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खाद्य उत्पादों के प्रसंस्करण में सक्षम किसान

Last Updated- December 11, 2022 | 1:24 PM IST

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग ने बीते कुछ सालों में शानदार  बढ़ोतरी की है लेकिन यह उद्योग अपने बुनियादी उद्देश्यों किसानों की आमदनी बढ़ाने और फसल की बरबादी रोकने में नाकाम रहा है। कृषि उत्पादों के मूल्य संवर्द्धन से किसानों की जगह उद्योगों को ज्यादा लाभ मिला है और उद्योगों के लिए फायदा साल दर साल बढ़ता जा रहा है।
किसानों को फसल के बाद होने वाला नुकसान निरंतर बढ़कर कुछ अधिक हो गया, जल्दी खराब होने वाली फसलों में नुकसान बढ़कर 40 फीसदी तक हो गया। मौद्रिक रूप से यह घाटा सालाना 60 हजार करोड़ से 80 हजार करोड़ रुपये के बीच है।
इस घाटे के कई कारण जैसे फसल के बाद देखरेख, यातायात, भंडारण और उत्पाद की मार्केटिंग में निपुणता का अभाव होना है। इसी क्रम में मूल्य संवर्द्धन और पकी हुई फसल को लंबी अवधि तक ठीक-ठाक रखने के लिए खेत में ही प्रसंस्करण का कम स्तर होना उत्तरदायी है। इस घाटे के लिए उत्पादकों और प्रसंस्करणकर्ताओं के बीच सीधे संबंध होने का अभाव भी जिम्मेदार है।
खेत में तैयार फसल का बमुश्किल 10 फीसदी हिस्से का ही मूल्य संवर्द्धन या प्रसंस्करण हो पाता है। इस स्तर को बढ़ाकर कम से कम 25 फीसदी किए जाने की जरूरत है। फसल को खराब होने से बचाने, सालभर मौसमी कृषि उत्पाद मुहैया कराने व इनके दामों में कम उतार-चढ़ाव के लिए इस कम से कम प्रस्तावित स्तर को प्राप्त करने की जरूरत है। 
उच्च स्तर पर प्रसंस्करण होने से गांव में किसानों के लिए अतिरिक्त आमदनी सृजित होगी, खेती के अलावा अन्य क्षेत्रों में रोजगार बढ़ेगा और लोगों के लिए उद्यमिता के अवसर पैदा होंगे। भारतीय परिस्थितियों में उत्पादन के प्रमुख केंद्रों के पास बड़े औद्योगिक उद्यम की जगह लघु एवं कुटीर उद्योग अधिक फायदेमंद होंगे। ऐसे में छोटी जोत वाले किसान भी अन्य आर्थिक गतिविधियों के जरिये अपनी आमदनी बढ़ा सकता है।
विश्व में कई प्रमुख कृषि जिंसों के उत्पादन में भारत शीर्ष पर है। इसलिए अतिरिक्त कृषि उत्पादों के मूल्य संवर्द्धन की अत्यधिक संभावनाएं हैं। देश का दूध उत्पादन के क्षेत्र में पहला स्थान; फल, सब्जी व मछली पालन के क्षेत्र में दूसरा स्थान और अंडों के उत्पादन के क्षेत्र में तीसरा स्थान है।
भारत स्वास्थ्य से जुड़े कई खाद्य और बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कई जड़ी-बूटियों का उत्पादन भी करता है। इनसे घरेलू और निर्यात के बाजार के लिए पौष्टिकता वाले स्नैक्स और अन्य तरह के मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुमान खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र का सकल मूल्य वर्द्धन (जीवीए) 2014-15 में 1.34 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2020-21 में 2.37 लाख करोड़ रुपये हो गया। भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) की हालिया अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार यह क्षेत्र अब सालाना करीब 15 फीसदी की दर से भी बढ़ सकता है। 
इस अध्ययन में भारत के खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में अप्रैल 2000 से मार्च 2022 के बीच प्रत्यक्ष या विलय व अधिग्रहण के जरिये 11 अरब डॉलर विदेशी निवेश आने की गणना की गई थी। अनुकूल नीति का वातावरण होने पर इस क्षेत्र का तेजी से विकास हो सकता है।
