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किसानों ने छोड़ी ई-चौपाल, चले मंडी की राह

Last Updated- December 07, 2022 | 12:43 AM IST

आजकल देश की कई नामी गिरामी कंपनियां गांवों तक पहुंचने का सीधा रास्ता बना रही हैं।


इन कंपनियों की कोशिश है कि वे वहां से कृषि उत्पाद भी खरीद सकें और कृषि में इस्तेमाल होने वाले सामान के  लिए बाजार भी तैयार कर सकें। आईटीसी ने इस मुहिम की शुरुआत की है अपने ई-चौपाल मिशन के जरिए।

दूसरी ओर डीसीएम श्रीराम कंसल्टेंसी लिमिटेड भी हरियाली किसान हाट के साथ मैदान में कूद पड़ी है और रिलायंस की अपनी कोशिशें भी जारी हैं। अब सबसे अहम सवाल यह है कि इससे किसानों को क्या फायदा होने वाला है?

अब मध्य प्रदेश के सीहोर जिले की हम बात करें जो गेहूं और सोया की उन्नत किस्मों के लिए जाना जाता है। वहां के किसान बड़ी उहापोह की स्थिति से गुजर रहे हैं।हाल ही में गेहूं किसानों के लिए सरकार ने 1000 रुपये के न्यूनतम समर्थन मूल्य के साथ 100 रुपये बोनस की घोषणा की। ऐसे हालात में कारोबारियों ने राजस्थान से गेहूं लेना शुरु किया ताकि उन्हें सस्ता गेहूं मिल सके। मध्य प्रदेश के किसानों के पास कोई खरीदार भी नहीं बचा।

कंकरखेड़ा के भागीरथ वर्मा, जामली के रमेश परमार और फराद गांव के किसान गजराज सिंह में एक बात समान है। ये सभी सोया और गेहूं किसान हैं। प्रति क्विंटल गेहूं बिक्री पर 100 रुपये बोनस देने के लिए ये किसान एकजुट होकर मध्य प्रदेश सरकार और सीहोर जिले के मंडी के अधिकारियों की काफी आलोचना करते हैं।

अब यहां के किसान आईटीसी लिमिटेड के ई-चौपाल के जरिए मजबूरन बिक्री करने के लिए तैयार हैं। हालांकि इन लोगों के चार दिन पहले से ही बर्बाद हो चुके हैं और इनमें से हर एक किसान को औसतन 25 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। रमेश परमार का कहना है,’यह मेरे लिए बहुत मुश्किल होगा कि मैं 45 क्विंटल गेंहू लेकर फिर से घर वापस लौटूं।

मैंने अपने गेहूं को 1,101 रुपये प्रति क्विंटल की दर पर बेचा जबकि मंडी के दर के मुताबिक इसकी कीमत 1,100 रुपये है। आईटीसी कल से मिल वैरायटी नहीं खरीदेगी।’ सीहोर जिले के आईटीसी रफीकगंज सेंटर पर लगे एक इश्तिहार के मुताबिक आईटीसी ने कल से गेहूं लेना बंद कर दिया है। लगभग 300 गांवों के किसान इस सेंटर पर साल में दो बार अपनी उपज को बेचने के लिए आते हैं।

शुजालपुर जिले के फराद गांव के परमार का कहना है,’आईटीसी की ई-चौपाल के  लिए तो यह आम बात ही हो गई है। अगर खराब मौसम की वजह से अनाजों की चमक थोड़ी भी धीमी पड़ी  तो वे जिंस नहीं खरीदते। चीजों को परखने का उनका अपना ही मानदंड है जिसे वे किसी को बताते नहीं। मुझे काफी जोर देकर उन्हें बताना पड़ा कि मैं पिछले चार दिनों से इसी तरह की गेहूं को बेचने के लिए आ रहा हूं।

