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रुपये में गिरावट या उछाल?

Last Updated- December 11, 2022 | 5:52 PM IST

जब पी. चिदंबरम वित्त मंत्री थे तब वह अक्सर ऐसी अखबारी सुर्खियों को देखकर नाराज हो जाते थे जिनमें कहा जाता था कि ‘रुपया नये स्तर तक गिर गया’ या उसमें ‘रिकॉर्ड गिरावट’ आई। वह मुद्रा की गिरती कीमत को अपने प्रदर्शन से जोड़कर देखते थे लेकिन इन सुर्खियों के बारे में वह एक मार्के की बात कहते थे। वह कहते थे कि अगर रुपये जैसी आमतौर पर कमजोर मुद्रा गिर रही है तो हर गिरावट (भले ही वह कुछ पैसों की हो) रिकॉर्ड गिरावट ही होगी। ये सुर्खियां और मंत्री की प्रतिक्रिया दोनों ने ही कमजोर मुद्रा में गिरावट से जुड़े दिमागी पूर्वग्रह की अनदेखी की। यकीनन मुद्रा में गिरावट, उसके मूल्य में तेजी की तुलना में अधिक ध्यान खींचती है।

यह इतिहास प्रासंगिक क्यों है? क्योंकि डॉलर के समक्ष रुपये में ‘रिकॉर्ड गिरावट’ एक बार फिर सुर्खियों में है। समाचार पत्र ये नहीं कहते (हालांकि निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार को इस ओर इशारा किया) कि डॉलर के मुकाबले लगभग सभी मुद्राओं में गिरावट आ रही है और रुपया अन्य मुद्राओं की तुलना में कम गिरा है। वर्ष 2022 की पहली छमाही में डॉलर के मुकाबले रुपये के मूल्य में छह फीसदी की गिरावट आई है। यूरो 11.6 प्रतिशत, येन 19.2 प्रतिशत और पाउंड 13.2 प्रतिशत गिरा है। चीन की मुद्रा युआन जरूर केवल 3.6 प्रतिशत गिरी है लेकिन ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया और पाकिस्तान की मुद्राएं और ज्यादा गिरी हैं। ऐसे में सही खबर यह होनी चाहिए कि रुपया लगभग अन्य सभी मुद्राओं की तुलना में मजबूत हुआ है। लेकिन यह खबर नदारद है।
क्या यह बात मायने रखती है? यकीनन क्योंकि इससे नीति गलत दिशा में जाती है। उदाहरण के लिए नरेंद्र मोदी सरकार जब सरकार में आई तब ‘मजबूत मुद्रा’ की नीति को लेकर एक तरह का पूर्वग्रह था। इस नीति को तैयार करने वालों ने इस बात की अनदेखी कर दी कि दीर्घावधि के सफल विकास वाले देशों (चीन और जापान इसका सबसे अच्छा उदाहरण हैं) ने अपने निर्यात बाजार की बेहतरी के लिए ‘कमजोर मुद्रा’ की नीति अपनाई। इसका कारण एकदम सहज है: यदि अपनी विकास अवस्था के कारण आप कीमत पर प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं तो आप तकनीक या उत्पाद गुणवत्ता पर मुकाबला नहीं कर सकते। ऐसे में कमजोर मुद्रा मदद करती है। समय के साथ निर्यात को गति मिलती है और अर्थव्यवस्था बेहतर होती है। इसके साथ ही मुद्रा की गिरावट का रुख भी पलट जाता है।
कई लोग देश और मुद्रा के इस दीर्घावधि के कारण-प्रभाव संबंध को गलत समझते हैं। मजबूत अर्थव्यवस्था की मुद्रा मजबूत होती है और पूंजी प्रवाह इसमें मदद करता है। एक कमजोर अर्थव्यवस्था या उच्च मुद्रास्फीति वाली अर्थव्यवस्था, मुद्रा को कृत्रिम मजबूती देने से मजबूत नहीं होती। ऐसी नीति स्थायी नहीं होती और इसमें पूंजी के बाहर जाने का खतरा रहता है। जहां तक व्यापार की बात है चार दशक से
अधिक समय में (नेहरू की आत्मनिर्भरता के वर्षों समेत) भारत ने रुपये को अधिमूल्यित रखा। ऐसे में जहां पूर्वी एशियाई देशों का व्यापार बढ़ा, भारत का विश्व व्यापार में हिस्सा 80 प्रतिशत गिरकर 2.5 प्रतिशत से 0.5 प्रतिशत हो गया।
यहां दो विरोधाभासी उदाहरणों से बात स्पष्ट होगी। भारतीय रुपया पाकिस्तानी रुपये से मजबूत रहा है जो अब एक डॉलर के मुकाबले 205 रुपये पर पहुंच चुका है। ऐसा इसलिए हुआ कि पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था का कुप्रबंधन हुआ। दूसरी ओर थाई मुद्रा बहत जो एक समय रुपये से 10 प्रतिशत तेज थी अब उसका मूल्य 2.20 रुपये है। मजबूत मुद्रा के साथ भी थाईलैंड अपने सालाना व्यापार अधिशेष को बरकरार रख सका है। सन 1991 के बाद भारतीय मुद्रा तथा अन्य मुद्राओं के अधिक बाजारोन्मुखी होने से व्यापार और मुद्रास्फीति पर भारत का प्रदर्शन सुधरा लेकिन रुपये में गिरावट के बाद भी उसका व्यापार घाटा बरकरार रहा। स्पष्ट है कि अब तक किए गए सुधार अपर्याप्त हैं।
अगर भारत के राजनेता मजबूत रुपया चाहते हैं तो उन्हें अर्थव्यवस्था का प्रबंधन सुधारना होगा। मुद्रास्फीति पर नियंत्रण, उत्पादकता में सुधार लाना होगा। रुपये को मजबूत करने के लिए रिजर्व बैंक से अरबों डॉलर खर्च कराना गलत तरीका होगा। तथ्य तो यह है कि कुछ समय पहले तक भारत में मुद्रास्फीति उसके महत्त्वपूर्ण बाजारों की तुलना में ऊंची थी। यह स्वाभाविक है कि रुपये की घरेलू क्रय शक्ति में आई गिरावट कम विनिमय दर में नजर आए। प्रदर्शन में बदलाव के साथ रुपया बिना रिजर्व बैंक के हस्तक्षेप के स्वयं को थाम लेगा।

First Published - July 2, 2022 | 1:56 AM IST

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