सरकार विनिर्माण और रिटेल कारोबार सहित ई-कॉमर्स और भारत में बने खाद्य उत्पादों के लिए स्वचालित प्रक्रिया से 100 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दे चुकी है। इसके अलावा उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाओं का विस्तार इस उद्योग तक किया गया है। इससे क्षेत्र के तेजी से अधिक विकास की प्रेरणा मिलेगी।
सरकार ने लघु व कुटीर प्रसंस्करण इकाइयों को विशेष तौर पर बढ़ावा देने के लिए दो विशेष पहल प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना और पीएम- सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यमिता योजना के औपचारिककरण की शुरुआत की है। 
इनका लक्ष्य उत्पादों को लाभ मुहैया कराना है। प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना का बुनियादी लक्ष्य कृषि उत्पादों के लिए आधुनिक फसल के बाद आधारभूत संरचना का विकास करना और निचले स्तर तक उनकी मूल्य श्रृंखला स्थापित करना है। 
पीएम- सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यमिता योजना के औपचारिक स्वरूप में एक जिला एक उत्पाद की नीति के अनुरूप मौजूदा सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों को बेहतर बनाना और लघु स्तर की इकाइयां स्थापित करने के लिए वित्तीय, तकनीकी और कारोबारी मदद मुहैया कराना है।
भारत की कृषि की विशिष्टताओं के कारण बड़ी इकाइयों की अपेक्षा छोटी व सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां आर्थिक रूप से अधिक व्यावहारिक हैं। इसके प्रमुख कारणों में कई कृषि उत्पाद शीघ्र खराब होना और कई फसलों का खास मौसम होना हैं। कई कृषि उत्पाद की उपलब्धता कई स्थानों पर बिखरी हुई है।
जिंसों की कमी से निपटने के लिए खास भंडारगृह और यातायात की सुविधा की जरूरत है। उत्पाद की गुणवत्ता के लिए उत्पाद का प्रसंस्करण के लिए उपयुक्त होना भी जरूरी है। प्रसंस्करण इकाइयों को कृषि उपज विपणन समितियों (नियमित मंडियों) से ही अनिवार्य रूप से कच्चा माल प्राप्त करने से बड़ी बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
केवल कुछ ही राज्यों ने ही मार्केटिंग के उपबंधों में संशोधन कर किसानों से सीधे फसल खरीदने की इजाजत दी है। कई स्थानों पर लॉजिस्टिक्स आधारभूत संरचना की जरूरत है।
इन योजनाओं को जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए सबसे अच्छा तरीका छोटे-लघु और गांव स्तर पर कृषि प्रसंस्करण इकाइयों को स्थापित करना है और साथ ही साथ ये इकाइयां संगठित क्षेत्र की खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों की भी मदद करें। 
हालांकि इसमें छोटे व मध्यम क्षेत्रों को वरीयता दी जानी चाहिए क्योंकि इससे सीधे तौर पर किसानों की आमदनी जुड़ी हुई है। किसानों को भी व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से छोटे व सूक्ष्म कृषि प्रसंस्करण केंद्रों की स्थापना करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
किसान सहकारी समितियों और किसान उत्पादक संगठनों के जरिये भी इन केंद्रों को स्थापित करने को बढ़ावा दिया जाए। इनमें छोटी मशीनों पर आधारित केंद्र जैसे चावल की छोटी मिल, आटा चक्कियां, मसाला पिसाई केंद्र, चारे की छोटी मिलें, दाल की छोटी मिलें आदि हो सकती हैं। ऐसे उपक्रम स्थापित करने के लिए अधिक जमीन और बड़े निवेश की जरूरत नहीं पड़ती है और इनसे गांवों में रहने वाले लोग आमदनी भी प्राप्त कर सकते हैं।

First Published - October 21, 2022 | 9:56 PM IST

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