आखिरकार जब मैंने उन्हें पिछले तीन दिनों की बिक्री रसीद दिखाई तब उन्हें यकीन हुआ और वे मेरी फसल को खरीदने के लिए तैयार हो गए। आईटीसी के रफीकगंज खरीद सेंटर के एक्जीक्यूटिव ने ग्रेडिंग मानदंड के बारे में बताने से इनकार कर दिया। उसका कहना था,’हम इसे किसी को बताने के लिए अधिकृत नहीं हैं।’

भागीरथ वर्मा ने कीमतों पर कोई समझौता नहीं किया। उन्होंने शिकायत भरे लहजे में कहा,’आईटीसी गेहूं की सबसे बेहतर किस्मों में से एक सुजाता के लिए 1,101 रुपये दे रही है। हालांकि इसके लिए अधिकतम प्रति क्विंटल 2,500 रुपये दिये जाने चाहिए। जबकि सीहोर मंडी महज 1100 रुपये दे रही है। मैंने सीहोर मंडी में अपनी फसल बेचना बेहतर समझा। इन चीजों को रोकने वाला कोई भी नहीं है।’

वर्ष 2000 तक सरकारी मंडियों में किसानों का शोषण होता था। उन मंडियों में अनाजों को चढ़ाने-उतारने में काफी देर होती थी और फसलों के लिए भुगतान भी देर से किया जाता था। बाद में राज्य सरकार ने मंडी कानून में संशोधन कर निजी कंपनियों को सीधे किसानों से अनाज खरीद के लिए इजाजत दे दी।

इसके बाद आईटीसी ने 1500 ई-चौपाल नेटवर्क  बनाया। इसके हर एक ई-चौपाल में एक बैटरी से चलने वाला कंप्यूटर, एक संचालक और सैटेलाइट संचार की व्यवस्था भी की गई थी। ग्रामीणों को फायदा देने के लिए आईटीसी ने यह कोशिश अपने कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व का हिस्सा मानकर ही किया था। हालांकि यह अपनी जरूरतों के लिए गेहूं और सोया की खरीद के  लिए उनकी व्यवसायिक रणनीति भी हो सकती है।

ई चौपाल के संचालक या अनाज खरीद से जुड़े एजेंट को गेहूं या सोया के एक बोरे की बिक्री पर कमीशन भी मिलता है। संचालक को दूसरा एजेंट कहा जा सकता है जो आईटीसी का कर्मचारी जरूर है लेकिन उसे भुगतान नहीं किया जाता। वे अनाज को कम दाम पर खरीदते हैं और जहां कीमतें ज्यादा मिलती हैं वहां इसे बेच देते हैं। यह हरियाली किसान बाजार के बिल्कुल उलट है। इस बाजार में एजेंट या सेंटर का इंचार्ज कर्मचारी है जिसे भुगतान भी किया जाता है।

वह केवल हरियाली किसान बाजार के लिए अनाज खरीदता है।(बॉक्स में देखें) हरियाली मॉडल कंकरखेड़ा के किसान लाडसिंह वर्मा ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया, ‘वे सरकारी मंडियों के मुकाबले प्रत्येक क्विंटल पर 50 रुपये से ज्यादा नहीं देते। पहले जब यहां आईटीसी आई तब हमें लगा कि सरकारी मंडियों से छुटकारा मिलेगा लेकिन वे भी अब उसी मंडियों की तरह काम करने लगे हैं। वे सोया और गेहूं को छोड़कर और कोई अनाज लेते ही नहीं हैं।’

वर्मा अपनी परेशानी जताते हुए पूछते है,’अगर मेरे पास बहुत ज्यादा मात्रा में सोया, मक्का और बाजरा हो तो मुझे आखिर कहां जाना चाहिए?’ उनका कहना है कि सरकारी मंडियां कम से कम किसी भी अनाज को खरीदने के लिए तैयार तो होती थीं भले ही उसके लिए वे कम कीमतें ही क्यों न दें। वह कहते हैं,’ई चौपाल में पशुओं का इलाज करने वाले डॉक्टर के अलावा अब वहां किसी को आक र्षित करने लायक वहां कुछ भी नहीं है।’

