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गलत नहीं है कीमतों का उतार-चढ़ाव

Last Updated- December 07, 2022 | 1:40 AM IST

इस वक्त दुनिया भर में खाने के सामानों की कीमतों में आग लगी हुई है। इस वजह से दुनिया भर में डर का माहौल बन चुका है, लेकिन इस बात की पूरी संभावना है कि जल्दी ही बड़ी मात्रा में सप्लाई के साथ ही इस पर पूर्ण विराम लग जाएगा।


आपूर्ति में होने वाली थोड़ी कमी की वजह से भी दामों में होने वाले तेज इजाफे से अनाज की कीमतों के प्रति इस तेजी से अमीर होती इस दुनिया की असंवेदशीलता झलकती है। वैसे, दामों में होना वाले इस उतार-चढ़ाव को भी गलत ठहराना सही नहीं होगा। वायदा बाजार और हेज फंडों की वजह से इस उतार-चढ़ाव पर भी अंकुश लगाया जा सकेगा।

खाद्य सामानों की दिनोंदिन बढ़ती कीमतों की वजह से 18वीं सदी के अंग्रेज राजनीति वैज्ञानिक माल्थस की याद ताजा हो जाती है। उनका कहना था कि एक दिन ऐसा आएगा, जब धरती के संसाधन तेजी से बढ़ती आबादी के लिए कम पड़ जाएंगे और तब प्रकृति अपने हिसाब से खाद्यान्न और लोगों के बीच फिर से सामंजस्य बैठाएगी।

हालांकि, पिछली सदी में ऐसे कई मौके आए जब लगा कि माल्थस की बात सही होने ही वाली है, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। ऐसी बात नहीं है कि धरती के पास हमेशा से लोगों को संभालने के लायक संसाधन रहे हैं। सच कहें तो हमारी धरती माता के पास ही अपने बच्चों के मुकाबले कम संसाधन रहे हैं। दु्निया का औसत कृषि उत्पाद हमेशा उस स्तर से कम रहा है, जितना कि हम मौजूदा विज्ञान की सहायता से पा सकते थे।

दुनिया के ज्यादातर हिस्से की जमीन में काफी कम पैदावार होती है। अब हमारे मुल्क को ही ले लीजिए, यहां भी तो ज्यादातर हिस्से का औसत उत्पादन उसकी क्षमता के मुकाबले काफी कम है। इसी वजह से अनाज की कीमतें ज्यादा होती हैं और इसी वजह से तो किसान उन्हें ज्यादा मात्रा में उपजाने के लिए आते हैं। कीमतों में इजाफे के साथ-साथ उत्पादन बढ़ने की यह प्रक्रिया सदियों से चली आ रही है।

सामाजिक सिद्दांत इंसानों को जिद्दी और कुछ हद बेवकूफ भी मानते हैं। इन सिध्दांतों के मुताबिक लोगों को उनकी सरकार बताती है कि उन्हें क्या करना चाहिए। वहीं दूसरी तरफ, अर्थशास्त्र का सबसे जबरदस्त सिध्दांत यह है कि लोग-बाग हमेशा ही कमाई की तरफ खिंचे चले आते हैं। जब भी कीमतों में थोड़ा-बहुत भी बदलाव आता है, तो उसका काफी दूर तक प्रभाव पड़ता है।

मिसाल के तौर आज की हालात में अफगानिस्तान को ही ले लीजिए। वहां तो किसानों ने गेहूं की बढ़ती कीमतों को देखते हुए अफीम छोड़ गेहूं उपजाना शुरू कर दिया है। ऐसा सिर्फ अफगानिस्तान में ही नहीं हो रहा है। गेहूं की सरपट बढ़ती कीमतों का असर तो दुनिया भर में दिखाई देने लगा है।

उम्मीद है कि इस साल दुनिया भर में गेहूं और चावल का रिकॉर्ड उत्पादन होगा। यह तो बस शुरुआत है। जैसे-जैसे लोग और कंपनियां अनाजों की ऊंची कीमतों वाली इस दुनिया में अपना खेल दिखाएंगे, इसमें और भी इजाफा होगा।

अनाजों की बढ़ती कीमतों को अक्सर एक मुसीबत के तौर पर पेश किया जाता है। लेकिन हमें यह भी समझने की जरूरत है कि यही चढ़ते दाम ज्यादा उत्पादन और कम उपभोग के संकेत भी भेजते हैं। आज की तारीख में बाजार में कीमतें ही संदेशवाहक का काम करती हैं। हिंदुस्तान में तो कीमतों के उतार-चढ़ाव को बुरी नजर से देखना तो एक फैशन सा हो चला है।

