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राजनीति की मार झेलता वायदा कारोबार

Last Updated- December 07, 2022 | 3:40 AM IST

रूस में हाल ही में दो मंत्रालयों के बीच विवाद के दौरान इस दुविधा वाले सवाल पर बहस हुई कि मुद्रास्फीति में उछाल खासकर खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों से निपटने के लिए सरकार को क्या करना चाहिए। 


वित्तमंत्री चाहते थे कि मांग और मुद्रास्फीति को कम करने के लिए सरकारी खर्च कम किए जाने चाहिए जबकि आर्थिक विकास एवं व्यापार मंत्री चाहते थे कि गरीबों की मदद और अर्थव्यवस्था के विकास के लिए सरकारी खर्चे में बढ़ोतरी होनी चाहिए। (रूस में मुद्रास्फीति के साथ साथ उम्मीद की किरणें भी हैं: विश्व बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से सकल घरेलू उत्पाद में बढ़ोतरी हो रही है, तथा सरकार का राजस्व और निर्यात भी बढ़ रहा है।)

भारत में भ्रम की स्थिति को जिंसों के डेरिवेटिव मार्केट में उठाए गए कदमों से समझा जा सकता है। ऐसा नहीं है कि  हमारे नीति नियंता इन उपायों की निरर्थकता और कभी कभार इनके प्रतिघाती होने से बेखबर हैं। प्रधानमंत्री मुद्रास्फीति को रोकने के लिए प्रशासनिक कदम उठाने के खिलाफ अपनी आपत्ति जाहिर कर चुके हैं। उनका तर्क है कि इनसे आर्थिक उदारीकरण और सुधारों के प्रति हमारी प्रतिबध्दता के बारे में गलत संकेत जाता है।

वित्त मंत्री स्वीकार कर चुके हैं कि वायदा कारोबार पर प्रतिबंध लगाना राजनीतिक फैसला था, न कि आर्थिक। फाइनेंशियल टाइम्स (19 मई) ने उनके वक्तव्य को उद्धृत करते हुए लिखा था, ”यह सही हो या गलत, अगर लोग मानते हैं कि वायदा कारोबार के चलते महंगाई बढ़ रही है तो लोकतंत्र में जनता की आवाज सुननी ही पड़ेगी।”

दिलचस्प है कि जब कृषि मंत्री कह रहे थे कि वायदा कारोबार पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय नियामक द्वारा लिया गया है (मिंट 13 मई) उसी समय उसी समाचार पत्र में 22 मई को खबर आई कि फारवर्ड मार्केट कमीशन के चेयरमैन ने कहा कि वह इस बात से सहमत नहीं हैं कि वायदा कारोबार से कीमतें बढ़ती हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि इसका असर किसानों पर पड़ेगा क्योंकि कार्पोरेट खरीदार विदेशी बाजारों की ओर रुख करेंगे और ट्रेडर्स डब्बा यानी गैर आधिकारिक मार्केट में जाएंगे।

अगर देखें तो वायदा कारोबार पर प्रतिबंध लगने के बाद रबर की कीमतें आसमान छूने लगीं। राजनीतिक मजबूरियों को अगर दरकिनार कर दें तो क्या इस तरह के कोई ठोस सबूत हैं कि हाल ही में जिंसों की कीमतें बढ़ने की मुख्य वजह या इसके पीछे की एक बड़ी वजह वायदा कारोबार है? वैश्विक रूप से कमोडिटी फंड में ढेरों निवेश किया गया है, लेकिन उदाहरण के तौर पर क्या सट्टेबाजी तेजी से तेल की बढ़ती कीमतों की प्रमुख वजह है?

न्यूयार्क टाइम्स में हाल ही में प्रमुख अर्थशास्त्री पाल क्रूग्मैन ने तर्क दिया था कि वायदा कारोबार से एक ही सूरत में कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है, जब लोग जमाखोरी करने लगें। कच्चे तेल की कीमतों की हालिया बढ़ोतरी में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। उन्होंने यह तर्क दिया है कि तेल की कीमतों में बढ़ोतरी की प्रमुख वजह मांग और आपूर्ति के बीच बड़ी खाई का होना है, इसलिए ऊर्जा का संरक्षण बहुत जरूरी है।

अगर अमेरिका से तुलना करें तो फ्रांसीसी और जापानी प्रति व्यक्ति बहुत कम तेल खर्च करते हैं, जबकि उनका जीवन स्तर भी कम बेहतर नहीं है। भारत की ओर लौटें तो- वायदा बाजार और कीमतों के संबंध पर अभिजीत सेन समिति बनी थी, लेकिन यहां हालत यह हुई कि बीमारी की पहचान के पहले ही इलाज शुरू कर दिया गया। 16 महीने पहले ही गेहूं और दाल के वायदा कारोबार पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

समिति को रिपोर्ट तैयार करने में 14 माह लगे, जिसमें ऐसा कोई भी साक्ष्य नहीं मिला कि वायदा कारोबार और कीमतों में बढ़ोतरी में कोई संबंध है। समिति ने तो नहीं लेकिन डा. सेन ने व्यक्तिगत रूप से कहा कि वायदा कारोबार पर प्रतिबंध जारी रखना चाहिए और उसके बाद प्रतिबंधित वस्तुओं की श्रेणी में 4 जिंस और जुड़ गए। अब तो ऐसा लगता है कि सरकार किसानों के  लिए जिंसों को बेचना और कठिन बना रही है, जिससे कीमतें कम हों।

इन प्रतिबंधों को लंबे समय तक जारी रखने से पड़ने वाले प्रभाव को लेकर कुछ करने की चिंता बढ़ रही है। जैसा कि वायदा बाजार के चेयरमैन ने एक साक्षात्कार में कहा ”…दो साल पहले… कीमतों को नियंत्रित करने के लिए जूट के कॉन्ट्रैक्ट निष्क्रिय कर दिए गए थे… कीमतों पर सीलिंग लागू करना किसानों के हित में नहीं रहा और उसके बाद से जूट कॉन्ट्रैक्ट नहीं हुए।”

हमें कीमतों की बढ़ोतरी में वायदा कारोबार के हाथ होने के बारे में विचार करने के पहले कुछ प्रमुख विंदुओं को ध्यान में रखना चाहिए, एक ओर जहां हर खरीदार कीमतों में बढ़ोतरी की उम्मीद करता है, वहीं इसके विपरीत एक विक्रेता की सोच होती है। इसके बिना खरीद-फरोख्त नहीं होती, वायदा कारोबारी परजीवी नहीं होते- वे बाजार की प्रभावी गतिविधियों में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।

हेजर्स (और आर्बिट्रेजर्स) अकेले ऐसा नहीं कर सकते। उदाहरण के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने निर्देश दिया था कि बैंक, ब्याज वायदा बाजार का इस्तेमाल केवल हेजिंग के लिए कर सकते हैं, उस समय भी वायदा अनुबंध शुरू नहीं हुए थे और ऐसे में बाजार में जितनी कम नकदी होती थी, सौदे की लागत और उसमें उतार-चढ़ाव उतना ही ज्यादा बढ़ने का अंदेशा रहता था।

ऐसे मामले में अगर ट्रेडिंग पर लंबे समय के लिए प्रतिबंध लागू रहता है, तो इससे तमाम समस्याएं होंगी और बाद में इसे हटाए जाने में भी कठिनाई आएगी, क्योंकि हम अक्सर यथास्थिति बनाए रखने में यकीन रखते हैं।

First Published - June 4, 2008 | 8:39 PM IST

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