क्रेडिट संकट की वजह से पश्चिमी देशों के बैंकों और कंपनियों को जो नुकसान हुआ है, उसके बावजूद कंपनी के आला अधिकारियों को मोटी तनख्वाह देकर रुख्सत किया गया है।
(हाल ही में एआईजी के सीईओ को नौकरी से निकालने के बावजूद 3.5 करोड़ डॉलर दिए गए थे, जबकि कंपनी को ऋण को बट्टे खाते में डालने और नुकसान की वजह से कुल करीब 30 अरब डॉलर का घाटा हुआ था)।
दिवालियेपन की कगार पर पहुंच चुकी कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों को इस तरह का पुरस्कार देना डॉट कॉम बूम के बाद हुए घोटालों में एक नई कड़ी को जोड़ता है। इन कंपनियों को चाहिये था कि वे शेयरधारकों के धन में और इजाफा करें पर ये अपने मालिकों यानी शेयरधारकों का पैसा हजमकर खुद के आला अधिकारियों की दौलत को ही बढ़ाने में जुटी हुई हैं।
आखिर ऐसा कैसे हुआ? और अब सरकार लोगों के गुस्से को शांत करने के लिए जो नए नियम कानून बनाने पर जोर दे रही है, उससे क्या यह समझा जाए कि इस तरह के पूंजीवाद की समाप्ति की शुरुआत हो चुकी है। जर्मनी और जापान में जिस तरह के पूंजीवाद की शुरुआत की गई थी, क्या यह उसी अध्याय की एक कड़ी है।
प्रबंधकीय पूंजीवाद के एंग्लो-अमेरिकी मॉडल में स्वामित्व (बड़ी संख्या में शेयरधारक) और नियंत्रण (प्रबंधकों का एक छोटा दलं) को अलग अलग करने से ही एजेंसी की समस्या पैदा हुई। यानी शेयरधारकों के रूप में कंपनी के मालिकों की संख्या तो काफी होती है पर वास्तव में नियंत्रण का जिम्मा कुछेक लोगों के पास ही होता है। मालिकों का उद्देश्य अपने निवेश के रिटर्न को अधिक से अधिक बढ़ाना होता है और यह तभी संभव हो सकता है जब कंपनी ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाए।
मुनाफा जितना अधिक होगा, लाभांश उतना ही अधिक वितरित किया जाएगा। यानी शेयरधारकों को उतना ही अधिक रिटर्न मिलेगा। दूसरी ओर प्रबंधकों की चाहत भी यही होती है कि कंपनी अधिक से अधिक मुनाफा कमाए पर वे इस मुनाफे को दूसरे तरीके से इस्तेमाल करना चाहते हैं।
उनका साफ मकसद होता है कि कंपनी जितना अधिक मुनाफा कमा रही है उनकी तनख्वाह उतनी ही अधिक होनी चाहिए और कंपनी के विस्तार के लिए लाभ का पुननिर्वेश किया जाना चाहिए ताकि कंपनी के अधिकारों और हैसियत में और इजाफा हो। शेयरधारकों की संख्या इतनी अधिक होती है कि इस बात पर नजर रखना मुमकिन नहीं हो पाता है कि प्रबंधक उनके निवेश को बेहतर बनाने के लिए प्रयास कर रहे हैं या नहीं।
कंपनी के अंदर प्रबंधकों को इस बात की चिंता सताती है कि अगर ऐसे शेयरधारकों की कमाई दिन प्रतिदिन और बेहतर होती गई तो कहीं कंपनी में उनका दबदबा और बढ़ तो नहीं जाएगा। पर मुश्किल यहां भी है कि अगर कंपनी अपने शेयरधारकों की वैल्यू को बढ़ाने में योगदान नहीं देती है तो उस कंपनी के शेयरों को प्रीमियम दरों पर खरीद कर बाहरी कारोबारी के कब्जे का खतरा रहता है।
ये बाहरी लोग शेयरधारकों के प्रति मित्रता का भाव तो रखते हैं लेकिन कंपनी के आंतरिक प्रबंधकों के प्रति उनका नजरिया द्वेषपूर्ण होता है। ऐसे में मौजूदा प्रबंधन अधिकारियों के लिए तो स्थितियां और बिगड़ सकती हैं क्योंकि हो सकता है कि जिस नए कारोबारी के पास मालिकाना हक आते वह मौजूदा प्रबंधकों को कंपनी से बाहर का ही रास्ता दिखा देता। ऐसे में यह लड़ाई ‘बाहरी’ बनाम ‘भीतर के प्रबंधकों’ की हो जाती।
1950 से 1960 के मध्य के दशक तक जब कॉरपोरेट नियंत्रण के लिए बाजार मुक्त हाथों में था, अमेरिकी शेयरधारकों को अपने शेयरों के बोली से पहले तय कीमत के मुकाबले 40 फीसदी अधिक रकम दी गई थी। पर उसके बाद प्रबंधकों की ओर से जो विरोध किया गया उसे देखते हुए ही अमेरिका ने 1968 में विलियम ऐक्ट पारित किया था।