कई लोग तो इसी सोच में डूबे रहते हैं कि असल अर्थव्यवस्था और आर्थिक कीमतों में अंतर है। लेकिन ये लोग इस बात से अनजान हैं कि कीमतों में यही उतार-चढ़ाव तो बाजार के जरिये चलने वाली अर्थव्यवस्था की जान होती है। जो लोग इस उतार-चढ़ाव से नफरत करते हैं, वो शायद आज भी समाजवाद के स्वर्ग के सपने देखते हैं जहां दाम में उतार-चढ़ाव नहीं होता। कम से कम ऐसे तो बाजार की अर्थव्यवस्था काम नहीं ही करती है।

लेकिन पिछले तीन सालों में कीमतों में इतना इजाफा हुआ क्यों? अखबारों में आए दिन इस बारे में कोई न कोई कारण छपते ही रहते हैं। कुछ इसका ठीकरा वायदा कारोबार पर फोड़ते हैं, तो कुछ के मुताबिक यह भारत और चीन में बढ़ती भूख की कारस्तानी है। कुछ तो इसकी वजह बायोफ्यूल को भी मानते हैं। लेकिन इनमें से किसी पर भरोसा करने से पहले अपनी अक्ल का इस्तेमाल जरूर कर लें।

भारत और चीन का विकास आज से नहीं, 1978-79 के समय से हो रहा है। वायदा कारोबार तो सदियों से दुनिया में मौजूद है और दुनिया के छोटे से हिस्से पर ही बॉयोफ्यूल की खेती की जाती है। इस बारे में एक दलील तो डिमांड और सप्लाई के बीच पैदा हुई खाई हो सकती है। छोटी सी ही जमीन सही, लेकिन जमीन तो गेहूं के हाथों से गई है न?

साथ ही, आस्ट्रेलिया में भी पिछले 10 सालों से लगातार अकाल पड़ रहा है। इन बातों से उत्पादन पर तो असर पड़ा। इसके मुकाबले कीमत को भी चढ़ना ही था, जिससे डिमांड और सप्लाई में बराबरी हो सके। तो कीमतों में कितनी बढ़ोतरी हो, ताकि डिमांड सप्लाई के बराबर आ सके? मान लीजिए, आप एक नान खरीद रहे हैं और उस नान में मौजूद आटे की कीमत 1 रुपये है।

अगर आटे की कीमत में 50 फीसदी का भी इजाफा होता है, तो भी केवल उस नान की कीमत में 50 पैसे का ही इजाफा होगा। इसलिए गेहूं की कीमत में आए भारी उछाल से भी नान की डिमांड कम नहीं होगी। जैसे-जैसे दुनिया अमीर होती जा रही है, कीमतें का डिमांड पर असर भी काफी कम हो गया है। इसलिए थोड़ी सी सप्लाई कम होती है, तो कीमतों में भारी उछाल आता है ताकि मांग और आपूर्ति के संतुलन को फिर से स्थापित किया जा सके। इसी तरह है मांस की डिमांड।

एक किलो मांस को बनाने के लिए जरूरत होती है दो से आठ किलो अनाज की जरूरत होती है। अगर अनाज की कीमत बढ़ेगी तो गरीब देशों में लोग बाग मांस खाना कम कर देंगे।  लेकिन पैसों की ढेर पर बैठी दुनिया के लिए अनाज की कीमत की अहमियत कम होती जा रही है। इसलिए डिमांड-सप्लाई के बैलेंस को फिर से स्थापित के लिए कीमतों में उछाल की जरूरत तो पड़ेगी ही पड़ेगी। इसलिए जैसे-जैसे दुनिया अमीर होती जाएगी, खाद्यान्न की कीमतों में भी खूब उतार-चढ़ाव आएगा।

पुराने समय में तो इस हालत में सरकारी मदद की दरकार होती, लेकिन अब तो सरकारी हस्तक्षेप भी इसमें कुछ नहीं कर सकती। इस उतार-चढ़ाव का मुकाबला केवल मजबूत वायदा कारोबार और हेज फंडों के जरिये ही किया जा सकता है। वायदा कारोबार आगे होने वाले सप्लाई-डिमांड के असंतुलन के बारे में पहले से ही चेतावनी दे देता है। वहीं हेज फंड एक तरीके से बफर स्टॉक का काम करते हैं।

हालिया घटनाओं से एक बात तो साफ तौर उभर कर सामने आई है कि दुनिया में केवल ही खाद्यान्न बाजार है, विश्व खाद्यान्न बाजार। आज की तारीख में हमारे मुल्क की अनाजों की कीमत भी दुनिया से जुड़ चुकी है। इसे प्राइवेट सेक्टर और नौकरशाहों को एक अलार्म की तरह लेना चाहिए, जो भारत को दुनिया से अलग एक द्वीप के तौर पर देखते हैं।

First Published - May 23, 2008 | 11:57 PM IST

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