इसका नतीजा यह है कि किसान मंडियों की ओर निराशा के बावजूद लौट रहे हैं क्योंकि मंडी का सौदा इनसे तो बेहतर ही है। आईटीसी के सूत्रों के मुताबिक ये अपने 1500 चौपाल के जरिए कारोबार के लिए नहीं बल्कि अपने उपभोग के लिए लगभग 300,000 टन सोया और इतनी ही मात्रा में गेहूं खरीदते हैं। सरकार ने इन कंपनियों से मिल रही चुनौतियों के मद्देनजर इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के जरिए बोली लगाने की सुविधा और इलेक्ट्रॉनिक मापन की सुविधा का इंतजाम किया है।

किसी भी मंडी पर इस बात का कोई फर्क नहीं पड़ा, सिवाय विदिशा की गंगा मंडी को छोड़कर जिसे आईटीसी को पायलट परियोजना के तहत सौंप दिया गया था। राज्य मंडी बोर्ड के प्रबंध निदेशक एस.एस. उप्पल का कहना है, ‘हमारी कुछ मंडियों का कई वजहों से घाटा जरूर हो सकता है लेकिन वह आईटीसी की वजह से नहीं हो रहा था। सच तो यह है कि हमारी शुल्क राशि में काफी बढ़ोतरी दर्ज की गई है, इसका मतलब यह है कि हमारे पास ज्यादा किसान आ रहे हैं।’

कांकरखेड़ा के किसान रामकृष्ण वर्मा इस बात का जवाब देते हुए कहते हैं, ‘मैंने खेती में लागत की कीमत में से अपने श्रम और दूसरी समस्याओं को हटाकर कुल निवेश को जोड़ा। मैंने 21 क्विंटल सोया को 42,000 हजार रुपये में सरकारी मंडी में बेचा जबकि मेरी कुल लागत थी 46,000 रुपये।’ आईटीसी ने 2000 में ई चौपाल लॉन्च किया था और अब इनके मध्य प्रदेश को मिलाकर 6 राज्यों में इसके 5200 ई- चौपाल हैं। इसकी वेबसाइट के मुताबिक इससे लगभग 35 लाख किसान जुड़े हुए हैं।

रिलायंस इंडस्ट्री भी अपनी सोशल इंफ्रास्ट्रक्चर को बना रही है ताकि वे किसानों तक अपनी पहुंच बना सकें। इसके लिए वे कम से कम 5 गांवों में और तालुक स्तर पर में फील्ड ऑफिसर की नियुक्ति कर रहे हैं। आंध्र प्रदेश, पंजाब और हरियाणा से दूध की खरीद के लिए इस मॉडल को शुरू किया गया है। जल्द ही इसमें और भी चीजें शामिल की जाएंगी।  प्रवक्ता ने इस संदर्भ में कुछ भी कहने से मना किया।

काफी हरा-भरा है हरियाली मॉडल


डीसीएम श्रीराम कंसल्टेंसी लिमिटेड(डीएससीएल) ने अपने तरीके के  ई चौपाल मॉडल को बनाया है जिसे नाम दिया गया है हरियाली किसान बाजार(एचकेबी )। इस मॉडल का लक्ष्य गांव के लोगों के लिए बाजार बनाना है खासतौर पर किसानों के लिए।

पिछले हफ्ते दिल्ली में डीएससीएल के सीइओ अजय एस. श्रीराम ने इस हरियाली किसान बाजार पर अपना प्रेजेंटेशन दिया। 2002 में शुरू हुए इस हरियाली मॉडल के 160 बूथ हैं जहां 25 से 30 किलोमीटर तक नदी से सिंचाई होती है। श्रीराम  का कहना है कि हरियाली किसान बाजार के एक बूथ के जरिए 20,000 किसानों के परिवार तक अपनी पहुंच बना रही है।

