बड़े शहरों में एफएम रेडियो भले ही अपना धमाल दिखा रहा हो, लेकिन छोटे शहरों में अब भी इनकी हालत बेहद खस्ता है। इन शहरों में सरकारी एफएम चैनल, प्राइवेट चैनलों के मुकाबले अच्छी कमाई कर रहे हैं।
इसकी वजह है छोटे-छोटे शहरों में प्राइवेट एफएम रेडियो स्टेशनों के सामने नियामक संबंधी मसले और कमाई के अवसर की कमी जैसी कई तरह की परेशानियां। हालांकि, फिक्की-प्राइसवाटरहाउस कूपर्स के एक अध्ययन के मुताबिक पिछले साल तक पूरे मुल्क में एफएम चैनल कुल मिलाकर 620 करोड़ रुपये का कारोबार कर चुके हैं।
उस अध्ययन की मानें तो 2012 तक यह कमाई 24 फीसदी की दर से बढ़कर 1800 करोड़ रुपये हो जाएगा। इसीलिए विश्लेषकों की मानें तो आने वाले सालों में छोटे शहरों में भी प्राइवेट रेडियो स्टेशनों का जादू सिर चढ़कर बोलेगा।
कैसी हैं चुनौतियां
एसोसिएशन ऑफ रेडियो ऑपरेटर्स फॉर इंडिया के महासचिव उदय चावला का कहना है, ‘छोटे शहरों में कई बड़े एफएम चैनल काफी मुनाफा कमा रहे हैं। मिसाल के तौर पर रेडियो मिर्ची और रेडियो सिटी को ही ले लीजिए। हालांकि इन्हें छोड़कर कोई भी बेहतर नहीं कर रहा है। छोटे शहरों में एफएम चैनलों के सामने सबसे बड़ी मुसीबत म्यूजिक रॉयल्टी की होती है।
अगर एफएम चैनलों को समाचारों का प्रसारण की भी इजाजत मिल जाए, तो अच्छा होगा। इससे विज्ञापनदाताओं का रुझान भी बढ़ेगा।’ उनके मुताबिक देश में अगर सरकार नेटवर्किंग के लिए इजाजत दे देगी तो बेहतर होगा।
दूसरी तरफ, रेडियो सिटी के एग्जिक्यूटिव वाइस प्रेसीडेंट और प्रमुख (सेल्स) असित कुकियन के का कहना है कि, ‘छोटे शहरों में म्यूजिक रॉयल्टी के साथ-साथ प्रोग्रामिंग के मामले में अच्छी प्रतिभाओं की कमी भी सबसे बड़ी दिक्कत है। सरकार रॉयल्टी और मल्टीपल फ्रिक्वेंसी की बातें तय नहीं करती, तब तक हम आगे विस्तार के लिए कुछ नहीं सोच सकते।’
विज्ञापन के आंकड़े
जहां तक विज्ञापनों की बात है छोटे शहरों में प्राइवेट एफएम चैनलों को सबसे बड़ा सहारा मिलता है स्थानीय विज्ञापनदाताओं से। हालांकि, असित का कहना है, ‘छोटे शहरों में भी 70 प्रतिशत विज्ञापन बड़े ब्रांडों के ही होते हैं, जबकि 30 फीसदी क्षेत्रीय और स्थानीय विज्ञापन होते हैं। इसी तरह 40 प्रतिशत विज्ञापन रिटेल सेगमेंट से आते हैं, जबकि 60 फीसदी ऐड बड़ी-बड़ी कंपनियों के होते हैं।’
दूसरी तरफ, चावला का कहना है कि देश में विज्ञापनों को हासिल करने के बाजार रेडियो का मार्केट शेयर 4 से 4.5 फीसदी का है। तो ऐसे में प्राइवेट रेडियो स्टेशन पैसे कहां से लेकर आएंगे?
