किसी भी स्टार्टअप के जीवन में 15 साल लंबा समय है। अमेरिका की मार्केट इंटेलिजेंस कंपनी सीबी इनसाइट्स के मुताबिक 70 फीसदी टेक स्टार्टअप की उम्र धन जुटाने के पहले चरण के बाद करीब 20 महीने होने का अनुमान है, जिसकी कई वजह हैं। अमेरिका में 2018 से नाकाम होने वाली 100 स्टार्टअप से प्राप्त सूचनाओं के विश्लेषण के आधार पर किसी स्टार्टअप के अपना वजूद नहीं बचा पाने के बहुत से कारण पाए गए हैं। आम तौर पर बहुत सी स्टार्टअप अपना कारोबार समेटते हुए नकदी की कमी से लेकर कमजोर कारोबारी मॉडल और नियामकीय चुनौतियों से लेकर टीम में सौहार्द की कमी का हवाला देती हैं।
इस पृष्ठभूमि में फ्लिपकार्ट एक अच्छी केस स्टडी हो सकती है, जिसे भी इन चुनौतियों में से कम से कम कुछ का सामना करना पड़ा होगा। भारतीय ई-कॉमर्स की इस अगुआ को स्थापित हुए 15 साल हो जाएंगे। जब सचिन बंसल और बिन्नी बंसल (एक-दूसरे से संबंधित नहीं) ने इसे अक्टूबर 2007 में शुरू किया था, उस समय उन्हें नहीं पता होगा कि आगे कंपनी क्या मोड़ लेगी और इसे किस तरह की उठापटक से गुजरना पड़ेगा।
पीछे मुड़कर देखते हैं तो कंपनी का इन 15 साल में बेंगलूरु के कोरामंगला से अर्कन्सास (अमेरिका) के बेंटनविल तक का सफर स्टार्टअप की दुनिया में सबसे अलग रहा है। दो-बेडरूम के अपार्टमेंट से एक ऑनलाइन बुक स्टोर के रूप में शुरुआत करने वाली फ्लिपकार्ट पर अब बहुलांश स्वामित्व बेंटनविल में मुख्यालय वाली वॉलमार्ट का है। यहां बेंगलूरु से बेंटनविल तक के 15,000 किलोमीटर के सफर के पड़ावों पर प्रकाश डाला गया है।
पहला, कोरामंगला की ही बात करते हैं। फ्लिपकार्ट ने सड़क के दोनों तरफ पेड़ों की कतार, रूफटॉप कैफे और महंगे अपार्टमेंट के लिए प्रसिद्ध बेंगलूरु के दक्षिण-पूर्वी इस इलाके को स्टार्टअप का एक ठिकाना बनाया, लेकिन यहां हाल के वर्षों में बहुत कुछ बदल गया है। रियल एस्टेट की ऊंची कीमतों और बिगड़ते बुनियादी ढांचे की वजह से स्टार्टअप यहां से बोरिया-बिस्तर समेटकर बेंगलूरु के उपनगर में स्थित दूसरे इलाके- एचएसआर लेआउट में चली गई हैं, जो एक सस्ता विकल्प बन गया है। फ्लिपकार्ट को भी इस शहर के बाहरी इलाके में स्थित एक आईटी पार्क में एंबेसी टेक विलेज में कुछ साल पहले एक नया पता मिल गया है।
एक दो कमरे के अपार्टमेंट से शुरुआत कर फुटबॉल के 12 मैदानों के बराबर परिसर में पहुंचना एक बड़ा सफर है। पिछले 15 साल के दौरान फ्लिपकार्ट को जिस तरह और जिस स्तर की प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा है, वह काफी नाटकीय रहा है। शुरुआती दिनों में दोनों बंसल साझेदारों की अगुआई वाली कंपनी के लिए मुश्किल से ही कोई प्रतिस्पर्धा थी। इसके बाद स्नैपडील, मिंत्रा (बाद में फ्लिपकार्ट में विलय), जबोंग और कुछ अन्य कंपनियां भी फ्लिपकार्ट के बराबर पहुंचने की कोशिश करने लगीं।