उनके मुताबिक एचकेबी एक व्यवसायिक रूप से सफल बिजनेस की मिसाल पेश कर रहा है। यह संयुक्त विकास को बनाने की कोशिश में भी सक्षम है।  बकौल श्रीराम एचकेबी  के जरिए कंपनी के साथ ग्रामीण जनता को भी मुनाफा दिलाने की कोशिश की जा रही है। एचकेबी अपनी  इस पहल के जरिए किसानों को उनकी खेती से संबंधित कुछ सुविधाएं भी मुफ्त में मुहैया कराना चाहती है ताकि किसानों की खेती की उत्पादकता बढ़े।

इसके लिए एचकेबी इन सुविधाओं को किसानों के  दरवाजे तक पूरी जवाबदेही से पहुंचाना चाहती है। उनका कहना है कि किसान किसी चीज के महत्व को बखूबी समझती है और भरोसे का रिश्ता कायम कर हम लंबे समय तक चलने वाले बिजनेस मॉडल पर काम कर सकते हैं जो मुनाफा देगा।

एचकेबी ने अपने यहां 2-3 कृषि वैज्ञानिकों को रखा है जिन्हें बेहतर वेतन भी दिया जाता है। इनके पास कृषि विषय की डिग्री भी है। श्रीराम का कहना है,’ये कृषि वैज्ञानिक एचकेबी के सभी आउटलेट पर किसानों को 24 घंटे अपनी सेवा देते हैं।’ ज्यादा तव्वजो इस बात पर दी गई कि गांव में लंबे समय तक कारोबार को बनाए रखा जाए और गांव में भी शहरी सुविधाएं और घरेलु सामान आसानी से मिल सके ।

कृषि वैज्ञानिक एग्रीकल्चर में बीएससी करते हैं। इस विषय में डाक्टरेट की डिग्री पाने वाले को भी इन सेंटर पर अपनी सेवा देनी होती है। श्रीराम का कहना है कि एचकेबी की वजह से नई तकनीकों के रोजगार की गुंजाइश बनी है। इसके साथ ही सोया किसानों को भी 3000 रुपये प्रति एकड़ मुनाफा होने लगा है। पहले किसान परंपरागत तरीके से खेती करके केवल 1600 रुपये प्रति एकड़ मुनाफा ही पाता था।

वह कहते है कि ठेके की खेती के जरिए जो खरीद होती है उसमें कीमते बिल्कुल तय कर दी जाती हैं इसलिए वहां किसी अनिश्चितता के लिए कोई गुंजाईश नहीं बनती है। अनाजों की अधिप्राप्ति का मतलब यह है कि यह मध्यस्थता के जरिए हर एक सेंटर के द्वारा किसानों से अनाज खरीदना है।

इन सेंटर से पेट्रोल पंप, एलपीजी गैस कनेक्शन और बैंक भी जुड़े हैं। इसके अलावा यहां एक मॉल भी है जहां घरेलु उपभोक्ता वस्तुएं मसलन टीवी, फ्रिज आदि भी खरीदा जा सकता है। यहां इस कंपनी की बनाई हुई बीजों के अलावा दूसरी कंपनी की बीज भी मिलती है।

इस हरियाली किसान बाजार का लक्ष्य ग्रामीण क्षेत्र के लोगों की जिंदगी को बेहतर बनाना और वहां बेहतर उत्पादों को मुहैया कराना भी है। इसके साथ ही खेती के लिए उपयोगी सेवा देना भी है। भारत पेट्रोलियम के साथ एचकेबी ने अपने सेंटर के नजदीक पेट्रोल पंप खोलने के लिए गठजोड़ भी किया है। लगभग 16 पेट्रोल पंपों ने काम करना शुरू कर दिया है जबकि इस साल के अंत तक 60 और पेट्रोल पंप के शुरू होने की उम्मीद है।

आईसीआईसीआई  और एचडीएफसी बैंक ने भी यहां अपना काउंटर खोला है। फिलहाल एचकेबी उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, पंजाब, हरियाणा और आंध्र प्रदेश में चल रही है। एचकेबी अब जल्द ही  महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु में शुरू की जाएगी।

First Published - May 20, 2008 | 11:06 PM IST

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