ट्राई के चेयरमैन नृपेंद्र मिश्रा का कहना है, ‘हमने एफएम रेडियो के लिए एफडीआई की सीमा बढ़ाने की बात कही है। इसके अलावा हमने नेटवर्किंग के लिए भी सिफारिशें दी है और छोटे शहरों में एफएम के विस्तार की भी योजनाएं बनाई हैं। अब सरकार इस पर कुछ फैसला ले तो बेहतर होगा।’
सरकारी कोशिशें
अब तो सरकार ने भी छोटे शहरों में एफएम रेडियो स्टेशनों के विकास के लिए अपनी कमर कस ली है। उसने एफएम रेडियो के विकास के तीसरे चरण को लेकर पूरी योजना भी तैयार कर ली है। इस विस्तार में बड़ी निजी एफएम रेडियो कंपनियों की कोई भूमिका नहीं होगी। इसके तहत सरकार देश के 237 छोटे शहरों और कस्बों में 680 रेडियो स्टेशनों के लिए लाइसेंस जारी करेगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस विस्तार के तहत लगभग 80 फीसदी रेडियो स्टेशन बेहद छोटे शहरों में आने वाले हैं, जहां मुनाफे की गुंजाइश बहुत कम है। अगर पहले के दो चरणों के विस्तार की बात करें तो लगभग 37 प्राइवेट रेडियो कंपनियां 260 एफएम स्टेशनों की खातिर 2,500 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी हैं।
छोटे एफएम का बाजार
बीएजी फिल्म्स का ‘धमाल’ एफएम रेडियो सात राज्यों के नौ शहरों में चल रहा है। यह रेडियो जल्द ही शिमला में भी अपना स्टेशन खोलने वाली है। रेडियो धमाल के सीओओ आशीष कौल का कहना है, ‘हमारा रेडियो स्टेशन पांच-छह महीने से चल रहा है।
आमतौर पर छोटे शहरों में एफएम के लिए रिटेल मार्केटिंग ही होती है यानी रिटेल विज्ञापनदाताओं के बलबूते ही छोटे शहरों के एफएम आश्रित हैं।’ उनके मुताबिक छोटे शहरों में सरकारी एफएम ही ज्यादा मुनाफा कमाते हैं इसकी वजह यह है कि उन्हें सरकारी विज्ञापन काफी बड़ी तादाद में मिलते हैं, जबकि प्राइवेट एफएम चैनलों पर उनका टोटा होता है।
एक तरह से सरकारी एफएम पब्लिक ब्रॉडकास्टर है, जबकि प्राइवेट एफएम चैनल इंटरटेनर हैं। रेडियो सिटी के सीईओ प्रशांत पांडेय का कहना है, ‘ छोटे शहरों में जिनकी जनसंख्या 10 लाख से कम है, हम वैसे आठ से नौ शहरों में मौजूद हैं। छोटे शहरों में रेडियो स्टेशन चलाने की पॉलिसी बिल्कुल लोकल हो जाती है इसी वजह से छोटे चैनलों के मुकाबले हमारे चैनल को सुनने वालों की तादाद ज्यादा है।
कई बार हम स्थानीय चैनलों के लिए भी सेल्स का काम करते हैं मसलन ग्वालियर के ‘चस्का’ और गोवाहाटी के ‘गपशप’ के साथ भी हमारा गठजोड़ है।’ प्रशांत के मुताबिक बॉलीवुड के कंटेट जो श्रोताओं की पहली मांग रही है, वह उन्हें आसानी से मिल जाते हैं वह छोटे एफएम चैनलों को मिलना बहुत मुश्किल है।
पटना में आकाशवाणी के भूतपूर्व केंद्र निदेशक शमीम फारूकी का कहना है, ‘छोटे शहरों में एआईआर का एफएम चैनल काफी मुनाफा कमा रहा है। हालांकि अभी भी प्राइवेट चैनलों को काफी चुनौतियों का सामना करना है। इसमें भी बड़े खिलाड़ियों की ही जीत होने का अनुमान है।’ इनके मुताबिक छोटे शहरों में मोबाइल पर एफएम प्रसारण ने लोगों को काफी क्रेजी बना दिया है।
बाजार बड़े चैनलों का
इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का कहना है कि बड़े शहरों में काफी मुनाफा कमाने वाले बड़े एफएम चैनल अगर छोटे शहरों में अपना विस्तार करते हैं तो वे छोटे शहरों में होने वाले घाटे को बड़े शहरों के मुनाफे से पाट सकते हैं।
रेडियो सिटी के असित का कहना है कि बड़े शहरों में निवेश की और विज्ञापनों की हमेशा बेहतर गुंजाइश होती है जबकि छोटे शहरों में अभी संभावनाओं की तलाश हो रही है। छोटे शहरों में ही अपना कारोबार करने वाले निजी चैनलों के साथ मुनाफे को लेकर भी कई तरह की परेशानियां हैं।
कौल के मुताबिक छोटे शहरों के स्थानीय रेडियो स्टेशनों एफएम अभी अपने शुरुआती दौर में है। हालांकि इसने 25 से 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है और छोटे शहरों के रेडियो स्टेशनों के मुनाफे की कमाई करने में 3 से 5 साल का वक्त लगता है। देश में अब रेडियों के श्रोताओं की संख्या के आकलन के लिए ‘रैम’ जैसी संस्था भी एक साल से काम कर रही है।
टैम के वाइस प्रेसीडेंट सिद्धार्थ का कहना है, ‘मुझे लगता है कि छोटे शहरों में जो रिटेल विज्ञापनदाता है वे अपने विज्ञापन किसी बड़े चैनल या अखबार के बजाय स्थानीय रेडियो को ही देना पसंद करते हैं। इसकी वजह है कि यह उनके लिए बेहतर और आर्थिक दृष्टि से भी काफी सुविधाजनक है। यहां मार्के टिंग की बातें स्थानीयता के प्रभाव से ही तय होती हैं।’