुल्क का निर्धारण समुचित तरीके से किया जाना चाहिए ताकि लागत को न्यूनतम रखा जा सके और परिचालकों को प्रतिफल भी हासिल हो सके।
ऐसी नीति का निर्धारण पूरी तरह बाजार की ताकतों के द्वारा नहीं किया जा सकता है क्योंकि कई प्रकार की भुगतान प्रणालियां एक साथ काम कर रही हैं और इसमें कई प्रकार की संस्थाएं संलग्न हैं। उदाहरण के लिए रियल टाइम ग्रॉस सेटलमेंट (आरटीजीएस) और नैशनल इलेक्ट्रॉनिक फंड्स ट्रांसफर (एनईएफटी) भुगतान प्रणाली का संचालन स्वयं आरबीआई द्वारा किया जाता है जबकि इमीडिएट पेमेंट सर्विस (आईएमपीएस) और रुपे तथा यूनीफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) का संचालन नैशनल पेमेंट कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया नामक एक गैर लाभकारी संस्था द्वारा किया जाता है जिसका प्रवर्तन वाणिज्यिक बैंकों द्वारा किया जाता है। कार्ड नेटवर्कों का संचालन मुनाफा कमाने वाली संस्थाएं मसलन कार्ड जारीकर्ता, बैंक, फिनटेक कंपनियां आदि करते हैं। ऐसे में नीतियों में मांग, आपूर्ति, आकार और उपयोगकर्ताओं तथा अंशधारकों की सुविधा तथा सुरक्षा को लेकर समग्र दृष्टि रखनी होगी। हालांकि आरबीआई के दायरे के बाहर नीति में कुछ व्यावहारिक बातों को भी ध्यान में रखना चाहिए। उदाहरण के लिए अधोसंरचना की कमी, बाढ़, भूकंप आदि के कारण उत्पन्न होने वाली बाधाएं और कानून व्यवस्था के नाम पर आए दिन इंटरनेट को बंद किया जाना आदि।
वर्तमान लागत और शुल्कों के अनुमानित आकलन के बाद उक्त पत्र कुछ अहम सवाल खड़े करता है। इनमें से कुछ सवाल इस प्रकार हैं। क्या आरबीआई को आरटीजीएस लेनदेन के लिए सदस्यों से शुल्क नहीं वसूलने की नीति की समीक्षा करनी चाहिए और क्या उसे सदस्यों द्वारा ग्राहकों पर आरटीजीएस शुल्क लगाने देना चाहिए या फिर ऐसे शुल्क बाजार आधारित होने चाहिए? इसी प्रकार क्या केंद्रीय बैंक को सदस्य बैंकों पर एनईएफटी के लिए शुल्क लगाना चाहिए और क्या बैंकों को एनईएफटी लेनदेन के लिए ग्राहकों से शुल्क लेने देना चाहिए? क्या ऐसे शुल्क बाजार संचालित होने चाहिए?
आईएमपीएस में क्या रिजर्व बैंक को शुल्क की ऊपरी सीमा तय करनी चाहिए? डेबिट कार्ड और क्रेडिट कार्ड शुल्क के मामले में प्रमुख मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर व्यापारी चुकाता है जबकि आरटीजीएस और एनईएफटी में जारीकर्ता इसे चुकाता है। इस व्यवस्था को सहज बनाने के लिए क्या बदलाव करने होंगे? इसके अलावा क्या रुपे कार्ड को डेबिट कार्ड के समान माना जाना चाहिए और क्या डेबिट कार्ड के हर लेनदेन पर शुल्क लगना चाहिए? इस समय आरटीजीएस, एनईएफटी और आईएमपीएस पर नाममात्र का शुल्क लगता है।
देखा जाए तो चूंकि आरबीआई वाणिज्यिक बैंकों के विचार से संचालित नहीं होता है इसलिए वह सदस्यों पर बिना शुल्क लगाए भी काम करता रह सकता है। लेकिन किसी न किसी मोड़ पर रुपे और यूपीआई पर केंद्रीय बजट के माध्यम से दी जाने वाली लागत सब्सिडी को चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया जा सकता है। शुल्क की कुछ प्रणाली विकसित करनी होगी तभी निजी कंपनियों को यूपीआई में निवेश के लिए प्रेरित किया जा सकेगा। अधिभार और सुविधा शुल्क की पूरी अवधारणा की भी समीक्षा की जानी चाहिए क्योंकि ये अक्सर काफी अधिक होते हैं। प्रति लेनदेन डेबिट कार्ड शुल्क पर भी सावधानी से विचार किया जाना चाहिए। इन सब ब्योरों से बढ़कर आरबीआई को कुछ लक्ष्य अपने मस्तिष्क में रखने चाहिए। भुगतान व्यवस्था जितनी डिजिटल होंगी, वृहद आर्थिक घर्षण उतना ही कम होगा। उसे इस उच्च डिजिटल अर्थव्यवस्था में जहां इलेक्ट्रॉनिक मुद्रा वास्तविक मुद्रा का स्थान ले रही है, इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि नकदी छापने से होने वाले लाभ पर क्या असर होगा।