जून 2013 में एमेजॉन भारत आ गई, जिससे फ्लिपकार्ट के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ गई। इसके अगले साल एमेजॉन के संस्थापक जेफ बेजोस (शेरवानी पहने और हाथ में डॉलर थामे हुए) ने अपनी भारत यात्रा के दौरान ट्रक पर सवार होकर फोटो खिंचवाये, जिसे उनका एक तरह का बयान ही समझा जाना चाहिए। दीवाली सेल के एमेजॉन के बिलबोर्ड अब तक फ्लिपकार्ट के दबदबे वाले क्षेत्र में एक तरह की सेंध थी। हालांकि एमेजॉन और फ्लिपकार्ट की बिक्री के आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए जाते हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि अमेरिकी कंपनी शहरी खरीदारों के बीच बेहतर पैठ बना पाई है, जबकि फ्लिपकार्ट सामान्य जनता की ऑनलाइन कंपनी बनी हुई है। इस बीच फ्लिपकार्ट बनाम एमेजॉन की जंग एमेजॉन और वॉलमार्ट के बीच अमेरिका में खुदरा बाजार के लिए चल रही जंग को आगे बढ़ाने में तब्दील हो गई है क्योंकि फ्लिपकार्ट को वॉलमार्ट ने खरीद लिया है।
शायद इन 15 साल के दौरान ऑनलाइन कारोबार के क्षेत्र में एकमात्र जो चीज नहीं बदली है, वह नीति और नियमनों में स्पष्टता की कमी है। ई-कॉमर्स नीति बनाने का काम अब भी चल ही रहा है और इसके बहुत से प्रारूप कचरा पात्र में फेंके जा चुके हैं। प्रेस नोट के जरिये बदलावों के रूप में समय-समय पर विदेशी ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए दिशानिर्देशों में बदलाव किए जा रहे हैं ताकि इस क्षेत्र को घरेलू कंपनियों के लिए सुरक्षित रखा जा सके। कोई व्यापक नीति पेश किए जाने में अभी समय लगेगा।
हालांकि सरकार ने नीतिगत मोर्चे पर अपनी गतिविधियों को संगठित नहीं बनाया है, लेकिन उद्योग ने फ्लिपकार्ट के काल में तगड़ी प्रगति की है।
फिनटेक को लोकप्रियता मिली है और यूनिकॉर्न बनना एक आंदोलन जैसा है। भारत यूनिकॉर्न (एक अरब डॉलर या उससे अधिक मूल्यांकन वाली स्टार्टअप) के मामले में 100 का आंकड़ा पार कर चुका है और अगली 100 के लिए तेजी से आगे बढ़ रहा है।
लेकिन यूनिकॉर्न की जमात में शामिल होने वाली स्टार्टअप की तादाद बढ़ने के बावजूद ये निवेशकों से धन नहीं मिलने की वजह से प्रभावित हो रही हैं। फ्लिपकार्ट के प्रचंड मूल्यांकन के दिनों में बड़े निवेशकों का स्टार्टअप कार्यालय और सार्वजनिक कार्यक्रमों में स्वागत किया जाता था, लेकिन अब हकीकत से रूबरू होने का वक्त आ गया है। भले ही इस शताब्दी की शुरुआत के समय डॉटकॉम का बुलबुला फूटने जैसे खराब हालात नहीं है, लेकिन सभी श्रेणियों की स्टार्टअप में छंटनी सामान्य बात हो गई है। इसके बाद धन जुटाने के चरण भी थम गए हैं। आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) भी रुक गए हैं।
फ्लिपकार्ट को भी अपने आईपीओ में देरी करनी पड़ी है। यह अब मुश्किल से ही किसी स्टार्टअप या यूनिकॉर्न के रूप में सूचीबद्ध है। कोरामंगला स्थित यह स्टार्टअप भले ही ऐसी सूचियों से आगे बढ़ गई हो, लेकिन कई तरीके से यह अब भी उस दुनिया से संबंधित है।