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प्रिंट से इतर समाचार मीडिया का भविष्य

Last Updated- December 11, 2022 | 3:26 PM IST

इस साल की शुरुआत में जस्टिन स्मिथ ने ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ के पूर्व स्तंभकार बेन स्मिथ के साथ मिलकर सेमाफॉर की स्थापना की। अक्टूबर में लॉन्च होने वाला प्लेटफॉर्म सेमाफॉर दुनिया भर में अनुमानित 25 करोड़ अंग्रेजीभाषी लोगों से बात करेगा। यह अफ्रीका, एशिया और अमेरिका सहित अन्य क्षेत्रों में टेक्स्ट, वीडियो और इवेंट की पेशकश करेगा। 
इस साल जनवरी तक ब्लूमबर्ग मीडिया के मुख्य कार्या​धिकारी (सीईओ) रहे स्मिथ का मानना है कि वैश्विक स्तर के अंग्रेजी दर्शकों और पाठकों को अब भी ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’, ‘ द वॉशिंगटन पोस्ट’ या ‘द इकॉनमिस्ट’ जैसे खबरिया ब्रांडों द्वारा सेवाएं दी जा रही हैं। ये सभी ब्रांड 19वीं शताब्दी में उभरे और उन्हें अपने घरेलू बाजारों से अपने कारोबार का एक बड़ा हिस्सा मिलता है। सेमाफॉर ने वेंचर कैपिटल कंपनियों के बजाय निजी निवेशकों से 2.5 करोड़ डॉलर जुटाए हैं।

वर्ष 2017 में शुरू हुई एक्सियोस मीडिया को इस साल अगस्त में अमेरिका के कॉक्स एंटरप्राइजेज को 52.5 करोड़ डॉलर में बेचा गया था। यह रकम 2022 में इसकी अनुमानित 10 करोड़ डॉलर की आमदनी का लगभग पांच गुना थी।

वहीं दूसरी तरफ लाखों डॉलर के निवेश के बाद, वाइस मीडिया अब भी पैसा कमाने के लिए संघर्ष कर रही है। इसकी शुरुआत 2013 में युवाओं को खबरें देने के वैकल्पिक तरीके के रूप में हुई थी और वाइस का मूल्यांकन एक वक्त में 5.7 अरब डॉलर था। 
ये नए खबरिया उद्यम एक ऐसे बाजार में कुछ करने के मकसद से मौजूद हैं जहां समाचार, सूचना, भरोसा और मीडिया की पूरी वैचारिक अवधारणा ही बाधित हो गई है और ये उद्यम अपनी यात्रा के विभिन्न चरणों में हैं। सेमाफॉर लॉन्च होने ही वाला है, एक्सियोस सफल है और वाइस असफलता की ओर बढ़ चुका है। भारत का समाचार कारोबार इनसे और दुनिया के पहले ऐसे उदाहरणों से क्या अनुमान लगा सकता है? 
हालांकि इसका जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि खबरों का स्थानीय ऑनलाइन बाजार वर्तमान में किस मुकाम पर है। वर्ष 2021 में ऑनलाइन विज्ञापन को मिले 30,300 करोड़ रुपये में से लगभग आधे गूगल और एक तिहाई मेटा (पहले फेसबुक) के पास गए। बाकी 5,000 करोड़ रुपये उन दर्जनों अखबारों, वेबसाइटों और टीवी चैनलों के खाते में गए जिन्होंने खबरों की ऑनलाइन पेशकश करने के लिए उस आंकड़े का कई गुना निवेश किया है।

दर्शकों के आकार के संदर्भ में देखा जाए तो टाइम्स इंटरनेट, इंडिया टुडे, एनडीटीवी, इंडियन एक्सप्रेस जैसी मुख्यधारा की समाचार कंपनियां भारत में शीर्ष 20 ऑनलाइन समाचार स्रोतों की सूची में अपना दबदबा कायम किए हुए हैं। लेकिन जब ऑनलाइन कमाई की बात आती है तो इसमें से अधिकांश को अभी संघर्ष करना पड़ रहा है। ऐसे में यह बाजी उन ब्रांडों के लिए सफलता की सीढ़ी बन सकती है जिनके पास आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) में निवेश करने के लिए पैसा है और इस पैमाने पर काम करने के लिए आवश्यक तकनीक है।
ऐसे में निश्चित तौर पर इनके पास ही विज्ञापनों की भी भरमार होगी। हालांकि इस तरह के उद्यमों का पत्रकारिता से ज्यादा लेना-देना नहीं है। एक संभावित समाधान के रूप में सबस्क्रिप्शन के बारे में सोचना अच्छा है क्योंकि मनोरंजन से जुड़े ओटीटी चैनलों के भी 10 करोड़ से अधिक सबस्क्राइबर हैं। लेकिन इन दोनों श्रेणियों के बीच कोई संबंध नहीं है। भारत में ऑनलाइन न्यूज के मुश्किल से 10 लाख सबस्क्राइबर हैं।