इस ऐक्ट के तहत ऐसा प्रावधान था जिससे बाहरी लोगों के लिए कंपनी में बोली लगाना मुश्किल हो गया था। पर इसका मतलब यह नहीं था कि अमेरिका में प्रतिकूल अधिग्रहणों पर लगाम लग गया। 1980 के दौरान ऐसे कई अधिग्रहण एक के बाद एक होते चले गए। ऐसे में प्रबंधकों के लिए एक बार फिर से खतरा पनपने लगा और उन्हें लगने लगा कि बाहरी कारोबारियों की ओर से कब्जा जमाए जाने को रोकने के लिए कुछ सख्त कदम उठाए जाने चाहिए।
इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने स्टेट गवर्नमेंटों के पास एक याचिका दायर की। विधायिका और अदालतों को भी लगा कि इस दिशा में जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए और उन्होंने जबरन अधिग्रहणों पर रोक लगाने के लिए सख्त कानून बताए जिन्हें ‘पॉयजन पिल’ के रूप में जाना जा सकता है। इसका फायदा भी देखने को मिला। 1980 के दशक में जहां ऐसे 14 फीसदी अधिग्रहण हुआ करते थे, वहीं 1990 के दशक में ये घटकर चार फीसदी रह गए।
जब जबरन अधिग्रहणों का दौर खत्म हुआ और अधिग्रहण दोस्ताना और दोनों पक्षों की मर्जी से होने लगे तो कंपनी के अंदर मौजूद प्रबंधकों ने भी बोनस, बेहतर तनख्वाह देने का इरादा बना लिया और इस पर अमल भी किया जाने लगा। ऐसे में कोई दो राय नहीं है कि प्रबंधकों की झोली भी भरती। उनका मेहनताना भी दिन पर दिन बढ़ता चला गया।
अमेरिका और ब्रिटेन में शेयरधारकों के मुनाफे पर पहले कॉरपोरेशन कर लगने लगा और फिर उन्हें जो लाभांश मिलता था उसे शेयरधारकों की आय मानकर उस पर भी कर लगाया जाता था। कर लगने के बाद कंपनियों से जो आय होती थी वह थोड़ी सिमटने लगी थी। शेयरधारकों को मिलने वाला ज्यादातर रिटर्न कंपनी के शेयरों के बढ़ने पर निर्भर करता था और शेयरों के भाव कितने बढ़ेंगे यह इस बात पर निर्भर करता था कि कंपनी अपने मुनाफे को आगे किस तरह लाभ वाले क्षेत्र में निवेश करती है।
इस प्रकार शेयरधारकों और प्रबंधकों को लगने लगा कि कंपनी के शेयरों के भाव में उछाल आना चाहिए। दोनों का ही यहां पर समान हित था। प्रबंधकों के पास अब कंपनी के शेयरों के बढ़ते भाव के बीच धोखाधड़ी के भी विकल्प उभरने लगे थे। हालांकि एंग्लो-अमेरिकी शेयरधारकों के पूंजीवाद में जो खामियां थीं जिसकी झलक 1990 के डॉट कॉम बूम के बाद के घोटालों में और क्रेडिट संकट के दौरान देखने को मिली थी, उससे यह नहीं कहा जा सकता कि कॉरपोरेट नैतिकता का स्तर पूरी तरह से गिर चुका है।
दरअसल क्रेडिट संकट की एक बड़ी वजह जबरन अधिग्रहणों को रोकने के लिए दिए जाने वाले प्रोत्साहनों और लाभांश पर लगने वाला दोहरा कर भी है। साथ ही बैंकिंग में जो नए आयाम जुड़ते जा रहे हैं यानी कि एक ही बैंक की दुनिया भर में शाखाएं खुल रही हैं और ये बैंक अलग अलग तरीके के विकल्प उपलब्ध करा रहे हैं। इससे एक और बहुत बड़ा खतरा उभर कर सामने आया है। निवेशकों का पैसा दुनिया के किसी भी हिस्से में शेयर बाजारों में लगाया जाने लगा है।
जब ऐसा होगा तो स्वाभाविक है कि इस निवेश पर खतरा तो होगा ही और अगर ये पैसा डूब जाता है तो बैंकों को इसकी भरपाई भी करनी ही होगी। साफ है कि ऐसे में नकदी की कमी भी उत्पन्न होगी। इसे नियंत्रण में रखने के लिए जरूरी है कि वाणिज्यिक और निवेश बैंकों में वास्तविक दीवार खड़ी की जाए। अगर ऐसा हो जाता है तो पूंजीवाद के एंग्लो-अमेरिकी मॉडल को फिर से स्थापित किया जा सकेगा।