निश्चित तौर पर खबरों से जुड़ा कारोबार बेहद कठिन है। वहीं अखबार मुनाफा देते हैं। भारत 400 से अधिक खबरिया टीवी चैनल हैं जिनमें आधे से अधिक में उन लोगों ने धन लगाया है जिनकी पत्रकारिता या तथ्यों में कोई दिलचस्पी नहीं है। उन्हें इस बात की भी परवाह नहीं है कि इनसे पैसे की कमाई होती है या नहीं। बाकी में से सिर्फ दो-तीन समाचार प्रसारण कंपनियां छिटपुट तरीके से मुनाफा कमाती हैं। 
प्रसारण प्रक्रिया के विपरीत, साइबरस्पेस में प्रवेश को लेकर कोई बाधा नहीं है, जिससे यह दुष्प्रचार का एक बड़ा जरिया बन जाता है। फोन रखने वाला कोई भी व्यक्ति पत्रकार होने का दावा कर सकता है। वीडियो और संदेश पोस्ट करने वाली सैकड़ों-हजारों बेकार की वेबसाइटें हैं जो खबर के नाम पर झूठ फैला रही हैं। उदाहरण के लिए हाल ही में रिलीज हुई हिंदी फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ ने बॉक्स-ऑफिस पर असाधारण तरीके से अच्छा प्रदर्शन करते हुए पहले चार दिनों में वैश्विक स्तर पर  250 करोड़ रुपये के करीब कमाई की है। लेकिन ऐसी दर्जनों समाचार वेबसाइटें और टेलीविजन चैनल आपको मिल जाएंगे जो बता रहे हैं कि यह फिल्म पिट गई है। गेहूं को भूसे से अलग करने के इस खेल में किसी की ईमानदार कोशिश दरकिनार हो ही जाती है। इससे सेमाफॉर, एक्सियोस आदि पहला सबक यह देती हैं कि उनका एक लक्षित दर्शक वर्ग होना चाहिए।

‘द न्यूज मिनट’ पूरी तरह से पांच दक्षिण-भारतीय राज्यों पर केंद्रित है। ‘लल्लनटॉप’ चैनल अपने जमीनी पुट के साथ ही खबरों पर व्यंग्यात्मक लहजा रखते हुए हिंदी भाषी युवाओं को लक्षित करता है। एक समाचार ब्रांड के लिए सामान्य या जिंस की खबरों के लिहाज से गूगल या मेटा को चुनौती देने का कोई तरीका नहीं है। ऐसे में आपको आईटी, गोल्फ, कारोबार, मोटरिंग या 1980 या 1990 के दशक की विशेष पत्रिकाओं के बारे में सोचना पड़ेगा। उन्होंने अपने वफादार पाठक तैयार किए जिनसे विज्ञापन और कमाई में मदद मिलती थी।
ऐसी कंपनी जो इस तरह का पाठक-दर्शक वर्ग तैयार कर सकती है और उन्हें इकट्ठा कर सकती है तब उनके पास कमाई का एक मौका हो सकता है। लेकिन इसके लिए पूंजी और मालिकाना हक दोनों ही जरूरी है। अगर आप नहीं चाहते हैं कि आपके चैनल के स्टूडियो के अंदर एंकर चीखे तब आपको घटनाओं और तथ्यों की पुष्टि करने के लिए जमीन पर संवाददाताओं को भेजना होगा जिसमें पैसे खर्च होंगे। 
प्रिंट, टीवी या ऑनलाइन के अधिकांश मीडिया ब्रांडों को नफा-न नुकसान के स्तर पर पहुंचने और कमाई की शुरुआत करने में चार से छह साल का वक्त लग जाता है। इसका मतलब यह है कि इन दिनों पत्रकारिता से जुड़ी किसी भी अच्छी कोशिश के लिए जरूरी वित्तीय (और नैतिक) समर्थन के लिए पूंजी और मालिकाना हक की जरूरत है। बाजार के आकार को देखते हुए भारतीय निवेशकों में खबरों के कारोबार को लेकर कोई होड़ नहीं है। हालांकि अगर वैश्विक समाचार संस्था इसमें कोई दिलचस्पी रखते भी हैं (हालांकि उनकी रुचि नहीं है), तब भी वे 26 प्रतिशत से अधिक निवेश नहीं कर सकते हैं।
इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि इसके बावजूद भी भारत में अच्छी न्यूज स्टार्टअप को जमीन पर खड़ा करना बेहद मुश्किल रहा है। इससे एक तीसरा सबक भी मिलता है। एक ब्रांड जो खबरों के बारे में थोड़ा ‘अलग तरीके से’ सोचता है और उसे पता है कि इसे कैसे पेश किया जाए तो उसके लिए अब भी एक मौका है।

लॉन्च के सात साल बाद भी विभिन्न समाचार पत्रों, एजेंसियों और वेबसाइटों की खबरों को 60 शब्दों में पेश करने वाली इनशॉर्ट्स भारत में सबसे बड़ी न्यूज एग्रीगेटरों में से एक है। वर्ष 2019 में  इसने एक ओपन शॉर्ट वीडियो ऐप ‘पब्लिक’ लॉन्च किया।
छोटे शहरों के सैकड़ों स्थानीय निवासियों से लेकर वार्ड सदस्यों, सांसदों, विधायकों सहित इसके 60,000 क्रिएटर हैं जो स्थानीय घटनाओं और खबरों से जुड़े छोटे वीडियो अपलोड करने के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं। इनशॉर्ट्स के 8 करोड़ उपयोगकर्ताओं में से लगभग 80 प्रतिशत ‘पब्लिक’ ऐप से जुड़े हैं और यह आने वाले वित्तीय वर्ष से अच्छी कमाई करनी शुरू कर सकती है। इनमें से कुछ फॉर्मूले एक सफल समाचार ब्रांड तैयार करने में मदद कर सकते हैं लेकिन  कोई भी लंबे समय तक इसके बने रहने की गारंटी नहीं दे सकता है। 

First Published - September 18, 2022 | 11:00 PM IST

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